कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

मोदी-नीतीश के 100% इलेक्ट्रिफाइड प्रदेश में बिजली से महरूम महादलित बस्ती, नवादा से GROUND REPORT

बिहार सरकार के रिकॉर्ड में एक नवंबर तक बिहार के हर घर में बिजली पहुंच गई है, लेकिन जमीनी हकीकत इस रिकॉर्ड को झूठा बताती है.

ढेउरी (नवादा): “बिजली नय होए से दिक्कत नय होतई सर? अनहरिया में रहहिए. किरासन तेलो बंदे हो गेलई. सोलरबा पर कईसहु बल जलयलिओ (दिक्कत नहीं होगी सर? अंधेरे में रहना पड़ता है. किरासन तेल बंद हो गया है. सोलर से किसी तरह घर उजाला करते हैं).”

ये शब्द हैं 45 वर्षीय बिगनी देवी के. बिगनी देवी का घर बिहार के नवादा जिले के हिसुआ ब्लॉक के ढेउरी रेवेन्यू गांव में है.

बिगनी गांव के ये बेचारगी भरे शब्द बिहार सरकार के उस दावे पर जोरदार तमाचा है, जिसमें सरकार ने कहा है कि बिहार के सौ फीसदी घरों तक बिजली पहुंच गई है.

बिगनी देवी का कहना है कि बिजली नहीं होने से बड़ी दिक्कत होती है. (फोटो : उमेश कुमार राय)

बिहार सरकार के रिकॉर्ड में एक नवंबर तक बिहार के हर घर में बिजली पहुंच गई है, लेकिन जमीनी हकीकत इस रिकॉर्ड को झूठा बताती है.
ऊपर जिस बिगनी देवी का ज़िक्र आया है, वह ढेउरी रेवेन्यू गांव के विनोबा नगर टोले में रहती है. चूंकि इस टोले में सभी महादलित हैं, इसलिए इसे महादलित टोला भी कहा जाता है.

यहां 20 से 25 घर हैं, ये लोग 25 साल पहले यहां आकर बसे हैं. इनके पास वोटर कार्ड, आधार कार्ड समेत अन्य सारे दस्तावेज हैं, जो साबित करते हैं कि वे बिहार के नागरिक हैं और इनका आवास महादलित टोले में है. लेकिन, किसी भी घर में बिजली नहीं पहुंची है.

यहां के घरों में उजाले का एकमात्र जरिया सोलर लाइट है, जिसे टोले के लोगों ने अपने बूते लगवाया है. लेकिन, सोलर लाइट की अपनी सीमा है. उसके लिए सूरज की रोशनी की जरूरत होती है.

बिगनी देवी कहती हैं, ‘जर-जानवर के हल्ला होलो तऽ टार्च जलयली. रतिया में तऽ अन्हरिए में बाले-बच्चे सुतलिअ.’

उन्हें जब याद दिलाया जाता है कि नीतीश कुमार ने कहा है कि हर घर में बिजली पहुंच गई है, तो वह हंसने लगती हैं. फिर कहती हैं, ‘पर इहां तऽ नय पहुंचलय.’

न बुनियादी सुविधाएं, न रोजगार

इन घरों तक पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है. खेतों की मेड़ पकड़ कर वहां तक पहुंचा जाता है. टोले में 25 से 30 बच्चे हैं, लेकिन उनके लिए न तो कोई आंगनबाड़ी केंद्र है और न ही स्कूल.

बच्चों को पढ़ने के लिए दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. पूरा इलाका जंगलों व पहाड़ों वाला है, इसलिए सियार-गीदड़ जैसे जंगली जानवरों का दिखना स्वाभाविक है.

हरिजन टोले में कोई आंगबाड़ी केंद्र भी नहीं चलता है. बच्चों के पढ़ने के लिए जो स्कूल है, वह दो किलोमीटर दूर है. ((फोटो : उमेश कुमार राय)

इसी टोले की बुजुर्ग महिला उर्मिला देवी कहती हैं, ‘बच्चे अकेले पढ़ने जाते हैं. रास्ते में सियार-गीदड़ मिल जाते हैं, जिन्हें देखकर डर जाते हैं. ऐसा कई बार हो चुका है और इसके बाद कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता है.’

यहां रहनेवाले लोग भूमिहीन हैं. उनके पास जॉब कार्ड तो है, लेकिन किसी को भी मनरेगा के तहत काम नहीं मिलता है, नतीजतन उन्हें खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ती है.

