कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: क्या ईंट भट्ठों पर काम करने वाले महादलितों को बंधुआ मज़दूरी से कभी मुक्ति मिल पाएगी?

न्यूज़सेन्ट्रल24x7 ने बिहार के गया ज़िले में कई गांवों के मज़दूरों से बात कर उनकी मजबूरियां और हालात जानने का प्रयास किया.

1 जुलाई, 2019 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर बंधुआगिरी से मुक्त कराए गए बिहार के महादलित मज़दूरों का प्रदर्शन मीडिया के नज़रों से ओझल हो गया. इन मज़दूरों से हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अलग-अलग ईंट भट्ठों पर जबरन काम लिया जा रहा था, जिसके एवज़ में हर पखवाड़े केवल 1000 से 1500 रुपए दिए जाते थे. अपनी मेहनत के पैसे मांगने पर ईंट भट्ठा मालिक द्वारा इन्हें धमकाया और पीटा जाता था.

80 मज़दूरों का यह समूह, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शमिल हैं, बिहार के अलग-अलग ज़िलों से हरियाणा लाए गए थे. ठेकेदार ने अच्छी रक़म दिलवाने का वादा कर इन मज़दूरों को ईंट भट्ठे मालिकों को बेच दिया. दस महीने तक इन मज़दूरों और इनके बाल बच्चों से प्रतिदिन 14 घंटे काम करवाने के बाद भी ईंट भट्ठे का मालिक इन परिवारों पर कर्ज़ बकाया होने का दावा करता है.

80 मज़दूरों का यह समूह, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शमिल हैं, बिहार के अलग-अलग ज़िलों से हरियाणा लाए गए थे.

बंधुआ मज़दूरी को लेकर हाल फिलहाल प्रकाश में आया यह एक मामला है. लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता. मामले पहले ही दबा दिए जाते हैं. तमाम क़ानूनों के बावजूद आज भी मज़दूर गुलामों की ज़िंदगी जीने को बेबस हैं. बिहार के विभिन्न ज़िलों में गांव के गांव ईंट भट्ठों पर काम करने के लिए पलायन कर जाते हैं. इनमें अधिकतर लोग हिंदू सामाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर स्थित अस्पृश्य जाति के होते हैं. न्यूज़सेन्ट्रल24×7  ने इन गांवों में अलग-अलग मज़दूरों से बातकर यह जानने का प्रयास किया कि आख़िर किन मज़बूरियों में ये ईंट भट्ठों पर काम करने के लिए राज़ी होते हैं. इनकी सामाजिक और आर्थिक परिस्थियां क्या हैं और ईंट भट्ठों पर काम करने के दौरान इन्हें किन परिस्थियों से गुजरना पड़ता है.

गया के वजीरगंज प्रखंड के अलग-अलग गांवों के महादलित टोलों में काफ़ी चहल-पहल है. पिछले नौ महीने ईंट भट्ठों पर काम करने के बाद मांझी परिवार अपने गांव लौट आए हैं. अब वो खेतिहर मज़दूर के रूप में काम करेंगे. बरसात के बाद फिर परिवार सहित नौ महीनों के लिए किसी ईंट भट्ठे पर काम करने के लिए निकल जाएंगे.

बैरिया गांव का इन्द्रा नगर संतोष मांझी (18) का ससुराल है. नवादा के कौआकोल प्रखंड के ईंट भट्ठे पर काम करने के बाद वे घर न जाकर ससुराल आए हैं. घर जाने के लिए हाथ में पैसे नहीं है. पिछले नौ महीने की जी तोड़ मेहनत का फल उन्हें ठेकेदार की बदनीयती के रूप में चुकानी पड़ रही है. रोज़ आस बांधे इंतज़ार करते हैं कि ठेकेदार उनका मेहताना दिला देगा. लेकिन आज-कल करते बीस दिन से ऊपर निकल गए हैं. अब तक पैसा नहीं मिला.

संतोष कहते हैं, “बारिश के कारण भट्ठा पर काम बंद कर दिया गया है. लेकिन अभी तक मेरे पैसे का हिसाब नहीं किया गया है. वो  बड़े लोग हैं, हम क्या ही कर सकते हैं.”

