कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: ना सड़क, ना स्कूल और ना ही शौचालय- क्या अपने नाम की क़ीमत चुका रहा है पूर्णिया का पाकिस्तान टोला?

"हम कहेंगे तो आप ताज़्जुब करेंगे..लेकिन गांव में अख़बार नहीं आता, और न ही यहां टीवी है. कोई पढ़ने वाला है ही नहीं तो अख़बार कौन लेगा."

क्या इस पाकिस्तान की लड़कियां नहीं बोलतीं? इसके जवाब में सीता देवी की भौंहें चढ़ जाती हैं. गुस्से में कहती हैं, “स्कूल ही नहीं है तो क्या जानेंगी…आय? रोड है ही नहीं तो स्कूल कहां से बनेगा…सरकार बनाती ही नहीं तो ये कहां से पढ़ लेंगी और कहां से बोल लेंगी?”

सीता देवी(45) संथाली आदिवासी हैं. टूटी-फूटी हिंदी के सहारे ही सरकार और मीडिया को कोस रही हैं, “बंटवारे से पहले ही यहां पाकिस्तानी रहते थे. मीडिया वाले इस नाम पर हमेशा आते रहते हैं, लेकिन एक स्कूल भी नहीं बना. बाल-बच्चे को कहां पढ़ाएं….बस्ती तक एक भी रोड आया? इस पाकिस्तान तक? हमें आपलोगों से बात ही नहीं करनीं”

इस पाकिस्तान तक? किस पाकिस्तान की बात कर रही हैं सीता?

पूर्णिया शहर से 30 किलोमीटर दूर अररिया सीमा के नज़दीक भारत में एक पाकिस्तान बसता है. जिसका नाम है पाकिस्तान टोला. श्रीनगर प्रखंड के सिंघिया पंचायत का यह गांव जहां संथाल आदिवासी सुमदाय के तकरीबन 30 घर हैं, अपने नाम के कारण ही हमेशा सुर्खियों में रहा है. पाकिस्तान टोला नाम होने के वज़ह से स्थानीय और बाहरी मीडिया हमेशा इस गांव का चुनावी कवरेज़ भी करता रहा है. इसके बावजूद हज़ार से ऊपर आबादी वाले इस गांव में ना अस्पताल है, ना स्कूल है और न ही गांव तक पहुंचने के लिए कोई सड़क. ऐसा लगता है कि वाकई में यह गांव अपने नाम के कारण उपेक्षा का शिकार बनते आ रहा है.

पाकिस्तान टोला
प्रस्तावित सड़क में मिट्टी भराई की योजना, फ़ोटो-दीपक कुमार

गांव के बशिंदों को इस बात की पुख़्ता जानकारी नहीं कि गांव का नाम आख़िरकार पाकिस्तान टोला कब पड़ा. उन्हें इस नाम से अब आपत्ति भी नहीं. वो बताते हैं कि अब आस-पास के लोगों को इस बात की जानकारी है कि पूर्णिया में एक पाकिस्तान टोला भी है. हां, पहले लोगों का पता नहीं था.

गुरु बेसरा(50) जो पूर्णिया में मज़दूरी का काम करते हैं, नाम को लेकर एक प्रसंग सुनाते हैं, “तकरीबन बीस से पचीस साल पहले की बात है. श्रीनगर से एक सीओ साहब को पाकिस्तान टोला आकर निरीक्षण करने का आदेश मिला था. उन्होंने काग़ज़ पर देखा कि नाम में पाकिस्तान टोला लिखा है. वो इस बात के लिए उत्सुक थे कि जाकर देखे कि यहां कौन लोग रहते हैं. उस समय गांव में आने के लिए पुल भी नहीं था…भरी बरसात में नदी पारकर गांव पहुंचे. लेकिन वो देखते हैं कि यहां तो बिल्कुल संथाल आदिवासी के लोग हैं. दूसरा जात के लोग तो यहां हैं ही नहीं. सीओ साहब भी पूछे कि आपलोगों ने इस गांव का नाम पाकिस्तान क्यों रखा है? हमलोग जवाब क्या देते..यह तो पहले से ही चलता आ रहा था. उन्होंने उसी समय गांव का नाम बदल दिया था..लेकिन बदला हुआ नाम न मुझे याद है और न किसी और को याद है. नाम पाकिस्तान टोला ही अब तक बना हुआ है.”

