कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

रोशन बिहार के आंकड़ों में उजाले को तरसते चम्बरा, बुधन मुंडा जैसे लोग क्यों नहीं हैं?

सरकार की फाइलों इस साल 1 नवंबर से बिहार के सद-फीसद घरों में बिजली पहुंच रही है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले दिनों फख्र के साथ यह घोषणा की थी कि सूबे के हर घर में बिजली पहुंचाई जा चुकी है. दरअसल, केंद्र सरकार ने 31 दिसंबर, 2018 तक सभी घरों में बिजली पहुंचा देने का लक्ष्य रखा था. इस लक्ष्य को समय से पूरा करनेवाले राज्यों को इनसेंटिव देने की बात कही गई थी.

सीएम नीतीश कुमार ने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए 15 नवंबर, 2016 को ‘हर घर बिजली योजना’ शुरू की थी और निर्धारित समय से दो महीने पहले ही ‘उपलब्धि’ हासिल कर ली. यह सरकार के लिए अपनी पीठ थपथपाने का एक सुनहरा मौका था. सरकार ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया.

नीतीश कुमार ने इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम में कहा था, ‘पहले जब बिजली नहीं थी, तो ग्रामीण इलाकों में अभिभावक अपने बच्चों को रात में बाहर निकलने से रोकने के लिए कहते थे कि अंधेरे में भूत रहते हैं. अब जब सभी घरों में बिजली पहुंच गई है, तो लोग और खासकर बच्चों को भूत के नाम पर डराया नहीं जा सकता है. हर घर बिजली योजना के पूरे होने से भूत बिहार से भागने को मजबूर हो गए हैं.’

मगर, सरकार ने सभी घरों में बिजली पहुंचा देने का जो आंकड़ा पेश किया है, उस आंकड़े की जमीनी हकीकत देखें, तो पता चलता है कि कई घरों में बिजली अब तक नहीं पहुंची है. इन घरों में अब भी किरासन तेल से ही उजाला होता है. ऐसे ही कुछ घरों का हमने दौरा किया.

ये घर गया शहर से करीब 60 किलोमीटर दूर पहाड़ की तलहटी में बसे हुए हैं. गया के गुरपा रेलवे स्टेशन से इन घरों की दूरी बमुश्किल सात किलोमीटर होगी.

विकास का पैमाना समझी जानेवाली पक्की सड़क गुरपा में ही खत्म हो जाती है और वहां से इन घरों तक पहुंचने की पगडंडी शुरू होती है. सात किलोमीटर की ऊभर-खाबड़, उतार-चढ़ाव व पत्थरों से भरी बेतरतीब पगडंडी से चार पहिया वाहनों का गुजरना नामुमकिन है. अलबत्ता, मोटरसाइकिल और साइकिल से वहां तक पहुंचा जा सकता है. लेकिन इन साधनों का इस्तेमाल भी जोखिम भरा है. क्योंकि थोड़ा-सा संतुलन बिगड़ने की कीमत जान गंवाना हो सकती है.

विकास का पैमाना समझी जानेवाली पक्की सड़क गुरपा में ही खत्म हो जाती है /फ़ोटो-उमेश कुमार राय

 

हम इस खतरनाक पगडंडी से होकर करीब डेढ़ घंटे बाद उन घरों तक पहुंचे, जो फतेहपुर के अलगडीहा गांव के गिदनी टोले में आते हैं. घर क्या थे, मिट्टी की दीवार उठा कर छत पर खपरैल डाल दिया गया था. घर की दीवार से लेकर फर्श तक को गोबर से लीपा गया था. इस टोले में करीब 38 परिवार रहते हैं. आबादी करीब 150 के आसपास होगी.

इस टोले के एक निर्माणाधीन कुएं (इसे स्थानीय लोग खुद बनवा रहे हैं. वन विभाग ने इस पर आपत्ति जताई है, और एक बार कुएं की दीवार तोड़ी भी जा चुकी है) से थोड़ा आगे बने एक घर में हम पहुंचते हैं, तो हमारी मुलाकात चम्बरा मुंडा से होती है.

