कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

GROUND REPORT: कहानी उस दलित लड़की की जिसकी लाश बिहार के एक विद्यालय में टंगी मिली

"बात सच्चाई की है. आख़िर मेरी तेरह साल की बच्ची आत्महत्या क्यों करेगी? प्यार करती तो वो भाग भी सकती थी."

22 मार्च, शुक्रवार की दोपहर. भोजपुर ज़िले का सेमरांव गांव. होली बीत गई है लेकिन गांव के इस दलित टोले में आज भी जश्न का माहौल है. कुछ छोटे बच्चे किसी भोजपुरी गाने की धुन पर थिरक रहे हैं. पास जाने पर ज़ोर से पूछना पड़ता है- सत्यनारायण राम का घर कौन सा है? पास बैठी एक महिला हाथ से इशारा करती है- आगे से मुड़ जाइएगा..चमरटोली आ जाएगा.

सत्यनारायण राम का घर टोले के अंतिम छोर पर है. गली में मुड़ते ही खपड़ैल घर से घिरा एक आयतनुमा आंगन खुलता है. आंगन आधा ही लीपा गया है. कुछ लोग ज़मीन पर नीचे बैठे हैं. पास जाने पर चारपाई पर बैठने के लिए कहा जाता है. बताया जाता है कि आज बच्ची का अंतिम क्रिया कर्म है.

मृतक शकुंतला के परिवार के लोग, फ़ोटो- दीपक कुमार, न्यूज़सेन्ट्रल24X7

 

सत्यनारायण राम(50) जाति से चमार और पेशे से राज मिस्त्री हैं. चरपाई पर बैठते ही कहते हैं, “बात सच्चाई की है. आख़िर मेरी तेरह साल की बच्ची आत्महत्या क्यों करेगी? प्यार करती तो वो भाग भी सकती थी. रात करीब ग्यारह-बारह बजे की घटना है, और चौकीदार मुझे अगले सुबह साढ़े दस बजे बताता है. पूरी बात भी नहीं बताया, कहा कि आपकी बेटी सीरियस है. वो तो वहां जाने पर देखा कि मेरी बेटी फंदे में लटकी हुई है.”

सत्यनारायण आगे कहते हैं, “कोई लड़का किसी दूसरी लड़की के लिए लेटर लिखता है. उससे मेरी बेटी का क्या लेना देना है. लेकिन प्रशासन इस लेटर का इस्तेमाल मामले को प्रेम प्रसंग बनाने में कर रहा है.”

बता दें कि बीते 15 मार्च को सुबह 5 बजे दलित छात्रा शकुंतला कुमारी(13) की लाश ‘कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय(चरपोखरी,भोजपुर)’ के शौचालय में झूलती मिलती है. विद्यालय प्रशासन का कहना है कि बच्ची ने प्रेम प्रसंग के कारण फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. जबकि परिजनों कहना है कि बच्ची ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उसकी हत्या की गई है. हालांकि पुलिस प्रशासन प्रशासन अभी मामले की जांच में जुटा है.

कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय(चरपोखरी,भोजपुर), फ़ोटो-दीपक कुमार, न्यूज़सेन्ट्रल24X7

 

भारत सरकार ने 2004 में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग की बालिकाओं के लिए सुदूर ग्रामीण इलाक़ों में आवासीय उच्च प्राथमिक विद्यालय की स्थापना के लिए कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना का शुभारंभ किया था. इस योजना के तहत ही बिहार में हज़ारों बालिका आवासीय विद्यालय खोले गए हैं.

प्रखंड चरपोखरी का यह आवासीय विद्यालय सेमरांव गांव से महज़ तीन किलोमीटर की दूरी पर है. परिवार वालों का कहना है कि छात्रावास गांव से इतना नज़दीक है फिर भी प्रशासन ने हमें बहुत देर से सूचना दी.

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय पर शेल्टर होम का साया?

शकुंतला पांचवीं तक तो गांव के स्कूल में ही पढ़ी थी. बाद में घर की माली हालत को देखते हुए सत्यनारायण राम ने उसका एडमिशन पास के ही कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में करा दिया. अभी वो आठवीं क्लास में पढ़ रही थी.

चिंता देवी(45) जो शकुंतला की मां हैं, आँगन के एक कोने में चुपचाप बैठी हैं. बेटी से ‘अंतिम बार कब बात हुई?’ पूछने पर बताती हैं, “पिछले रविवार को गई थी उसके पास, सामान घट गया था तो साबुन-सर्फ खरीद कर दे दी..बोली थी- माई एगो क्रीम खरीद द..लगावे ला. उस दिन तो कुछ नहीं बोली.”

कुछ परेशानी के सवाल पर चिंता देवी बताती हैं, “पहले खाना को लेकर शिकायत की थी. वो मुझे बताई थी कि मां मैंने खाना को लेकर पूनम दीदी(छात्रावास संचालिका) की शिकायत ऊपर कर दी हूं.”

