कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: मुज़फ़्फ़रपुर: चमकी बुखार से जिन बच्चों की मौत अस्पताल पहुंचने से पहले ही हो गई, क्या वे सरकार के लिए एक आंकड़ा भी नहीं?

न्यूज़सेंट्रल24x7 ने ग्रामीणों से बातचीत के दौरान जाना कि मृत बच्चों की संख्या सरकारी अनुमानों से काफ़ी अधिक है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में चमकी बुखार से अबतक करीब 175 बच्चों की मौत हो चुकी है. सिर्फ़ मुज़फ़्फ़रपुर में ही मरने वाले बच्चों की संख्या132 के पार है. न्यूज़सेंट्रल24×7  ने मुज़फ़्फ़रपर के मीनापुर और कांटी प्रखंड में ग्रामीणों से बातचीत के दौरान जाना कि मृत बच्चों की संख्या सरकारी अनुमानों से काफ़ी अधिक है.

मीनापुर प्रखंड की राघोपुर पंचायत ज़िला मुख्यालय से मात्र 15 किलोमीटर की दूरी पर है. सरकार की माने तो चमकी बुखार से अब तक यहां तीन बच्चों की मौत हो चुकी है. लेकिन ग्रामीणों के अनुसार छह अन्य बच्चों की मौत गांव में या अस्पताल के रास्ते में हो गई थी. इन बच्चों को सरकार ने अपने रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया है.

बता दें कि बिहार सरकार चमकी बुखार से मृत बच्चों के परिजनों को चार लाख रुपए मुआवज़े के तौर पर दे रही है. लेकिन यह राशि उन्हें ही मिल पा रही है जिनके बच्चों की मौत चमकी बुखार के कारण सरकारी कागजों पर दर्ज है.

अस्पताल पहुंचने से पहले मर रहे बच्चों के परिजनों को कोई पूछने वाला नहीं

महिन्द्र राम(70) जो जाति से चमार हैं, राघोपुर में ही मजदूरी करके घर चलाते हैं. वे बताते हैं, “मेरी पोती गुंजा आठ साल की थी. 18 जून की सुबह उसे अचानक चमकी (मिर्गी जैसा दौरा) आता है. फिर एकाएक मौत हो जाती है. अस्पताल ले जाने का भी समय नहीं मिला. अब तो सरकारी रिकॉर्ड में भी उसका नाम नहीं है. मुआवज़ा कैसे मिलेगा.”

महिन्द्र राम (फोटो- दीपक कुमार)

चमकी बुखार के लक्षणों में तेज़ बुखार के साथ बच्चे का बेहोश हो जाना शामिल है. इस स्थिति में बच्चे की मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं रहती, कई मामलों में मिर्गी जैसे दौरे पड़ते हैं. इसलिए इस बीमारी का नाम चमकी  पड़ा.

राघोपुर पंचायत के मुखिया मोहम्मद यूसुफ़ बताते हैं, “इस पंचायत में तीन बच्चे मेडिकल कॉलेज (श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल) में मरे हैं जिनके परिजनों को चारचार लाख रुपए सहायता राशि के रूप में दिए गए हैं. लेकिन पांचछह और बच्चे थे जिनकी मृत्यु घर पर ही हो गई. कई अस्पताल पहुंचे भी तो उन्हें एडमिट नहीं किया गया. अब उन्हें सहायता राशि कैसे मिलेगी यह बड़ा सवाल है.”

मोहम्मद यूसुफ (फोटो- दीपक कुमार)

इस सवाल के बाबत मीनापुर प्रखंड के विकास पदाधिकारी अमरेन्द्र कुमार कहते हैं, “यह हमें भी पता है. कई गांवों में लोग बता भी रहे हैं. लेकिन जब तक बीमारी की पुष्टि नहीं हुई हो तो मुआवज़ा कैसे दिया जाएगा. हालांकि ज़िला प्रशासन द्वारा जो निर्देश मिलता है उस पर काम होता है. अभी तक इस संदर्भ में कोई बैठक नहीं हुई है.”

राघोपुर के रहने वाले अली हुसैन चमकी बुखार के कारण अपना साढ़े तीन साल का बच्चा खो चुके हैं, कहते हैं, “14 जून को सुबह का समय था. सोकर उठते ही मेरा बच्चा आंख चमकाने लगा. दो बार चमकी (मिर्गी) आया, फिर हम जल्दी से उसे मुजफ़्फ़रपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले गए. लेकिन वहां की स्थिति ठीक नहीं थी. मेरे आंखों के सामने कई बच्चे मर रहे थे, इसलिए मुझे अपने बच्चे की बचने की उम्मीद नहीं थी. सरकार ने अगर जागरूकता फैलाई होती तो आज मेरा बच्चा ज़िंदा रहता.”

अली हुसैन और उसका परिवार (फोटो- दीपक कुमार)

हर साल होती है बच्चों की मृत्यु लेकिन सरकार की कोई तैयारी नहीं

मुजफ़्फ़रपुर में हर साल भारी संख्या में बच्चों की मौत चमकी बुखार से होती है. साल 2012, 2013 और 2014 में इस बीमारी का सबसे ज़्यादा असर देखा गया था. इसके बावजूद भी इस साल सरकार द्वारा कोई तैयारी नहीं की गई थी. तो जागरूकता कार्यक्रम चलाया गया है ही सरकारी अस्पतालों को इलाज के लिए सक्षम बनाया गया.

मीनापुर से सटा है कांटी प्रखंड. इस प्रखंड की मुस्तफ़ापुर पंचायत में एक बच्चे की मौत चमकी बुखार से हो चुकी है, कई बच्चे बीमार पड़े हैं लेकिन आशा और आंगनवाड़ी सेविका कहीं नज़र नहीं रही हैं.

