कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: पानी के संकट से जूझ रहा दरभंगा और शहर के तालाबों पर धड़ल्ले से हो रहा अतिक्रमण

दिग्घी तालाब के किनारे अतिक्रमण कर एक प्राथमिक स्कूल बना दिया गया है. हराही पोखर के पश्चिमी हिस्से में लगभग 600 मीटर की दूरी पर 10 फुट लंबी सड़क बनाई गई है.

बिहार का दरभंगा जिला. सुबह के 10 बजे जिले का औसत तापमान है 36 डिग्री. इस चिलचिलाती धूप और बदन तपाने वाली गर्मी में वार्ड 14 में रहने वाले राजकुमार के परिवार को इंतजार है कि नगर निगम वाला टैंकर जल्द से जल्द आए. घर में पीने का पानी ख़त्म हो गया. दोपहर 12 बजे टैंकर आता है और राजकुमार जैसे सभी परिवार अपने बर्तन लेकर वहां पहुंच जाते हैं.

यह कहानी दरभंगा के हर मुहल्ले और हर परिवार की है. यहां एकाएक सभी चापाकल सूख गए हैं. पानी का लेवल काफी नीचे जा चुका है. यहां के निवासी इस समस्या के कई कारण बताते हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण है कि तालाब सूख चुके हैं या उन पर अतिक्रमण कर लिया गया है.

राजू प्रसाद, जो यहाँ रिक्शा चलाने का काम करते हैं, बताते हैं, “बचपन में हमलोग के घर में पोखर और तालाब के पानी से खाना बनता था. अब पहले की तरह पोखर नहीं रहे. सब या तो सूख गए हैं या उनपर अतिक्रमण करके लोगों ने घर या दुकान बना लिया है.”. लोग नगर निगम द्वारा पहुंचाए जा रहे पानी के टैंकरों के भरोसे जी रहे हैं. किसी किसी मुहल्ले में तो यह टैंकर पहुंच भी नहीं पाता.

दरभंगा शहर के वार्ड नंबर 13 की पार्षद वीणा कुमारी बताती हैं कि उनके मुहल्ले में पिछले साल नवंबर- दिसंबर में ही चापाकलों से पानी आना कम हो गया था. इसके बाद उन्होंने जिला प्रशासन से बात की लेकिन कोई भी निदान नहीं निकाला जा सका. मिथिलांचल क्षेत्र के लगभग सभी जिले में यह समस्या है. दरभंगा सबसे अधिक प्रभावित है.

(फ़ोटो- अभिनव प्रकाश)

वीणा कुमारी इसके लिए जिला प्रशासन के लचर रवैये को जिम्मेदार मानती हैं. उनका कहना है, “नल-जल योजना के लिए 2005 में टेंडर हुआ था. 2007 में इसमें काम शुरू हुआ. 32-40 करोड़ रुपया पीएचईडी विभाग ले चुका है, लेकिन अभी 40 प्रतिशत काम भी नहीं हुआ है. मेरे मुहल्ले में पानी के लिए पाइप लाइन नहीं लगा है.” उनका कहना है पानी का टैंकर स्थायी समाधान नहीं है. जिला प्रशासन को हर घर में पानी को संग्रहित करने के लिए कदम उठाने की ज़रूरत है.

वीणा देवी बताती हैं कि शहर में वाटर प्लांट का जाल बिछाया जा रहा है. इन वाटर प्लांटों में पानी का सबसे अधिक शोषण किया जाता है. इसके बावजूद जिला प्रशासन ने इसके लिए कोई निर्देश जारी नहीं किया है.

इधर दरभंगा जिला प्रशासन का दावा है कि हर मुहल्ले में पर्याप्त मात्रा में पेयजल टैंकर की मदद से पहुंचाया जा रहा है. दरभंगा जिले में पीएचईडी विभाग के कार्यपालक अभियंता कालिका प्रसाद का कहना है कि हमारा विभाग नगर निगम के साथ मिलकर शहर के हर हिस्से में पानी का टैंकर पहुंचा रहा है तथा ख़राब पड़े चापाकलों को भी चालू कराया जा रहा है. जलस्तर नीचे जाने के कारण पर उन्होंने कहा कि पानी के अत्यधिक दोहन की वजह से यह संकट उत्पन्न हुआ है. उन्होंने कहा कि पोखरों का अतिक्रमण भी इस संकट का एक कारण है.

(हराही पोखर, फ़ोटो- अभिनव प्रकाश)

लेकिन हर मुहल्ले में पानी पहुँचाने के दावे की पोल वार्ड 15 की पासवान बस्ती में खुल जाती है. यहां 20 से 25 परिवार रहते हैं, लेकिन एक भी चापाकल नहीं है. एक हैंडपंप है, जिससे पीला पानी आता है. यहाँ के निवासी पप्पू पासवान बताते हैं, “इस हैंडपंप का पानी पीने लायक नहीं होता है. फिर भी हमारा पूरा मुहल्ला इसी पर निर्भर है. हमारे मुहल्ले में जिला प्रशासन द्वारा घर-घर पहुंचाए जाने वाली टैंकर की सुविधा भी नहीं मिल रही है. नल जल योजना का पाइप भी इस मुहल्ले में नहीं पहुंचा है.”

नई नहीं है मिथिला में जल की समस्या

दरभंगा जिला तालाबों के मामले में काफी समृद्ध रहा है. इसे तालाबों की बहुलता के कारण पहले “पग पग पोखर” वाली जगह के नाम से भी जाना जाता है. तालाब बचाओ आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता श्री नारायण चौधरी के मुताबिक, “1964 में दरभंगा नगर बोर्ड में 32 वार्ड थे. इन वार्डों में 350 से 400 तालाब थे. 383 निजी कुएं थे. 39 सरकारी कुएं थे. इसके साथ ही नगर निगम 3 तालाबों को पेयजल के लिए मेंटेन करता था. लोग इसके पानी पीते थे. आज दरभंगा में एक भी तालाब नहीं है, जिसमें स्नान भी किया जा सके.”