ईंट भट्ठे पर काम करने वाले संतोष मांझी, फ़ोटो-दीपक कुमार

साधु यादव नाम का ठेकेदार संतोष मांझी के साथ इसी टोले के अन्य सात लोगों को काम करवाने के लिए कौआकोल ले गया था. लेकिन नौ महीने बीत जाने के बाद भी पैसे नहीं दिए गए. कागज पर अंगूठा लगाने वाले यह मज़दूर अपने हक़ की आवाज़ भी नहीं उठा सकते हैं. क्योंकि बारिश बीत जाने के बाद काम के लिए फिर इन्हीं ठेकेदारों पर निर्भर रहना है.

क्या अब बंधुआ मज़दूरी नहीं होती?

यह सुनकर अजीब लगेगा कि ईंट भट्ठे पर काम करने वाले मज़दूरों को उनके काम के एवज़ में पैसे प्रत्येक दिन, सप्ताह या महीने में न मिलकर कुल नौ महीने बाद एकमुश्त मिलते है. प्रति एक हज़ार ईंट बनाने पर मज़दूर के खाते में पांच सौ रुपए जोड़ा जाता है. यह मेहनत का काम है. पहले मिट्टी काटना पड़ता है, फिर उसका लेव बनाकर ईंट के सांचे में ढालना पड़ता है. फिर धूप में सूखाना होता है. दो व्यक्ति यदि दिन में दस से बारह घंटा भी काम करे तो मुश्किल से एक हज़ार ईंटें बना पाते हैं. इस प्रकार, एक मज़दूर औसतन दिन के दस-बारह घंटे काम कर के भी दो सौ से ढाई सौ रुपय ही कमा पाता है.

प्रतिकात्मक छवि

लेकिन इस मेहनताने का गणित उनकी ज़िंदगी की भांति उलझा हुआ है. ठेकेदारों द्वारा लोगों को ईंट भट्ठों पर ले जाना एक परंपरा सी है. इन मज़दूरोंके बाप-दादाओं ने भी यही काम करते हुए अपनी ज़िंदगी काट ली. यह पीड़ी भी अपने बाल-बच्चों सहित यह काम करने को मजबूर हैं. बरसात शुरू होने के पहले ही ईंट भट्ठे के मालिक आते हैं और इन महादलित मज़दूरों से जाड़े से गर्मियों तक काम करने के लिए औने-पौन दाम पर मज़दूरी तय कर लेते हैं. काम पर ले जाने से पहले वे प्रत्येक परिवार पर कुछ हज़ार एडवांस रुपए भी दिए जाते हैं. ताकि ये मज़दूर परिवार बरसात आसानी से काट लें.

जगेशर मांझी (17) जो पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मऊ ज़िला के किसी ईंट भट्ठे पर काम करके आए हैं, बताते हैं, “शुरुआत में हमें परिवार(दो व्यक्ति और बाल-बच्चे) के हिसाब से तीस हज़ार रुपए पेशगी(एडवांस) दिया जाता है. फिर पांच सौ रुपए (प्रति) हज़ार ईंट के हिसाब से मेहताना देने की बात की जाती है. लेकिन यह पेशगी बस दिखाने के लिए ही होता है. नौ महीने के आख़िर में जब हिसाब होता है तो इसे कुल मेहताना में से काट लिया जाता है. इसके साथ ही हफ्ते का खुराक के पैसे भी काट लिए जाते हैं. दवा-दारू का तो अलग हिसाब है.”

जगेशर मांझी (17) जो पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मऊ ज़िला के किसी ईंट भट्ठे पर काम करके आए हैं.

हफ़्ते के खुराक को लेकर मज़दूर बताते हैं कि मालिक उन्हें घर चलाने के लिए सप्ताह के पांच से छह सौ रुपए देते हैं. लेकिन यह पैसे बाद में कुल मेहनताने में से काट लिए जाते हैं. इसके लिए अलग से उन्हें कोई पैसा नहीं मिलता. इसमें भी एक पाबंदी है. खुराक के पैसे तब ही मिल पाते हैं जब मज़दूर दिन भर काम करता है. कई जगह ईंट बनाने के हिसाब से भी खुराक की राशि बदल जाती है. यदि मज़दूर परिवार ने दिनभर में एक हज़ार ईंट बना दी तो उसे एक दिन के हिसाब से एक सौ रुपए दिए गए. यदि वही परिवार मात्र पांच सौ ईंट बनाता है तो खुराक के पैसे आधे हो जाते हैं.

