कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: क्या 300 किसानों की लाश पर हवाई जहाज उड़ाने की तैयारी में है नीतीश-मोदी की जोड़ी?

कल पूर्णिया लोकसभा सीट के लिए होने वाले मतदान का बहिष्कार करेंगे किसान

“नेता लोग का इलेक्शन का समय आता है तो हमको वोट दे दीजिए..विकास करेंगे हम. पर विकास क्या करेंगे उ लोग..गरीब किसान का सब जमीन ले लेगा..हवाई अड्डा बना देगा. उसका विकास तो हो जाएगा कि वो जहाज पर चढ़कर दिल्ली घूमेगा..बंबई घूमेगा. लेकिन गरीब किसान कहां जाएगा. यहां तो पहले भी हमारा जमीन लिया गया है…फिर से ले लेंगे तो जी नहीं पाएंगे.”

यह कहते-कहते प्रदीप मेहता(45) लगभग रुआंसी हो गए. कुछ देर रुककर भरे गले से बोले, “ज़मीन चला जाएगा तो हम क्या खाएंगे. हम तो रोड छाप हो जाएंगे. नेता लोग तो अपना जहाज बना लेगा और उड़ते रहेगा बिहार से दिल्ली. हमलोग का क्या विकास होगा- किसान को मार दो हमारा विकास कर दो. हम जान देंगे ज़मीन नहीं देंगे.”

प्रदीप मेहता, फ़ोटो-दीपक कुमार

पूर्णिया में 18 अप्रैल को मतदान होना है. लेकिन कृत्यानंद नगर प्रखंड के गोआसी गांव के किसान इस बार अपना वोट नहीं डालेंगे. उन्होंने सामूहिक रूप में वोट बहिष्कार करने का फैसला लिया है. दरअसल, चूनापुर सैन्य हवाई अड्डा( पूर्णिया) के दक्षिण में नागरिक उड्डयन के लिए एयरपोर्ट बनाया जाना है, जिसके लिए राज्य सरकार 53 एकड़ की जमीन अधिगृहीत कर रही है. यह सारी ज़मीन गोआसी गांव के किसानों का है. जो अपने जीविका के लिए पूरी तरह खेती पर निर्भर है. किसानों का कहना है कि यह सारी जमीन बहुफसलीय और आवासीय है. यदि जमीन अधिग्रहण होता है तो हमारे सामने आर्थिक ही नहीं बल्कि शैक्षणिक और सामाजिक विपन्नता आ जाएगी. हम फिर कहीं के नहीं रहेंगे.

पहले सैन्य हवाई अड्डा के लिए खुशी से दिया था ज़मीन- बात देश की थी…लेकिन अब नहीं

पूर्णिया शहर से महज़ दस किलोमीटर की दूरी पर ही वायु सेना का चूनापुर हवाई अड्डा है. यह हवाई अड्डा दक्षिण में गोआसी गांव से सटा है. 1962 में चीनी आक्रमण के तुरंत बाद देश की सुरक्षा के लिए सैन्य हवाई अड्डा बनाने की ज़रूरत बनी तो गांव वालों ने अपनी जमीन खुशी खुशी दे दीं. लेकिन इस बार नागरिक उड्डयन की बात है.

सुनिल यादव(50) कहते हैं, “1962 में सेना वार के समय गोआसी मौज़ा से 2500 एकड़ ज़मीन पहले ही ले लिया गया था. उस टाइम हमारे बुजुर्ग ने सोचा कि देश की बात है इसलिए कुछ नहीं बोलना है. दुख सहते हुए भी खुशी से ज़मीन दे दिया. कई किसान तो मज़दूर बन गए. उनके बच्चे इसी कारण नहीं पढ़ पाएं. अब हमारे पास कट्ठों में ही ज़मीन बचा है. जिसमें सब्जी लगाकर अपना जीवन चला रहे हैं. अब पुन: सरकार ज़मीन ले रही है. यदि इस बार ज़मीन कटेगा तो हमलोग जाएंगे कहां?”

सुनिल यादव, फ़ोटो- दीपक कुमार

यह सच है कि गांव वालों के पास अब उतनी ज़मीन नहीं रह गई है. प्रभावित किसान लघु और सीमांत हैं. किसी के पास पांच कट्ठा ज़मीन है तो किसी के पास दस कट्ठा. पूरा परिवार खेती पर ही निर्भर है.

झालो देवी(65) का घर भी अधिगृहित क्षेत्र के अंदर आता है, कहती हैं, “मेरे पास खेती के लिए दस कट्ठा ज़मीन है, वो तो नापी के अंदर आ ही गया है साथ में घर भी उसके अंदर आ गया है. छोटे-छोटे पोता-पोती हैं. घर तोड़ देंगे तो फिर इन्हें लेकर कहां जाएंगे?”