जानकार बताते हैं कि मिथिला में जलसंकट अचानक से नहीं आया है. करीब 8-10 सालों से इसके संकेत मिल रहे थे. लोगों ने प्रशासन को इसकी जानकारी भी दी थी. पहले पुराने चापाकलों का पानी सूखने लगा, तब लोगों ने कुछ तात्कालिक उपाय निकाले. नगर निगम ने हैंडपंप बदलने का सुझाव दिया. अब उन हैंडपंपों से भी पानी नहीं आ रहा है तो नगर निगम अब सबमर्सिबल लगा रही है.

सूखे हैंडपंप (फ़ोटो- अभिनव प्रकाश)

दरभंगा के बड़े तालाबों की स्थिति

शहर में तीन बड़े तालाबों में दिग्घी तालाब, हराही पोखर और गंगा सागर तालाब शुमार हैं. दिग्घी तालाब के किनारे अतिक्रमण कर एक प्राथमिक स्कूल बना दी गई है. हराही पोखर के पश्चिमी हिस्से में लगभग 600 मीटर की दूरी पर 10 फुट लंबी सड़क बनाई गई है.

गंगा सागर पोखर के किनारे करीब 80 फ़ीसदी हिस्से पर सड़क का निर्माण कराया गया है. अब भू-माफिया इस पोखर को भरकर इसकी जमीन को अवैध तरीके से बेच रहे हैं. इसके साथ ही गंगा सागर पोखर के करीब एक एकड़ ज़मीन पर एक मछली बाजार भी खोला गया है. इन सभी कारणों से दरभंगा शहर के तालाबों को नुक़सान झेलना पड़ा है.

श्री नारायण चौधरी बताते हैं कि तालाब बचाने के नाम पर जब अतिक्रमण हटाने की बात होती है तो ग़रीबों और दलितों की बस्ती उजाड़ दी जाती है, लेकिन बड़े लोगों पर नोटिस होने के बावजूद भी कोई कार्रवाई नहीं होती.

क्या हो सकता है समाधान

बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग और आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर राजीव सिन्हा ने 2011 में एक रिपोर्ट प्रकाशित किया था. इसमें कहा गया था कि बाढ़ नियंत्रण की बजाय बिहार सरकार को जल प्रबंधन या नदी प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी है. इससे बाढ़ या नदी का पानी दूसरे जलाशयों में जा सकेगा और पानी बंटेगा.  सरकार इस पर कार्रवाई करे तो काफी राहत मिलेगी.

इसके साथ ही यहां के तालाबों की सफाई और उसमें गिर रहे नालों पर रोक लगाकर भी पानी की समस्या एक हद तक कम की जा सकती है.

हाइकोर्ट के निर्देश के बावजूद भी नहीं हो सका नियंत्रण

पटना हाइकोर्ट ने 19 मई 1998 को बिहार सरकार को आदेश दिया था कि तालाबों-पोखर और अन्य सार्वजनिक जगहों से अतिक्रमण हटाया जाए. कोर्ट ने कहा था कि इन जगहों पर जितने भी भवन या निर्माण कार्य किए गए हैं, उन्हें जल्द से जल्द हटाया जाए. इस फ़ैसले में कोर्ट ने यह भी कहा था कि सार्वजनिक जगहों पर अतिक्रमण की मंशा से कुछ लोग मंदिर या धार्मिक चिह्नों का निर्माण करते हैं, लेकिन यह किसी भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं है. इसके बावजूद भी दरभंगा के कई तालाबों के किनारे छोटे मंदिरों का निर्माण कर अतिक्रमण करने की कोशिश की जा रही है.

गंगा सागर तालाब (फ़ोटो- अभिनव प्रकाश)

लेकिन न्यायालयों के तमाम आदेश और विशेषज्ञों के विमर्श पीछे छूट गए हैं. आम लोगों के साथ-साथ पढ़े लिखे लोगों के बीच भी जागरूकता की भारी कमी है. इसकी एक बानगी दरभंगा के ल.ना.मि यूनिवर्सिटी में देखी जा सकती है. यहां के कई तालाब मृतप्राय हो गए हैं. इसका कारण है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने तालाबों के आसपास या उसके किनारे अपने बिल्डिंग बनाने शुरू कर दिए हैं.

दरभंगा के सांसद और भाजपा नेता गोपाल जी ठाकुर ने न्यूज़सेंट्रल24×7  से बताया, “मैंने बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, दरभंगा जिले के प्रभारी मंत्री तथा राज्य के मुख्य सचिव के साथ मिलकर स्थिति की समीक्षा की है. जिला प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में हूं. शहर के हर हिस्से में टैंकर का पानी पहुंचाया जा रहा है.” भू माफियाओं द्वारा तालाबों के अतिक्रमण के सवाल पर उन्होंने कहा कि उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है ना ही किसी ने उन्हें अभी तक इसका आवेदन दिया है.

बहरहाल, यह समस्या सिर्फ मिथिलांचल की नहीं है. गंगा के उत्तरी हिस्से में बसे लगभग सभी जिले इसकी चपेट में आ रहे हैं. हर घर नल का पानी पहुंचाने में जुटी नीतीश सरकार अगर पानी का संग्रहण करने की दिशा में कदम नहीं उठाती है तो चिंताजनक परिणाम सामने आएंगे. कुछ सालों बाद नल जल योजना का नल भी पानी छोड़ अफ़सोस और हताशा दिया करेगा.

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