सुरेन्द्र मांझी(50) जो इन्द्रा नगर में ही रहते हैं, कहते हैं, “जिस दिन आप बीमार पड़ गए तो ईंट भट्ठे आपके लिए आफ़त है. यह मजबूरी कोई नहीं समझेगा. खुराकी के भी पैसे नहीं दिए जाएंगे क्योंकि आप काम नहीं कर रहे होते. बहुत गिड़गिड़ाना पड़ता है. गाली खाओ तो कुछ पैसे मिल जाएंगे.”

अंतिम हिसाब के बाद जो एकमुश्त राशि मिलती है, वो भी कुछ ज़्यादा नहीं होती है. जगेशर मांझी बताते हैं कि जितना पेशगी(एडवांस) दिया जाता है उसी को लगभग बचा के ला पाते हैं. बाकी पैसे अलग-अलग खर्चों में ही काट लिया जाता है.

यहाँ ऐसी कई कहानियां है, जिनमें नौ महीने तक काम करने के बाद में पैसे मिलना तो दूर, माथे पर कर्ज का बोझ पड़ जाता है. फिर इन मज़दूरों को उन ईंट भट्ठों पर तब तक काम करना पड़ता है जब तक वो कर्ज़ चुकता न कर दे. ठेकेदार कर्ज चुकाने तक उनके जान के पीछे हाथ धोकर पड़ा रहता है. क्या यह बंधुआ मज़दूरी नहीं?

महिलाओं और बच्चों की हालत दयनीय

एक मांझी परिवार जब दशहरे के बाद घर से विदा लेता है, तो अपने पीछे कुछ नहीं छोड़ता. पूरा परिवार एकसाथ ईंट भट्ठे पर निकलता है. इस भारी काम में महिलाओं का काम और भी कठिन होता है. उन पर ईंटें बनाने के साथ घर और बच्चों को संभालने की ज़िम्मेदारी का बोझ भी होता है.

हेमंती देवी(30) बताती हैं, “परिवार के साथ काम देखना तो यह अलग है. वहां सबसे बड़ी समस्या रहने का है. शौचालय भी नहीं होता है. किसी के खेत में जाओ तो लोग लाठी लेकर तैनात रहते हैं.”

“शौचालय भी नहीं होता है. किसी के खेत में जाओ तो लोग लाठी लेकर तैनात रहते हैं.”

मज़दूर बताते हैं कि भट्ठी पर काम लेने वाला सरदार सामान्यत: उच्च जाति का होता है. काम नहीं करने की स्थिति में वह महिला-पुरुष नहीं देखता. वो सभी को गाली देता है. काम करना है तो बहुत कुछ सहना होता है.

शम्भुल देवी(45) कहती हैं, “ठेकेदार यहां से कहकर ले जाता है कि अच्छा जगह ले जा रहे है. लेकिन लात जूता खाकर वहां काम करना पड़ता है. काम करवाने वाले लोगों की नज़र भी हमलोगों को लेकर ठीक नहीं रहती. अब आगे क्या ही बताऊं.”

इन कामों में जिसकी सबसे ज़्यादा ज़िंदगी प्रभावित होती है- वो है इन मज़दूरों के बच्चे. इनका बचपन स्कूल के जगह इन्हीं ईंट भट्ठों के आंगन में गुजरता है तो भविष्य चिमनी से निकलने वाले काले धुएं में खो जाता है. परिवार के साथ हल्के-फुल्के कामों में यह हाथ बंटाते नज़र आते हैं. मसलन, मिट्ठी ढोना, पानी देना और धूप में डाले गए कच्ची ईंटों को उलट-पलट करना. हालांकि इनकी मेहनत परिवार के मेहताने में ही शामिल है. इसके लिए अलग से किसी प्रकार के पैसे नहीं दिए जाते हैं.

इन कामों में जिसकी सबसे ज़्यादा ज़िंदगी प्रभावित होती है- वो है इन मज़दूरों के बच्चे.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) से जुड़े पारसनाथ सिंह, जो गया ज़िले के कई अंचलों में पार्टी का काम देखते हैं. बताते हैं, “बिहार सरकार ने इन बच्चों को स्कूली शिक्षा में शामिल करने के लिए टोला सेवकों की बहाली की है. लेकिन इनका ज़मीन पर कोई काम नहीं दिखता. अधिकतर परिवार तो काम के लिए राज्य से बाहर निकल जाते हैं फिर इनकी बहाली का कोई मतलब नहीं रह जाता है. आप बिहार में ही ईंट भट्ठों पर काम करने वाले मज़दूर परिवार के बच्चों को देखेंगे कि वह स्कूल न जाकर परिवार के साथ मजबूरन काम करते नज़र आते हैं.”