चम्बरा मुंडा अपने परिवार व समुदाय में मुंडेरी भाषा बोलते हैं. टूटी-फूटी हिन्दी बोल लेते हैं, लेकिन समझने में उन्हें कठिनाई होती है.
वह हमें बताते हैं कि अंधेरे के कारण उन्हें किन समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. वह कहते हैं, ‘अंधेरा होने से सांप व अन्य जानवर घर में घुस जाते हैं. अगर उजाला रहता, तो वे घरों की तरफ नहीं आ पाते. और अगर आते भी तो हम आसानी से देख लेते और उन्हें भगा देते.’

उन्होंने बताया कि अब तक कम से कम तीन बार ऐसा हुआ कि वह घर में सोये हुए थे और उनके पास ही सांप भी पड़ा हुआ था.
वह जब अपनी आपबीती सुनाते हैं, तो देह सिहर उठती है. वह कहते हैं, ‘एक बार रात में मैं सोया हुआ था. मुझे पता नहीं था कि बगल में मोटा सांप भी है. सुबह में मैं नींद से जागा तो आदतन बैठ कर गुरुदेव का नाम सुमिरने लगा. उसी वक्त बगल में रखे प्लास्टिक के खड़खड़ाने की आवाज आई. मैं पलटा, तो देखा कि बगल में सांप है. मैंने उसे उठा कर बाहर फेंक दिया.’

चम्बुरा डर गए थे कि कहीं सांप ने काट तो नहीं लिया. कुछ जड़ी-बूटियां खाईं और शरीर को भी चेक किया, लेकिन कहीं खून का निशान नहीं था, तो उन्होंने राहत की सांस ली कि सांप ने काटा नहीं.

उन्होंने याचना भरी आवाज में कहा, ‘सरकार अगर हमारे घर तक बिजली पहुंचा देती, तो बहुत फायदा होता. रात में बच्चे पढ़ भी पाते.’
चम्बुरा ने हालांकि सांप से बचाव के लिए एक तरकीब खोज ली है. उन्होंने कहा, ‘हम अब मच्छरदानी लगाते हैं और उसके किनारों को वजनदार चीज से दबा देते हैं. सांप अगर घर में घुस भी गया, तो वह मच्छरदानी के बाहर ही रहेगा, भीतर नहीं पहुंच पाएगा.’
चम्बुरा मुंडा की यह तरकीब सरकार की नाकामी की उपज है.

चम्बरा मुंडा की तरह ही टोले के अन्य घरों में भी अब तक बिजली नहीं पहुंच सकी है. इसी टोले के बुधन लाल मुंडा कहते हैं, ‘अंधेरा रहने से घरों में सांप के घुस आने का खतरा रहता है. अब तक सांप के काटने से दो लोगों की मौत भी हो चुकी है.’

मुंडा समुदाय करीब 15 साल पहले झारखंड से यहां आया था. यहां आकर बस जानेवाले लोगों के अलग-अलग किस्से हैं. कुछ लोगों को हाईवे के विस्तार के लिए हटाया गया, तो कुछ लोगों के रहने के लिए जगह छोटी पड़ गई, तो यहां आ गए. बहुत मुश्किल से उन्होंने रहने लायक जगह का जंगल साफ किया और इस बीहड़ में नए सिरे से जिंदगी शुरू की. जिस वक्त वे लोग आए थे, उस वक्त गांव या प्रशासनिक अधिकारियों को उनके अस्तित्व के बारे में जानकारी नहीं थी. इसलिए राशन-किरासत जैसी सुविधा भी उन्हें मयस्सर नहीं थी. उस वक्त वे रात को लकड़ियां जला कर घर उजाला करते थे.

गिदनी टोले के निवासी सिरका मुंडा बताते हैं, ‘मैं हजारीबाग में रहता था. वहां से चतरा आ गया और करीब 15 साल पहले यहां आया. मेरे साथ 60 से 65 लोग थे. जब हम आए थे, तो पानी की बहुत किल्लत थी. पानी की समस्या के कारण साथ के कुछ लोग कहीं और चले गए. हमलोगों ने यहीं रहने का फैसला किया.’