सरकारी तंत्र की उपेक्षा का शिकार है पाकिस्तान टोला

बिहार सरकार के लिए विकास का पैमाना समझी जाने वाली चमचमाती सड़क सिंघिंया पंचायत तक पहुंचती तो है लेकिन इस पाकिस्तान के शुरू होने से बहुत पहले ही ख़त्म हो जाती है. फिर गांव तक पहुंचने के लिए धूल-धूसरित मिट्टी की ऊभर-खाबड़ सड़क का सहारा लेना पड़ता है. हालांकि यह भी खतरा मोल लेना जैसा ही है. थोड़ी सी भी चूक से संतुलन बिगड़ सकता है और गंभीर चोट लग सकती है.

पाकिस्तान टोला
सिंघिया पंचायत से पाकिस्तान टोला जाने वाली सड़क, फ़ोटो-दीपक कुमार

लोगों में इस बात का काफ़ी रोष है कि तमाम सरकारें आईं और गईं लेकिन हमारे गांव के लिए एक सड़क नहीं बन पाई. दुल्ला मुड़मुड़ मोदी सरकार से नाराज़गी जताते हुए कहते हैं, “भाषण तो देता है…भाषण देने से होगा या काम करने से होगा. कहां कुछ हुआ..सड़क भी नहीं बनवाया. रोड भी नहीं भरवाया. एक बिजली आई है…पर मोटर है नहीं. पंजाब में जाकर देखिए बिजली के साथ घर-घर में मोटर है.”

पाकिस्तान टोला में अधिकतर लोग खेती मज़दूरी करते हैं. अपने खेतों में धान और मक्का लगाते हैं. बाकी मज़दरी के लिए पूर्णियां के अलावा बिहार से बाहर कलकत्ता, दिल्ली और पंजाब भी जाते हैं. दुल्ला मुड़मुड़ का अपना दो एकड़ खेत है, बताते हैं कि “हम जो भी उपजाते हैं उसे बनिया को बेचना पड़ता है. सरकारी रेट यहां नहीं मिलता. व्यापारी यहां अपने घोड़े-गधे को लेकर आते हैं और फसल उठा ले जाते हैं. फिर वो उसे मंडी में बेचते हैं. गुलाब बाग़ मंडी(पूर्णिया की बड़ी मंडी) तक तो हमारी पहुंच ही नहीं है.”

क्या पाकिस्तान नाम होने के कारण सड़क नहीं बनी? इसके जवाब में गुरु बेसरा कहते हैं कि “मुझे तो मालूम है कि यह पाकिस्तान टोला पूर्णिया में ही है. अब विकास का क्या कहा जाए. इस गांव का मुखिया गंगा राम टुडु भी हमारे जात का ही है. लेकिन ये बात सही है कि जात रहे पात रहे..चुनाव जीत जाने के बाद लोग भूल जाते हैं.”

पाकिस्तान टोला
गुरु बसेरा

गुरु बसेरा के साथ लाल जी मरांडी भी बैठे हुए हैं जो बगल के गांव से आए हैं, टूटी-फूटी हिंदी में बोलते हैं, “मोदी जी कर रहा है..लेकिन गांव-घर में विकास नहीं कर पा रहा. हमलोग को काफ़ी दिक्कत हो रहा है. कौन क्या करेगा मालूम नहीं चल रहा है.”

ना स्कूल ना अस्पताल

गांव में अधिकतर लोग अनपढ़ ही हैं. कुछ लोग पांचवीं तक ही पढ़ पाए हैं. इसका कारण है- गांव में स्कूल का न होना. सिंघिंया पंचायत का माध्यमिक विद्यालय पाकिस्तान टोला से लगभग दो से ढाई किलोमीटर की दूरी पर है. सड़क की स्थिति भी अच्छी नहीं है. बरसात में तो गांव शहर से बिल्कुल कट जाता है. बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं.

गुरु बसेरा हंसते हुए कहते हैं कि “हम कहेंगे तो आप ताज़्जुब करेंगे..लेकिन गांव में अख़बार नहीं आता, और न ही यहां टीवी है. कोई पढ़ने वाला है ही नहीं तो अख़बार कौन लेगा. मोबाइल कौन चलाएगा सर.”