पारसनाथ सिंह बताते हैं कि महिलाओं के साथ बस रहने और शौचालय जाने तक की समस्या नहीं है. कई प्रकार का शोषण हैं जिसे वह जाहिर नहीं करती. ईंट भट्ठों पर काम करवाने वाले सामंती लोग मानसिक शोषण के साथ शारीरिक शोषण भी करते हैं. और ऐसे मामलों को दबा दिया जाता है.

रोज़गार के विकल्प के अभाव में बंधुआ बनने को मजबूर

गया में मांझियों की सबसे बड़ी समस्या ज़मीन की है. रहने के लिए ही ज़मीन बड़ी मुश्किल से मिल पाती है, फिर खेती-किसानी के लिए ज़मीन मिलना तो दूर की बात है. बैरिया गांव का यह इन्द्रा नगर टोला भी किसी फैक्ट्री के ज़मीन पर ही बसा है. फैक्ट्री बंद होने पर सरकार ने इसकी कुछ ज़मीनें मांझियों के नाम कर दी. हाल फिलहाल प्रधानमंत्री अवास योजना के तहत कुछ घर भी बना दिए गए हैं. अब तकरीबन 70 मांझी परिवार इस टोले में रहता है. ज़्यादातर परिवारों का स्थायी काम भट्ठों पर ईंट पाथना ही है. दशहरा के समय यह सपरिवार गांव विदा लेते हैं और फिर बरसात के शुरुआत में घर को लौटते हैं.

बैरिया गांव का यह इन्द्रा नगर टोला भी किसी फैक्ट्री के ज़मीन पर ही बसा है.

रोज़गार के विकल्पहीनता को ए.एन. सिन्हा सामाजिक शोध संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो. डी.एम. दिवाकर सरकार की विफलता बताते हैं. कहते हैं, “बिहार में लगातार कई सालों से सूखा की ही स्थिति है. कृषि रोड मैप और कृषि कैबिनेट के बावजूद किसानी से रोज़गार पैदा नहीं हो रहा है. खेती में रोज़गार के लिए सिंचाई का पुख्ता इंतजाम की ज़रूरत है. लेकिन पन्द्रह सालों सरकार के तरफ़ से केवल वादे किए जा रहे हैं. काम कुछ नहीं दिखता. गया जैसे इलाक़ों में आहर, पईन के जीर्णोद्धार का काम कई सालों से लटका है. खेती किसानी कैसे होगी. मुश्किल से दो-तीन महीनों खेतों में काम मिलेगा..बाकी समय तो ईंट भट्ठों पर जाना ही होगा.”

शम्भुल देवी(45), जो हर साल काम के लिए ईंट भट्ठे पर जाती हैं, कहती हैं, “देहात में रहने पर एक दिन का दो-तीन किलो अनाज मजूरी मिलता है. इससे आप ही बताइए क्या होगा. यहां रहते है तो इधर मरते हैं और बाहर जाते हैं तो उधर मरते हैं. कहीं भी जीना मुश्किल ही है. इतना पर भी सरकार को नहीं पता चल रहा है कि राजा को दस बिगहा खेत है तो गरीब को एक बिगहा भी दे दे. हम अपने से नहीं मर रहे हैं. हमें तो यह सरकार मार रही है.”

“हम अपने से नहीं मर रहे हैं, हमें तो सरकार मार रही है.”

इस समाज के प्रति सरकार की यह उदासीनता स्पष्ट करता है कि आज तक जितनी सरकारें बनीं, इन महादलितों को गुलामी, भेदभाव, अपमान और अत्याचार के अलावा कुछ नहीं मिला. यह आज भी रोटी, कपड़ा और मकान से महरूम है. इनकी जाति और गरीबी अभिशाप के समान पीछा नहीं छोड़ रहा है. फिर यह सवाल उठता है कि समानता और शोषण के विरुद्ध अधिकार समाज के किन महलों में छिपा है ?

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