गांव के बुजुर्ग बनवारी राजवंशी बिजली से होनेवाली सहूलियतों का जिक्र करते हुए कहते हैं, ‘बहुत दिक्कत है सर. लाइन आ जयतई त बोरिंग करा सकबई. बच्चा बुतरू रोशनी में पढ़तई.’ नीतीश कुमार के दावे के सवाल वह कहते हैं, ‘हमारी तरफ तो बिजली पहुंची ही नहीं, तो झूठ ही न बोल रही है सरकार!’

किरासन तेल उजाले का जरिया

इस महादलित टोले से ही थोड़ी दूर पर एक और टोला बसा हुआ है. यह टोला भी ढेउरी गांव में ही आता है. यहां मांझी समुदाय के लोग रहते हैं. इस टोले में करीब 40 घर होंगे, लेकिन उन घरों तक भी बिजली नहीं पहुंची है.

अलबत्ता सालभर पहले बिजली के खंभे जरूर खड़े कर दिए गए थे. उनमें तार भी लग गया है. यह मोहल्ला भी 20-25 साल पहले आबाद हुआ है. पहले ये लोग दूसरे गांव में थे. जगह की कमी के कारण यहां आ गए.

यह टोला एकदम पहाड़ की तलहटी में बसा हुआ है. टोला निवासी कुंतारी मांझी कहते हैं, ‘बिजली नहीं होने से बड़ी दिक्कत होती है. अंधेरे में रहना पड़ता है. कोटे (राशन दुकान) से हर महीने 1 लीटर किरासन तेल मिलता है. उसी से किसी तरह घर रोशन करते हैं.’

पहाड़ की तलहटी में बसे ढेउरी गांव के इस टोले में बिजली अब तक नहीं पहुंची है. (फोटो : उमेश कुमार राय)

इसी टोले में रहनेवाले सौदागर मांझी गुस्सा होकर कहते हैं, ‘बिजली नहीं रहने से दिक्कत तो होती ही है, लेकिन क्या करें? बिजली विभाग के अधिकारी आकर बोले हैं कि एक-दो महीने में बिजली आयेगी. सरकार दावा कर रही है कि सभी घरों में बिजली पहुंच गई, लेकिन सच्चाई तो आप देख ही रहे हैं.’

यहां रहनेवाले लोग भी भूमिहीन हैं. घर चलाने के लिए वे दूसरों के खेत में मजदूरी करते हैं. घरों की महिलाएं व बच्चे पहाड़ से पत्थर लाकर उनके छोटे-छोटे टुकड़े कर बेचते हैं.

जब हम इस टोले में पहुंचे, तो गुनगुनी धूप में बैठी महिलाएं व बच्चे छोटी-छोटी हथौड़ियों से पत्थर तोड़ रहे थे.

हालांकि, ऐसा नहीं है कि पत्थर तोड़ कर उन्हें अच्छी कमाई होती है. एक परिवार के दो सदस्य दिनभर पत्थर तोड़ते हैं, तो ज्यादा से ज्यादा 3 टोकरी ही गिट्टी तैयार कर पाते हैं. एक टोकरी गिट्टी के बदले 25 रुपए मिलते हैं.

कुंतारी मांझी का कहना है कि कोटे से हर महीने एक लीटर किरासन तेल मिलता है, उसी से रात में घरों को रोशन किया जाता है.

दिलचस्प बात ये भी है कि इसी गांव के अन्य टोले-मोहल्लों में बिजली पहुंच गई है. और तो और महादलित टोले के करीब से ही बिजली का तार ले जा गया है, जिनकी मदद से बोरिंग चला कर पटवन की जाती है. लेकिन, महादलित टोले में बिजली देना जरूरी नहीं समझा गया.

उल्लेखनीय है कि 2015 में बिहार में जब महागठंबधन की सरकार बनी थी, तो सीएम नीतीश कुमार ने ‘मुख्यमंत्री सात निश्चय योजना’ शुरू की थी. इन सात निश्चयों में हर घर में बिजली पहुंचाना भी शामिल था.

बाद में केंद्र सरकार ने ‘प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना – सौभाग्य’ योजना शुरू की, तो बिहार सरकार की हर घर बिजली योजना को सौभाग्य योजना में शामिल कर लिया गया.

