कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: चुनावी गर्मी में कैंसर से छटपटाता वैशाली लोकसभा का गोरगामा-टेंगराहा गांव

पिछले कुछ सालों में गोरगामा-टेंगराहा गांव के चार दर्जन से अधिक लोग कैंसर की चपेट में आकर अपनी जान गंवा चुके हैं.

शाम के चार बजे हैं. कैलाश राम के घर के बाहर आसपास की औरतों का जमावड़ा लगा है. दरवाजे के पास सिर पर हाथ रखे कैलाश बैठे हैं. बताते हैं, “सर, चार महीना से परिवार का इलाज करा रहे हैं. जब पटना जाते हैं, तब 10 हजार रुपया लगता है. अभी तक 2 लाख रुपैया कर्जा ले लिए हैं. अब त ऊ बचबो नहीं करेगी. चल के देख लीजिए, अब तब लगा है उसका.”

कैलाश की उम्र 50 साल है. वे मुजफ़्फरपुर जिले के मीनापुर प्रखंड के गोरगामा गांव में रहने वाले एक मजदूर हैं. घर में पत्नी, 4 बेटी के अलावा 2 बेटे भी हैं. एक बेटी की शादी हुई है, बाकि अभी कम उम्र की हैं. बड़ा बेटा 22 साल का है और कुछ सालों से पढ़ाई छोड़कर घर पर बैठा है. कैलाश की 40 वर्षीय पत्नी बेबी पिछले चार महीने से लीवर के कैंसर से पीड़ित हैं. उनका इलाज पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में चल रहा है. अस्पताल सरकारी है, लेकिन फिर भी वहां ईलाज कराने के लिए कैलाश अपनी कुछ ज़मीन बेच चुके हैं.

कैलाश राम

कैलाश कहते हैं, “सर, पटना जाते हैं तो डाक्टर सब पूछता भी नहीं है. दू घंटा चार घंटा इधर उधर करने पर देखने आता है. बिना पैरवी का कोई इलाज नहीं होता है ठीक से. सरकार ने आयुष्मान भारत का कार्ड बनवा दिया है, लेकिन यह भी सिर्फ नाम का है. अस्पताल वाला सस्ता दवाई दे देता है और महंगा दवाई के लिए बाहर भेज देता है. तीन हजार-चार हजार का एक-एक दवाई आता है. इसपर अस्पताल वाला सब कमीशन कमाता है.”

कैंसर पीड़िता बेबी, कैलाश राम की पत्नी

मीनापुर प्रखंड में हैं कई कैलाश राम

मीनापुर प्रखंड के गोरगामा और टेंगराहा गांव में ऐसे कई कैलाश राम हैं, जिनके घर में कोई ना कोई कैंसर से पीड़ित है. यह गांव कैंसर के प्रकोप के कारण चर्चा में रहा है. पिछले दस सालों में यहां करीब चार दर्जन लोगों की मौत कैंसर की वजह से हो गई है. प्रखंड-जिला स्तर से लेकर राज्य और केंद्र की सरकार तक को पत्र लिखा गया है, लेकिन इस ओर किसी ने भी कारगर कदम नहीं उठाए हैं.

गोरगामा और टेंगराहा गांव के हर तबके के लोगों को कैंसर ने अपना शिकार बनाया है. पंचायत के मुखिया अनामिका देवी के ससुर की मौत 2015 में आंत के कैंसर के कारण हो गई. उस समय उनकी उम्र करीब 90 साल थी. कैंसर से उन्होंने लगभग डेढ़ साल तक लड़ाई लड़ी थी. पटना में ही इलाज कराते समय उनकी मौत हो गई.

गोरगामा गांव के ही रामप्रताप साह बताते हैं कि उनके पिता बिन्देश्वर साह छह महीने पहले गुजर गए. उन्हें मुंह का कैंसर हुआ था. रामप्रताप साह बताते हैं, “बाबूजी की उम्र 75 साल के आसपास थी. 10 साल पहले पता चला था कि उन्हें कैंसर है. इसके बाद तीन बार ऑपरेशन हुआ. पटना का ईलाज चला. लाखों रुपया खर्चा हुआ, लेकिन 6 महीने पहले वो चल बसे. अब हमलोग चार भाई मजदूरी करके अपना गुजर बसर कर रहे हैं. सरकार ने हमारा कोई मदद नहीं किया.” राम प्रताप बताते हैं कि उनके पिताजी कभी भी गुटखा या सुपारी नहीं खाते थे. लेकिन फिर भी पता नहीं कैसे कैंसर हो गया.