गांव के पुरुष किसान हों या महिला, बस एक ही बात जुबां पर है- जान देंगे पर ज़मीन नहीं देंगे. किसानों का कहना है कि कोई भी मुआवज़ा हमारे खेत की बराबरी नहीं कर सकता. हमारे खेत बहुफसलीय है..इतनी उपजाऊ है कि कुछ भी बो दें लहलहा जाएगा.

कोई भी मुआवज़ा हमारे दु:ख को कम नहीं करेगा

यह पूछने पर कि क्या सरकार आपको सही मुआवज़ा देगी तो क्या आप ज़मीन दे देंगे? इसके जवाब में बुजुर्ग शिवपूजन मेहता(70) कहते हैं, “न इस बार सरकार सौ-दो सौ किसानों का हत्या कर दे. हम तैयार हैं. हम मान ही नहीं सकते हैं” शिवपूजन मेहता के गुस्से को सुनिल यादव आगे विस्तार देते हैं, “मान लीजिए मेरे पास पांच कट्ठा ज़मीन है, सरकार मुझे मुआवज़े के रूप में दस लाख रुपए देती है. दस लाख में मेरे परिवार का जीवन भर परवरिश हो जाएगा? उसी पांच कट्ठे जमीन से हम यहां प्रत्येक साल दो-ढाई लाख कमा लेंगे. आप देखिएगा तो मक्का यहां साढ़े छह-सात मन कट्ठा हो जाता है. गेहूं पचास मन कट्ठा होता है. कम ज़मीन में हम बहुत अधिक पैदावार करते हैं. गोआसी का सब्जी बाहर तक सप्लाई होता है. अब इस ज़मीन को हम कैसे देंगे? ज़मीन जाने के बाद वैसे भी जान जाएगी..उससे पहले ही हमारी जान ले ले सरकार.”

सब्जी का खेत दिखाता ग्रामीण, फ़ोटो-दीपक कुमार

प्रभावित किसानों का कहना है कि पूर्णिया में बहुत खाली बंजर ज़मीन है. एयरपोर्ट के गेट के सामने ही कई एकड़ जमीन ऐसे ही खाली है. लेकिन सरकार बहुफसलीय ज़मीन को अधिग्रहण करने में लगी है.

इसी गांव के निवासी कणक लाल मेहता(70) जो पूर्णिया सिविल कोर्ट में वकील हैं. भूमि अधिग्रहण से जुड़ी किताब को दिखाते हुए कहते हैं, “क़ानून यह है कि कृषि भूमि या बहुफसलीय योग्य भूमि का अधिग्रहण अंतिम उपाय के रूप में किया जाना है. लेकिन यहां तो सबकुछ उलटा ही है. पूर्णिया में और ज़िले के बाहर भी ऐसी बहुत ज़मीनें हैं जो उपजाऊ नहीं है, लेकिन सरकार उसका अधिग्रहण नहीं कर रही है.”

कणक लाल मेहता दो भाई हैं, इनकी आठ एकड़ ज़मीन अधिग्रहण क्षेत्र में जा रही है. आगे बताते हैं, “सरकार यदि किसी प्रोजेक्ट के निर्माण हेतु जमीन अधिगृहित करती है तो उसे सत्तर फीसदी किसानों की सहमति लेनी होगी, तब ही जाकर आगे की प्रोसेस करेगी. लेकिन हमलोगों से तो कोई पूछने भी नहीं आया. जब पटना से सोशल इम्पैक्ट एसेसमेंट(एसआईए) की टीम आई तो हमने साफ़ कह दिया कि हम ज़मीन देने के बिल्कुल पक्ष में नहीं है. लेकिन प्रशासन और सरकार ऊपर ऊपर ही काम को आगे बढ़ा रही है.”

गोआसी गांव में जिन लोगों की ज़मीन जा रही है वो मूलत: दलित और पिछड़े वर्ग से संबंध रखते हैं. इसमें पासवान, मेहता और यादव प्रमुख हैं.

सुनिल यादव ज़मीन अधिग्रहण को लेकर सामाजिक पहलू को जोड़ते हैं, “कलक्टर ब्राह्मण परिवार से आते हैं. और ये हमारे साथ जातिवादी कर रहे हैं. पूरब में बमडम के बगल में ज़मीनदारों की ज़मीन ऐसे ही खाली है…एयपोर्ट के सामने भी जमीन खाली है. लेकिन वो नहीं ले रहे हैं लेकिन जिन किसानों के पास पांच-दस कट्ठा जमीन है उसको छीन रहे हैं.”