एक निर्माणाधीन कुएं इसे स्थानीय लोग खुद बनवा रहे हैं. /फ़ोटो-उमेश कुमार राय

 

सिरका मुंडा आगे कहते हैं, ‘कुछ दिनों तक तो हमलोगों ने नाले का पानी पिया. बाद में एक कुआं खोदा. अब तो खैर कुछ चापाकल लग गए हैं.’ 3-4 साल पहले बिहार सरकार की तरफ से उन्हें राशन व किरासत तेल मिलना शुरू हुआ है, लेकिन उसकी मात्रा बहुत कम है और हर महीने राशन मिलता भी नहीं. हर परिवार को दो महीने के अंतराल पर डेढ़ लीटर किरासन तेल और हर परिवार के सदस्य को 3 किलोग्राम चावल औऱ दो किलोग्राम गेहूं मिलता है. राशन-किरासन के लिए उन्हें सात किलोमीटर दूर गुरपा जाना पड़ता है.

हालांकि, जितना राशन मिलता है, उससे एक परिवार का महीना भर गुजारा संभव नहीं हो पाता है. इसलिए वे जंगल की थोड़ी-बहुत जमीन पर खेती करते हैं और खेती का सीजन खत्म हो जाता है, तो मजदूरी करने के लिए गुरपा, फतेहपुर व अन्य जगहों की ओर कूच करते हैं.
इन आदिवासियों के पास जॉब कार्ड नहीं है, इसलिए मनरेगा के तहत काम भी नहीं मिल पाता है.

गिदनी टोला बोधगया विधानसभा क्षेत्र में आता है. चुनाव आता है, तो नेता 7 किलोमीटर की नरक-सी सड़क पार कर उन तक पहुंच जाते हैं, क्योंकि वर्ष 2013 से वे बिहार के वोटर भी बन गए हैं. लेकिन, चुनाव जीतने के बाद वे दोबारा उस तरफ नजर भी नहीं घुमाते.

गिदनी टोले के ही बुधन लाल मुंडा कहते हैं, ‘वर्ष 2016 में मुखिया का चुनाव हुआ था, तो उम्मीदवार हमारे पास आए थे और पूछा कि हमें क्या चाहिए? इंदिरा आवास? चापाकल? हमने कहा कि हमें तो सबसे पहले अपनी जमीन चाहिए, तो वे कहने लगे कि इतनी जल्दी नहीं मिलेगा. हमने वोट डाला. चुनाव खत्म हो गया. रिजल्ट भी आ गया, लेकिन नेता दोबारा नहीं आए.’

यहां रह रहे आदिवासी कई बार वोट का बहिष्कार करने की धमकी भी दे चुके हैं. लेकिन हर बार नेता-अधिकारी आकर उन्हें वोट की कीमत समझा जाते हैं, लेकिन हर बार वोट डालने के बाद उन्हें लगता है कि वोट की कीमत नेताओं के लिए है, उनके लिए नहीं.

ये लोग पिछले 10-15 वर्षों से यहां रह रहे हैं, लेकिन इनके लिए न कोई अस्पताल है और न बच्चों के पढ़ने के लिए कोई स्कूल. बच्चों को पढ़ने के लिए चार-पांच किलोमीटर दूर और इलाज के लिए 35 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है.

सिरका मुंडा कहते हैं, ‘रास्ता इतना खराब है कि अगर कोई बीमार पड़ जाए, तो उसे खटिया या डंडों के सहारे या फिर मिट्टी ढोने के लिए लकड़ी से बने तराजूनुमा पलड़े (आदिवासी उसे झूड़ी कहते हैं) में बिठा कर अस्पताल ले जाना पड़ता है.’

नजदीक में कोई स्कूल नहीं होने के कारण आदिवासियों ने स्थानीय स्तर पर चंदा इकट्ठा कर टोले में ही एक कमरे का स्कूल खोला था, लेकिन चंदा नियमित नहीं मिल पाने और ठीक से मॉनीटरिंग नहीं किए जाने से स्कूल 7-8 सालों से बंद पड़ा है.

स्कूल बंद होने की वजह से उन्होंने अपने बच्चों का नाम दो किलोमीटर दूर स्थित एक स्कूल में लिखवा दिया, लेकिन गार्जियन के लिए रोज बच्चों को स्कूल ले जाना और ले आना न तो संभव था और न ही व्यावहारिक.