दरअसल, गोरगामा-टेंगराहा गांव में कैंसर के इस प्रकोप का सही कारण अब तक पता नहीं चल सका है. लगातार कई महीनों तक मांग करने के बाद  अक्टूबर 2017 में जिला प्रशासन के पीएचईडी विभाग ने यहां के चापाकलों की जांच कराई. इस जांच में पाया गया कि चापाकलों में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य है और पानी में कोई समस्या नहीं है. लेकिन, जून 2018 में राज्य सरकार ने यहां के पानी की जांच कराई.

इसमें पाया गया कि इन गांवों के पानी में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है. लेकिन, आर्सेनिक की मात्रा अधिक होने के बावजूद भी अभी तक इससे बचाव की दिशा में कोई कदम नहीं उठाए गए हैं. इसी गांव के संतोष कुमार* बताते हैं,  “डेढ़ साल से हम यहां की समस्या को लेकर मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को लिखते रहे हैं. लेकिन, सिवाय आश्वासन के आज तक कुछ नहीं मिला. सितम्बर 2018 में जिले के डीएम मो. सोहैल के जनता दरबार में गया था. डीएम साहब से कहा था कि पानी में आर्सेनिक की मात्रा अधिक है, इसलिए इससे बचाव के लिए वाटर ट्रीटमेंट प्लान्ट की व्यवस्था गांव में की जाए. जिलाधिकारी ने भी आश्वासन दिया, लेकिन कोई काम नहीं हुआ.”

गोरगामा-टेंगराहा गांव के लोग प्रशासन या नेताओं से कोई उम्मीद करना छोड़ चुके हैं. टेंगराहा दक्षिण टोला के अजय सिंह की उम्र लगभग 42 साल है. वे पिछले पांच सालों से पेट के कैंसर से जूझ रहे हैं. घर में चार नाबालिग बेटियां और एक बेटा है.

कैंसर पीड़ित अजय सिंह

अजय सिंह बताते हैं, “एक रोज अपने खेत से काम करके लौट रहा था. अचानक से पेट में दर्द हुआ. इसके बाद मुजफ़्फरपुर जाकर जांच कराया तो पता चला कि पेट का कैंसर है. पता चलते ही तुरंत मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल ईलाज के लिए चला गया. पांच साल से वहां का ईलाज चल रहा है. हर चार महीने पर मुंबई जाता हूं. एक बार मुंबई जाने में कम से कम 25,000 रुपया लग जाता है. जब पहली बार गया था तब एक कट्ठा जमीन बेचना पड़ा था. अब अगली बार जून के महीने में जाना है. इस बीमारी के चलते ज़मीन बिक गई है और कर्ज का बोझ भी बढ़ता जा रहा है. पता नहीं मेरे बाद मेरे परिवार और बच्चों का क्या होगा.”

अजय सिंह बीमारी के इस हालात में भी एक स्कूल की गाड़ी चलाते हैं. परिवार का भरण-पोषण उनकी ड्राइवरी के कारण ही हो पाता है. अजय सिंह बताते हैं कि 2014 से पहले वे राजनीति के सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं. उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के नेता और स्थानीय विधायक राजू यादव उर्फ मुन्ना यादव के साथ काम किया है. इससे पहले वह भारतीय जनता पार्टी के साथ जुड़े थे. लेकिन, उनके बीमार पड़ने पर किसी भी नेता कोई मदद नहीं की. अजय का कहना है कि कभी-कभी कोई नेता मिलने आता है, लेकिन उसके आने पर मेरा खुद का पैसा ही खर्च होता है. किसी ने आज तक एक पाई का सहारा नहीं दिया. अजय सिंह को इस बात का मलाल है कि बहुत ग़रीबी में रहने के बावजूद भी उनका आयुष्मान भारत का कार्ड नहीं बना है.