मुख्यमंत्री, गृहमंत्री और प्रधानमंत्री सबको लगाई गुहार पर किसी ने नहीं सुना

गांव वालों ने अपनी ज़मीन बचाने के लिए अधिकारियों के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, गृहमंत्री राजनाथ सिंह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक गुहार लगा चुके हैं. लेकिन इनकी सुध कोई नहीं लिया. कणक लाल मेहता बताते हैं, “मैंने इस संबंध में मुख्यमंत्री, गृहमंत्री यहां तक की प्रधानमंत्री को भी फ़ैक्स किया है..लेकिन कहीं से कुछ जवाब नहीं आया. अब हम किसे कहें. पिछली बार तो पूरा गांव का वोट मोदी जी को ही गया था.”

पिछली बार मोदी लहर में संतोष कुशवाहा यहां से सांसद चुने गए थे. इस बार भी एनडीए ने उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित किया है. यह पूछने पर कि चुनावी मौसम में सांसद जी नहीं आए? इस पर एक युवा गुस्से में कहता है, “पूर्णिया का सांसद कठपुतली है. उसको हिम्मत ही नहीं कि वो ऊपर तक बात को पहुंचा पाए. वो तो दारू माफिया है और दारू माफिया जैसा ही काम करता है.”

सुदामा मेहता कहते हैं कि यहां एयरपोर्ट बनाना बस नेताओं की खेलबाज़ी है. आम आदमी इतना अमीर कहां कि प्लेन पर चढ़ेगा. नेता लोग ही दिल्ली ढाका जाता है.

प्रशासन को गुहार

बता दें कि चूनापुर सैन्य हवाई अड्डे से 6 नवम्बर 2012 से हवाई यात्रा शुरू हुई थी. बंगलुरू की स्पिरिट एयर प्राइवेट लिमिटेड द्वारा चार्टेड प्लेन सेवा पटना एवं कोलकाता के बीच शुरू की थी. नौ सीटों वाले इस विमान की सेवा तीन माह चली भी लेकिन फिर राजस्व की कमी को लेकर यह सेवा तीन माह बाद बंद हो गई.

गांव वालों का साफ़ कहना है कि यहां सीमांचल में रेल सर्विस तो सही ही नहीं, प्लेन सर्विस कैसे ठीक हो जाएगा. सरकार आगे रेल का परिचालन ठीक करे. इतने बड़े इलाके के लिए दिल्ली जाने के लिए बस एक ट्रेन है.

प्रभावित किसानों की स्थिति का सोशल इम्पैक्ट एसेसमेंट करने गए पदाधिकारियों में से एक रिर्सच इंजीनियर मिथलेश बताते हैं कि “हमलोग जब वहां गए थे तो हमारे साथ वहां के सीओ भी थे. उन्हें भी कहा गया..समझाया गया. लेकिन उनका कहना था कि ‘सरकार का अपना भी नियम है.’ अब इस पर क्या कहा जाए, हमें जो काम दिया गया वो करके वहां से आ गए. हमने रिपोर्ट में अपना सुझाव भी दिया है. गांव वालों का तो साफ़ कहना है कि जान देंगे जमीन नहीं देंगे.”

इस मामले को लेकर कृतिनगर प्रखंड के अंचालाधिकारी अनुज कुमार कहते हेैं, “मैं यहां नया आया हूं. बस मुझे जानकारी है कि वहां से ज़मीन लिया जाना है. कर्मचारी भी बताए हैं कि किसानों की समस्या है. अब पूरी जानकारी तो मुझे नहीं है.”

गोआसी गांव, अधिग्रहण क्षेत्र में आता ज़मीनें, फ़ोटो-दीपक कुमार

वहीं पूर्णिया के ज़िलाधिकारी प्रदीप कुमार झा फ़ोन नहीं उठाते हैं. हालांकि न्यूज़सेंट्रल24×7  की टीम ने इस बाबत उन्हें एक मेल भी किया है. अभी तक उसका जवाब नहीं आया है.

बता दें कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी खुद यहां से सेवा शुरू करने को लेकर नागरिक उड्यन विभाग से कई बार रक्षा विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेने का अनुरोध किया था. राज्य के मुख्य सचिव अंजनी कुमार ने इस एयरपोर्ट के विस्तार के लिए एयर वाइस मार्शल राजेश इस्सर ने राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजा था.

गोआसी गांव के का कहना है कि पिछली बार के अधिग्रहण में हम नहीं पढ़ पाए थे. इस बार के अधिग्रहण में हमारे बच्चे को पढ़ाने को क्या खाने और रहने को कुछ नहीं बचेगा. हम किसी क़ीमत पर यह ज़मीन सरकार को नहीं देंगे. इस बार हम सामूहिक रूप से वोट बहिष्कार करेंगे.

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