सिंघिया पंचायत के माध्यमिक विद्यालय में बस आठवीं तक ही पढ़ाई होती है. फिर आगे की पढ़ाई के लिए 12 किलोमीटर दूर श्रीनगर प्रखंड जाना पड़ता है. इसी कारण अधिकतर लड़कियां आगे की पढ़ाई ही नहीं की हैं. दुल्ला टुडु की बेटी पांचवी में पढ़ती है. आगे कितना तक पढ़ाएंगे के सवाल पर कहते हैं, “जितना संभव होगा उतना ही तक न पढ़ाएंगे. स्कूल है ही नहीं. श्रीनगर उतनी दूर लड़की कहां जाएगी…लड़का जाता है सब.”

पाकिस्तान टोला
सिंघिया पंचायत का माध्यमिक स्कूल

गांव में अस्पताल भी नहीं है. यदि कुछ भी हो जाए तो लोगों को सीधे श्रीनगर जाना पड़ता है. विनोद बसेरा बताते हैं कि “किसी की तबियत बहुत खराब हो गई तो टेम्पू(ऑटो) से ले जाना पड़ता है. दिक्कत यह है कि रोड नहीं होने के कारण गाड़ी वाले भी यहां आने में ना-नुकर करते हैं.”

पूर्णिया का श्रीनगर प्रखंड बहुत पुराना नहीं है, इसकी स्थापना वर्ष 1994 में की गई थी. 2011 की जनगणना के अनुसार इस प्रखंड की आबादी तकरीबन एक लाख से ऊपर ही है. लेकिन प्रखंड में बस एक सरकारी अस्पताल है. सुविधाओं की कमी के वज़ह से लोग यहां हमेशा हंगामा करते आए हैं, बावजूद अलग से कोई अस्पताल नहीं खोला गया है.

शौचालय योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना और उज्जवला योजना सब फ़ेल

पाकिस्तान टोला में विकास के नाम पर बस बिजली की तारें दिखती हैं. इसके अलावा सरकार की तमाम योजनाएं यहां फेल हैं. गुरु बसेरा एक सुर में ना, ना…बोल जाते हैं. यह पूछने पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर मिला? तो गुरु बसेरा कहते हैं, “न सड़क, न घर…. और ना ही शौचालय…कुछ नहीं मिला है हमलोग को…कुछ नहीं.” खाना किस चीज़ पर बनाते हैं इसके जवाब में बेसरा बताते हैं, “चूल्हा पर..लकड़ी वगैरह इधर-उधर से चुन कर लाते हैं..उसी पर बनता है.”

गांव के नाम को लेकर मीडिया भले ही काफ़ी दिलचस्पी दिखाती हो. लेकिन गांवों वालों के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है. गांव वालों की नाराज़गी इसी बात की है कि कोई भी बाहर से आता है तो उनसे बस यहीं पूछता है कि गांव का नाम पाकिस्तान क्यों पड़ा.

पाकिस्तान टोला
सीता देवी, जो मीडिया से बात नहीं करना चाहतीं.

गांव वालों का कहना हैं कि “हम नहीं जानते कि गांव का नाम क्यों पाकिस्तान पड़ा..यहां सड़क नहीं है..स्कूल नहीं है. साल में दो बार मीडिया वाले आ जाते हैं लेकिन कुछ नहीं मिलता है..फिर बताते रहो कि गांव का नाम पाकिस्तान क्यों पड़ा?”

हालांकि जब इस संदर्भ में श्रीनगर प्रखंड के विकास पदाधिकारी से संपर्क किया जाता है तो वो बताते हैं कि “पाकिस्तान टोला शहर से कनेक्टेड है. आप वहां जाकर मुझे फोन कीजिए.” जब न्यूज़सेन्ट्रल की टीम उन्हें यह बताती है कि हम उस गांव से हो आए हैं तो वो इधर-उधर की बातें कहकर फ़ोन काट देते हैं.

बता दें कि पूर्णिया में 18 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के लिए मतदान होना है. एनडीए ने संतोष कुशवाहा को अपना उम्मीदवार बनाया है जो इसी सीट से पहले भी सांसद रह चुके हैं. जबकि महागठबंधन ने कांग्रेस के उदय सिंह को मैदान में उतारा है. संथाली परिवार बताते हैं कि हमलोग हमेशा से वोट देते आए हैं. लेकिन चुनाव के समय ही बस नेता हमारे पास पहुंचते हैं. बाकी समय तो गांव उनके लिए किसी टापू की तरह है. सच में पाकिस्तान जैसा ही है. शायद इसलिए वो नहीं आते. लेकिन हम तो इस पाकिस्तान के पीछे पूर्णिया(बिहार) लगाते हैं.

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