आदिवासियों ने स्थानीय स्तर पर चंदा इकट्ठा कर टोले में ही एक कमरे का स्कूल खोला था/ फ़ोटो- उमेश कुमार राय

 

बुधन मुंडा ने बताया, ‘बच्चे अकेले स्कूल जाते थे, लेकिन रास्ते में लकड़ी चोर अक्सर मिल जाते, तो वे डर जाते. डर के मारे पिछले एक साल से बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. स्कूल रेलवे लाइन के पार था, तो बच्चों के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने का भी डर था.’

स्थानीय लोगों ने बताया कि गया व नवादा के आधा दर्जन गांवों के एक दर्जन से ज्यादा आदिवासी टोलों में बिजली का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है. स्थानीय लोग डोलइया, सलरिया, दुमनवा, बरादा, बकोरा, निमोनिया टाड़ जैसे कुछ टोलों का नाम भी गिनवा देते हैं, जहां बिजली अब तक नहीं पहुंची है.

सिरका मुंडा बिजली के सवाल पर साफगोई से कहते हैं, हमारे यहां बिजली नहीं आई है. बिजली नहीं होने से रात में कहीं आने-जाने में बहुत परेशानी होती है. हम जंगल में रहते हैं, तो जंगली जानवरों का डर भी रहता है. बिजली आती, तो हम मोटर लगा कर कुएं से पानी निकाल लेते और खेतों में सिंचाई भी कर देते. यही नहीं, बिजली आने से किरासन तेल पर होनेवाला खर्च भी बच जाता.

शत-प्रतिशत घरों में बिजली पहुंचा देने के बिहार सरकार के दावे की तरफ सिरका मुंडा का ध्यान दिलाने पर उन्होंने कहा, ‘सरकार का यह कहना गलत है. हमलोग जंगल में रहते हैं. जंगल के निवासी हैं. लेकिन, हमने तो अब तक अपने यहां बिजली नहीं देखी. हां, शहरों में जाते हैं, तो दिखती है. सभी घरों में बिजली पहुंचा देने का सरकार का दावा गलत है.’

दरअसल, सद-फीसद घरों में बिजली पहुंचाने के दावे में ‘इच्छुक’ और ‘अनिच्छुक’ का खेल है.

ऊर्जा विभाग से जुड़े एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, ‘बिजली कनेक्शन लेने के इच्छुक सभी घरों में सरकार ने बिजली पहुंचा दी है और इसी के आधार पर सरकार का दावा है कि शत-प्रतिशत घर बिजली से रोशन हो गए हैं.’

इच्छुक लोगों से सरकार का मतलब उन लोगों से है, जो जिला प्रशासन की तरफ से लगाए गए कैंपों में गए और बिजली के लिए आवेदन किया. जिनको कैंप के बारे में नहीं पता या जो लोग जानकारी के अभाव में आवेदन नहीं दे पाए, वे इस आंकड़े में नहीं हैं.

एक अन्य अधिकारी ने कहा, ‘जिला प्रशासन की तरफ से राज्य सरकार को जो रिपोर्ट दी गई, उसी के आधार पर सरकार ने दावा किया कि 100 प्रतिशत घरों में बिजली पहुंच गई है.’ लेकिन, सरकार ने घोषणा करते वक्त चालाकी से यह बात छिपी ली कि 100 प्रतिशत रोशन घर वे घर हैं, जिनके मालिकों ने बिजली के लिए आवेदन किया.

इस संबंध में राज्य के ऊर्जा मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव से जब बात की गई, तो उन्होंने 100 प्रतिशत की जगह 99 प्रतिशत घरों में बिजली पहुंचने की बात कही.

बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा, ‘जिला, प्रखंड व पंचायत स्तर पर कैंप लगा कर लोगों से बिजली के लिए आवेदन करने को कहा गया था. जिन्होंने आवेदन किया था, उन्हें बिजली मिल गई है. सरकार के लिए यह संभव नहीं है कि घर-घर जाकर हर आदमी से पूछे.’

मंत्री का यह कहना कि हर घर में जाकर पूछा नहीं जा सकता है, व्यावहारिक स्तर पर सही हो सकता है। लेकिन, सवाल तो यह उठता ही है कि वोट मांगने के लिए नेता घर-घर जा सकते हैं, तो बुनियादी सुविधाएं देने के लिए घर-घर जाने में उन्हें क्या दिक्कत है ?

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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