सौभाग्य की वेबसाइट के आंकड़े

सौभाग्य की वेबसाइट बताती है कि बिहार में कुल घरों की संख्या 1,39,73,122 है. इनमें से 10 अक्टूबर 2017 तक 1,07,14,081 घरों तक बिजली पहुंचाई जा चुकी थी. 10 अक्टूबर के बाद शेष घरों यानी 32,59,041 घरों को रोशन कर दिया गया.
सौभाग्य की वेबसाइट में ऐसे घरों का खाने में शून्य लिखा हुआ है, जहां अभी तक बिजली नहीं पहुंची है और इलेक्ट्रीफाइड घरों के खाने में 100 प्रतिशत लिखा गया है.

जिलावार आंकड़े भी बताते हैं कि सभी जिलों के सभी घरों में बिजली पहुंचा दी गई है. सौभाग्य वेबसाइट के अनुसार नवादा में कुल 3,36,388 घर हैं. इनमें से 1,79,306 घरों तक बिजली 10 अक्टूबर 2017 तक पहुंचा दी गयी थी और बाकी 1,57,082 घरों में 10 अक्टूबर के बाद बिजली पहुंच गई.

यहां भी बता दें कि नवादा जिले को सबसे पहले 100 प्रतिशत इलेक्ट्रिफाइड जिला घोषित किया गया था.

स्थानीय भाजपा विधायक अनिल सिंह से जब इस संबंध में बात की गई, तो उन्होंने पहले कहा कि हिसुआ विधानसभा क्षेत्र के सभी घरों में बिजली पहुंच गई है. लेकिन, उनसे जब दलित टोलों में बिजली नहीं होने की बात कही गई, तो उन्होंने स्वीकार किया कि वहां बिजली नहीं पहुंची है.

सिंह ने कहा, ‘वे टोले सूचीबद्ध हैं.हमारे संज्ञान में है. कृषि में सिंचाई के लिए जब फीडर लगेंगे, तो उसी दौरान उनके घरों तक बिजली पहुंचा दी जाएगी.’
राजद नेता आलोक मेहता ने बिहार सरकार के शत-प्रतिशत घरों में बिजली पहुंचा देने के के दावों पर चुटकी ली और कहा बहुत सारे दलितों-महादलितों व कमजोर तबकों तक अभी तक बिजली नहीं पहुंची है.

उन्होंने कहा, ‘बिजली को लेकर सरकार गलत आंकड़े दे रही है. सरकार को एक स्वतंत्र एजेंसी के जरिए सर्वेक्षण कर पता लगाना चाहिए किन घरों तक अब तक बिजली नहीं पहुंची है.’

अधिकारी का तर्क

बिजली विभाग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि बिजली के कनेक्शन के लिए लोग आवेदन दे सकें, इसके लिए जगह-जगह कैंप लगाए गए थे. इन कैंपों में जिन्होंने भी आवेदन किया, उन्हें बिजली कनेक्श दे दिया गया है.

सौदागर मांझी के पास अपना खेत नहीं है. वह दूसरों के खेत में मजदूरी करते हैं और खाली वक्त में परिवार के साथ पत्थर तोड़ कर गिट्टी बनाते हैं. (फोटो : उमेश कुमार राय)

नवादा जिले के इलेक्ट्रिकल एक्जिक्यूटिव इंजीनियर राजकुमार ने कहा, ‘जुलाई 2018 तक जितने भी लोगों ने बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन दिया था, सभी को कनेक्शन दे दिया गया है.’

उन्होंने यह भी दावा किया कि नवादा के शत-प्रतिशत घरों में बिजली पहुंचा दी गई है. राज कुमार ने कहा, ‘हर गांव में लगातार 5-6 महीने तक कैंप लगाकर लोगों को बिजली कनेक्शन लेने के लिए जागरूक किया गया. मुझे नहीं लगता है कि नवादा के किसी भी घर में बिजली नहीं पहुंची होगी.’

लेकिन, महादलित टोले के सभी लोगों ने एक सुर में कहा कि ऐसा कोई कैंप लगा है, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है. यहां यह भी दिलचस्प है कि दलित टोले ही बिजली से वंचित रह गए हैं.

सीएम नीतीश कुमार अक्सर सामाजिक न्याय की बात करते हैं. लेकिन सवाल ये उठता है कि नीतीश कुमार का यह कैसा सामाजिक न्याय है, जो महादलितों को विकास के आंकड़ों से अलग-थलग रखे हुए है?

( उमेश कुमार राय एक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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