अजय सिंह को लगता है कि यह बीमारी पानी के कारण हो रही है. इस मुद्दे पर किसी नेता का ध्यान नहीं है. हर बार कुछ महीने के अंतराल पर इन गांवों में कैंसर के हालात पर चर्चा गर्म होती है तो नेता आते हैं, लेकिन कभी कोई ठोस क़दम नहीं उठाया जाता. पटना की जांच टीम लगभग एक साल पहले आई थी, लेकिन अभी तक उसने रिपोर्ट नहीं सौंपी है. उसकी रिपोर्ट आती तो पता चलता कि आखिर कारण क्या है इस बीमारी का.

कैंसर पीड़ित अजय सिंह का घर

दरअसल, मार्च 2018 में उप राष्ट्रपति कार्यालय ने बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग को पत्र लिखकर कहा था कि गोलगामा-टेंगराहा गांव में कैंसर फैलने की विस्तृत जांच कराई जाए. इसके बाद राज्य सरकार ने जांच के लिए महावीर कैंसर संस्थान के विशेषज्ञों की टीम को भेजा. इस टीम ने यहां के 8 कैंसर पीड़ितों के बाल और नाखूनों के सैंपल लेकर गई, लेकिन अभी तक उसने अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपी है. गांव के ही शिक्षक संतोष कुमार* का कहना है कि अभी तक जांच की रिपोर्ट नहीं आई. अब गांव के लोग भी नहीं चाहते कि कैंसर की बात का ज्यादा प्रचार हो.

कैंसर के साथ-साथ गांव के बदनामी की भी चिंता

गोलगामा टेंगराहा गांव के लोग कैंसर से तो जूझ ही रहे हैं. साथ ही साथ उनकी चिंता यह भी है कि हमारे गांव के बारे में इस तरह की बात का अगर प्रचार होगा तो हमारे बच्चों की शादी नहीं हो पाएगी, गांव की बदनामी होगी. गांव के एक बुजुर्ग बताते हैं, “एक-डेढ़ साल पहले तक हर पेपर में छपता था कि गोलगामा-टेंगराहा गांव में कैंसर फैला है. इससे हुआ यह कि सरकार ने इस पर कोई काम तो नहीं किया, लेकिन अब आसपास के सभी गांवों के लोग जान गए हैं कि यहां के पानी में कैंसर है, इसलिए शादी ब्याह करने में दिक्कत आती है. हमलोग चाहते हैं कि यह मामला दब जाए और जैसे चल रहा है वैसे ही चलने दिया जाए.”

हालांकि कैंसर के मामले में बिहार देशभर में सबसे निचले पायदान पर है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक देश में कैंसर के सबसे अधिक मामले केरल, मिजोरम, हरियाणा, दिल्ली और कर्नाटक में पाए गए हैं. जबकि बिहार में कैंसर के सबसे कम मामले पाए गए. भारत में प्रति एक लाख व्यक्ति में 106.6 लोगों के भीतर कैंसर का रोग पाया जाता है. लेकिन, बिहार के ये दो गांव पिछले कुछ सालों में चिंता का विषय बने हुए हैं.

क्या कहते हैं स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी

मुज़फ़्फ़रपुर के सिविल सर्जन डॉ. शैलेश कुमार सिंह ने न्यूजसेंट्रल24X7  को बताया कि उन्हें इन गांवों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उन्होंने मीनापुर प्रखंड के चिकित्सा पदाधिकारी से बात करने की सलाह दी.

वहीं मीनापुर के विधायक और राजद नेता राजू कुमार उर्फ़ मुन्ना यादव से न्यूजसेंट्रल24X7 ने संपर्क किया तो बताया गया कि विधायक जी मीटिंग में हैं, अभी बात नहीं हो पाएगी.

12 मई को छठे चरण में वैशाली में चुनाव होने जा रहे हैं. 15 से 20 हजार की आबादी वाले ये गांव भी वोट डालेंगे. लेकिन, इस बार उनके भीतर नेता या प्रधानमंत्री चुनने का उत्साह नहीं है. उनकी समस्या है कि कैंसर का एक स्थायी निदान निकले. लेकिन, हवा-हवाई मुद्दों के बीच इनकी ये मांगें शायद जगह पाने लायक उचित नहीं हैं.

(*गोपनीयता बरकरार रखने के अनुरोध पर पहचान बदल दिए गए हैं.)

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