रंजीत कुमार (35) की दो बेटियां मणिका(4) और ललिता(2) का शरीर बुखार से तप रहा है. एक महीने पहले पैदा हुए उनके बेटे को भी रह रहकर बुखार चढ़ जाता है. कहते हैं, “आप ही पहले शख़्स हैं जो यहां कुछ समझाने आए हैं. इससे पहले कोई नहीं आया है. आशाआंगनवाड़ी सेविका तो इस गांव में कभी आती ही नहीं है.”

मीनापुर प्रखंड हो या कांटी प्रखंड, यहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत बहुत ख़स्ता है. दवाइयों की तो अलग बात है, कई जगह बुखार मापने के लिए थर्मामीटर तक नहीं है. ग्रामीणों का कहना है कि जब यहां कुछ सुविधा है ही नहीं तो हम प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर कैसे विश्वास करें.

अली हुसैन कहते हैं, “यदि आप यहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर जाइए तो एक ओ.आर.एस के अलावा कुछ नहीं मिलेगा. मतलब 15 रुपए के ओ.आर.एस के लिए 30 रुपए भाड़ा लगाकर जाएं. इससे अच्छा हम दुकान से खरीद लेंगे. हमें इस सरकार से क्या फायदा है?”

जागरूकता कार्यक्रम की शिथिलता के सवाल पर अली नेउरा गांव की आशा सुनिता देवी कहती हैं, “सरकार हमसे फ्री में काम करवा रही है. कई महीनों से हाथ में एक रुपए भी नहीं मिला. समाज की सेवा समझ कर फिर भी हम काम में डटे हैं. जागरूकता कार्यक्रम को लेकर जब ज़िला प्रशासन द्वारा निर्देश मिला हम लोग उस समय गांवगांव घूमें. सरकार को देखना चाहिए कि हम किस परिस्थिति में काम कर रहे हैं.”

सरकार की उदासीनता के बावजूद छात्रों और पत्रकारों का कुछ समूह लगातार इन प्रखंडों में जागरूकता और राहत कार्यक्रम चला रहे हैं और ग्लूकोज़, ओ.आर.एस और थर्मामीटर जैसे बुनियादी चीज़ें बांट रहे हैं. 

(फोटो- दीपक कुमार)

राहत कार्य में लगे पत्रकार सत्यम कुमार झा भी सरकार की लापरवाही से नाराज़ दिखते हैं, कहते हैंइतने बच्चों की मौत नहीं होती, यदि पहले से लोगों को जागरूक रखा जाता. लेकिन इतने बच्चों के मौत के बावजूद आशा गांवों में राउंड नहीं लगा रही हैं. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र की हालत बहुत ही खराब है. उनमें काम करने वाले लोगों को प्राथमिक उपचार की बात भी नहीं मालूम. अब सरकार का काम भी हम जैसे लोगों को करना पड़ रहा है. लेकिन हम हमेशा ऐसा काम नहीं कर पाएंगे.”

 कुपोषण के शिकार बच्चों को होता है ख़तरा, कई परिवारों को नहीं मिल पाता राशन

बिहार सरकार द्वारा कराए गए सर्वे को ही मानें तो चमकी बुखार से प्रभावित करीब 75 फीसदी परिवार गरीबी रेखा से भी नीचे हैं. प्रभावित परिवारों के घरों की औसत सालाना आय लगभग 53,500 रुपये या 4,465 रुपये प्रति माह है.

इस बीमारी का असर कुपोषित बच्चों पर ज़्यादा देखा गया है. ग्लूकोज़ की अत्यधिक कमी के कारण बच्चे इस बीमारी का शिकार बन जाते हैं. ये बच्चे गांवों में रहते हैं और इनका परिवार गरीबी रेखा से भी नीचे हैं. प्रभावित परिवारों में हर तीसरे परिवार के पास राशन कार्ड नहीं है, जबकि जिस हर छह में से एक परिवार के पास राशन कार्ड है, उन्हें पिछले महीने राशन नहीं मिल पाया था.

कांटी प्रखंड के अली नेउरा गांव की लीला देवी बताती हैं, “राशन कार्ड तो है, लेकिन महीने का राशन कभी भी समय से नहीं मिलता. एक महीने मिलता है तो एक महीने नहीं मिलता है. डीलर बोलता है कि सब तुम्हीं को दे देंगे.”

लीला देवी (फोटो- दीपक कुमार)

राघोपुर गांव के मुखिया मोहम्मद यूसुफ़ इस बात को स्पष्ट करते हैं, “अधिकतर गरीब लोगों का तो राशन कार्ड ही नहीं बना है. राशन कार्ड उन लोगों का बना है जिनको उनकी ज़रूरत नहीं. डीलर राशन देने को लेकर मन-मर्जी करता है, किसी महीने देगा तो किसी महीने नहीं देगा.”

प्रखंड के अलगअलग गांवों में आंगनबाड़ी या स्कूलों में मिड डे मील की स्थिति भी ठीक नहीं है. शेड्यूल के अनुसार खाना नहीं मिलता. साथ ही इस बार बीमारी के प्रकोप के समय ही बच्चों की गर्मी की छुट्टी भी कर दी गई जिसके वजह से बच्चों को यहां से भी खाना नहीं मिल पाया.

प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हो या आंगनबाड़ी, हर तरफ़ चौतरफ़ा कुव्यवस्था दर्शाता है कि सरकार ने इस बीमारी से बचाव के लिए कोई तैयारी नहीं की थी. बच्चों की मौत व्यवस्था का मर जाने का घोतक है जिसपर सरकारी महकमा चुप्पी साधे हुए है. 

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