चिंता देवी लगभग दो सप्ताह पहले बेटी से हुई बातचीत को याद करती हैं, “उस दिन मेनू लिस्ट के अनुसार अंडा बनना था इसलिए शकुंतला ने होस्टल की पूनम दी से पूछा था कि दीदी आज तो अंडा बनेगा न. पूनम देवी ने साफ़ मना कर दिया और बोली- तुम्हारा ही कहना होगा क्या. तुम्हारा इतना दिमाग की ऊपर फ़ोन कर दी.”

चिंता देवी कहती हैं कि “शकुन्तला बताई थी कि मेनू के अनुसार खाना नहीं मिल रहा है और दीदी हमलोग से साइन करवाकर बिल बना ले रही हैं.”

सत्यानारायण राम और चिंता देवी, फ़ोटो-दीपक कुमार, न्यूज़सेन्ट्रल24×7

 

वो आगे बताती हैं कि “शकुंतला के शिकायत करने पर होस्टल में तीन दिन तक उसका खाना-पीना बंद कर दिया गया. मुझे बुलाया जाता है और बताया जाता है कि आपकी बेटी फ़ोन पर किसी से बात करती है. मैं कहती हूं कि फ़ोन तो उसके पास है ही नहीं. तो दीदी कहती हैं कि मेरा मोबाइल चुराकर बात करती है.”

चिंता देवी बताती हैं, “उसी दिन शकुन्ताला से दरख़ास्त लिखने को कहा जाता है. लेकिन उर्मिला मैम( छात्रावास में पढ़ाने वाली शिक्षिका) आकर मना कर देती हैं. वो पूनम देवी को कहती हैं कि यदि लड़की ग़लती की है तो तुम अधिकारी के पास दरख़ास्त लिखो. उससे क्यों लिखवा रही हो. उर्मिला दीदी हमारे पास ही कहती हैं कि ये लोग ग़रीब बूढ़े मां-बाप के बच्चे को तंग कर रही है. खाना को लेकर शिकायत की है इसीलिए इतना कर रही है सब. पूनम देवी फिर वहां से उठकर चली जाती है.”

सेमरांव गांव से ही इसी जाति की छह-सात लड़कियां उसी आवासीय विद्यालय में रहती हैं. लड़कियों से बात करने पर मालूम चलता है कि छात्रावास में उनसे झाड़ू-पोछे का काम भी लिया जाता है. इसके लिए सभी का अलग-अलग दिन बांधा गया है.

सेमरांव गांव की ही लड़कियां जो कस्तूरबा बालिका आवासीय विद्यालय, चरपोखरी में रहती हैं. फ़ोटो-दीपक कुमार, न्यूज़सेन्ट्रल24×7

 

हालांकि लड़कियां थोड़ी सहमी सी लग रही हैं. ज़्यादातर सवालों के जवाब हां- ना में दे रही हैं. छठी क्लास की चंदा सहमी सी बताती है, “झाड़ू लगवावेली..पोछा लगवावेली…चापाकल करवावेली”

आगे की बात शकुन्ताला की बड़ी बहन सीमा जोड़ती है, “मैडम लोग खाना बनवाती हैं, बाथरूम तक साफ़ करवाती हैं.”

हत्या और आत्महत्या की गुत्थी

शंभुराम जो सत्यनारायण राम के चचेरे भाई हैं, कहते हैं,” जब हम सुबह कस्तूरबा विद्यालय पहुंचे तो पुलिस वाले लिखा पढ़ी का काम कर रहे थे. बाद में मुझे और सत्यनारायण को बुलाकर एक कागज पर कुछ लिखवाया गया. दरोगा जी बोले कि पढ़ना क्या है आपलोग साइन कर दीजिए.”

शंभुराम आगे बताते हैं कि “पुलिस वहां दो कागज दिखाती है. एक पर आठ-दस मोबाइल नंबर लिखा रहता है जबकि दूसरे पर एक लड़का मधु नाम की लड़की के लिए लेटर लिखे रहता है. यही कागज का इस्तेमाल पुलिस आरोपी को बचाने के लिए कर रही है.”

जब्त की गई सामानों की सूची

 

इस मामले को लेकर स्थानीय लोगों में रोष का माहौल है. सेमरांव से चरपोखरी तक बस यहीं चर्चा है कि इस मामले को प्रेम प्रसंग का रूप दे दिया जाएगा, जबकि कई लोग देखे हैं कि आवासीय विद्यालय वाले लड़कियों से रोड पर उपला(गोबर का कंडा) भी थपवाते हैं.

सीपीआई(माले) के स्थानीय नेता कैलाश पाठक कहते हैं, “मामले को प्रेम प्रसंग बनाने के लिए ही कागज के टुकड़े पर दो-चार नंबर लिखकर रख दिए गए. जबकि विद्यालय के इन्चार्ज से भी पूछा गया तो वह यह बात मानती हैं कि हमलोग अपने यहां कोई मोबाइल वगैरह नहीं रखने देते हैं.”

कैलाश आगे कहते हैं कि “बच्ची तेज़ थी और उसने खाना में गड़बड़ी को लेकर आवाज़ उठाई. शिकायत करने पर लड़की से मारपीट की गई. खाना बंद कर दिया गया. दो दिन बाद ही आत्महत्या की बात सामने आ जाती है.”

मोबाइल रखने को लेकर छठी क्लास में पढ़ने वाली चंदा कुमारी भी बताती हैं कि “हॉस्टल में मोबाइल किसी के पास नहीं है. शकुंतला स्कूल और हॉस्टल से आते-जाते किसी लड़के से भी बात नहीं करती थी.”

सीपीआई माले के स्थानीय नेता कैलाश पाठक

 

चंदा बताती हैं, “शकुंतला दी अंच्छी थी..खुश थी.” यह पूछने पर कि ‘क्या तुम्हें लगता था कि वो आत्महत्या कर लेगी’ तो इस पर वह ‘ना’ कहकर चुप हो जाती है.

न गिरफ़्तारी हुई और न ही मुआवज़ा मिला

एनसीआरबी के आंकड़े के अनुसार दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार के मामले में बिहार उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे नंबर पर आता है. राज्य में 2016 में इससे संबंधित 5,701 मामले दर्ज किए गए थे.

सेमरांव गांव जिस इलाक़े में है वहां पिछड़ों और दलितों की आबादी ज़्यादा है. घटना के बाद लोगों ने काफ़ी बवाल काटा, लेकिन घटना स्थानीय अख़बारों के लोकल पेज पर ही दब कर रह गई.

सत्यनारायण राम बताते हैं कि “जब हमने पोस्टमार्टम के बाद सड़क जाम किया तो बड़े-बड़े पुलिस अधिकारी आए और बोले कि गिरफ़्तारी भी होगी और मुआवज़ा भी मिलेगा. लेकिन गिरफ़्तारी तो छोड़िए, छात्रावास संचालिका पूनम देवी छुट्टी पर चली गई. मुआवज़ा भी नहीं मिला.”

सत्यनारायण के चचेरे भाई शंभुराम आगे कहते हैं, “हम जब आरा लोककल्याण पदाधिकारी से मिले तो उन्होंने कहा कि इसमें तो हत्या का मामला ही दर्ज नहीं है. इस पर मुआवज़ा का क्लेम कैसे होगा…आपलोग एसपी साहब से बात कीजिए.”

स्थानीय लोगों का विरोध प्रदर्शन

 

सेमराव गांव अगिआंव विधानसभा क्षेत्र के अंदर आता है जिसके विधायक जदयू नेता प्रभुनाथ राम हैं.

जब विधायक प्रभुनाथ राम से इस बारे में पूछा जाता है तो वो बताते हैं कि “वो तो परसों ही परिवार वाले से मिले हैं. सारा क़ानूनी प्रोसेस वो करवा रहे हैं.”

हालांकि विधायक के द्वारा मदद करने की बात पर शंभुराम कहते हैं कि “प्रभुनाथ राम हमारे ही जाति के हैं और मेरे साथ ही पढ़े हैं. दोनों घर के बीच भवदी(किसी अवसर पर निमंत्रण वाली परंपरा) भी चलता है लेकिन उन्होंने अब तक गांव में कदम भी नहीं रखा है.”

पुलिस प्रशासन की अबतक की कार्रवाई

हालांकि इस घटना के एक सप्ताह से ज़्यादा हो गए है. लेकिन पुलिस प्रशासन अभी किसी खास निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है. पीरो अनुमंडल पदाधिकारी डॉ सुनील कुमार न्यूज़सेंट्रल24×7 को बताते हैं कि “यह जांच का विषय है कि इसकी सच्चाई क्या है. एफ़आईआर दर्ज कर ली गई है. एडीएम साहब के नेतृत्व में टीम ने जांच भी किया है.”

जांच में क्या बात सामने आई है, इस पर एसडीओ पीरो बस इतना ही कह पाते हैं, “यह पुलिस की जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा. लड़की लटकी पाई गई है तो ज़रूरी नहीं कि वो आत्महत्या को मामला है..और यह भी ज़रूरी नहीं कि वो हत्या का भी मामला है.”

सत्यनारायण राम के द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी

 

एसडीपीओ पीरो अशोक कुमार आज़ाद कहते हैं, “इस मामले के लिए एडीएम के नेतृत्व में जांच कमेटी बनी है. मामले की जांच चल रही है. इस मामले में कमेटी से आप पूछ सकते हैं.”

हालांकि स्थानीय लोग पुलिस की कार्रवाई से नाखुश हैं. उनका कहना है कि इतने दिन बीत गए लेकिन गिरफ़्तारी नहीं हुई. स्थानीय नेता कैलाश पाठक कहते हैं, “यहां की पुलिस दलित लड़की के न्याय को दबाना चाहती है. यह घटना साफ़ दर्शाता है कि यह नीतीश सरकार की विफलता है.”

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