कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: 40-50 बच्चों के लिए एक डॉक्टर, हर घंटे निकल रही एक बच्चे की लाश; चमकी बुखार और धाराशायी चिकित्सा व्यवस्था का शिकार होते बिहार के मासूम

आईसीयू के एक बेड पर दो-दो बच्चों का ईलाज चल रहा है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन ने अपने दौरे के वक्त व्यवस्था सुधार का आश्वासन दिया था, लेकिन स्थिति पहले जैसी ही है.

सोमवार 17 जून की दोपहर. मुजफ़्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज व अस्पताल के बाहर मीडियाकर्मियों की भीड़ लगी है. जिले के डीएम आलोक रंजन घोष प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं. इधर, अस्पताल के पीआईसीयू वार्ड के भीतर से सफेद कपड़े में लिपटा किसी मासूम का शव बाहर आता है और उसकी माँ की चीखें अस्पताल की दीवारें भेदने लगती हैं. अपने बच्चे का ईलाज कराने पहुंचे दूसरे परिजन यह दृश्य देखकर सहम जाते हैं. उन्हें अपने बच्चे की फिक्र होती है, जिसे इसी बीमारी के कारण इसी वार्ड में भर्ती कराया गया है.

ऐसे ही एक पिता हैं मुजफ्फरपुर जिले के लोहसरी के रहने वाले रोहित पासवान, जो अपनी डेढ़ साल की बच्ची अम्बिका कुमारी को लेकर आए हैं. रोहित बताते हैं, “15 तारीख (जून) की रात अपने घर का खाना खाकर मेरे पास ही सोई थी. रात में उसका हाथ-पैर टाइट होने लगा. फिर उल्टी होने लगी. हमलोगों ने गांव के डॉक्टर को दिखाया. डॉक्टर ने मेडिकल (श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल) भेज दिया. अभी फिलहाल डॉक्टर मेरी बच्ची की हालत ठीक बता रहे हैं, लेकिन कब क्या हो जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है.

रोहित की तरह ही लगभग 40 लोग अपने बच्चे की चिंता में डूबे हुए हैं. क्योंकि मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार या एक्यूट इंसेफिलाइटिस सिंड्रोम से अब तक 120 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई है. ये सभी बच्चे ग़रीब परिवार से थे और डॉक्टरों का कहना है कि पोषण की कमी वाले बच्चे इस बीमारी का शिकार हो रहे हैं.

फिलहाल कैसी है मुजफ़्फरपुर के सरकारी हॉस्पिटल की स्थिति

श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में हर रोज़ 20 से अधिक बच्चे भर्ती हो रहे हैं. अस्पताल प्रबंधन ने पांच पीआईसीयू वार्ड बनाए हैं. हर वार्ड में करीब 15 से 20 बच्चे रह रहे हैं. इन बच्चों की देखरेख के लिए नर्स, इंटर्न्स के साथ-साथ डॉक्टरों की तैनाती भी की गई है. लेकिन न्यूज़सेंट्रल24×7 ने अपने पड़ताल के दौरान पाया कि पीआईसीयू 3 और पीआईसीयू 4 दोनों वार्डों की देखरेख एक ही डॉक्टर कर रहे थे. नर्सों के बुलाए जाने पर डॉक्टर एक वार्ड से दूसरे वार्ड में आते-जाते थे. बात करने पर उन्होंने बताया कि अभी एक डॉक्टर और थे जो मीटिंग में गए हैं.

श्री कृष्ण अस्पताल का पीआईसीयू , फोटो-अभिनव प्रकाश

अस्पताल की एक नर्स ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि एक ही डॉक्टर को दो नहीं बल्कि तीन-तीन वार्डों में जाकर ईलाज करना पड़ रहा है. यह अस्पताल स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहा है.

किन घरों के हैं ये बच्चे

श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के सुपरिटेंडेंट डॉ. एस.के. साही के मुताबिक चमकी बुखार से पीड़ित अधिकतर बच्चे उन परिवारों से आते हैं, जहाँ पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है या जहां स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की कमी है.

न्यूज़सेंट्रल24×7 ने पाया कि बीमार बच्चे सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े परिवार से ताल्लुक रखते हैं. किसी के पिता रिक्शा चलाते हैं तो कोई फेरीवाले का बेटा है.

चमकी बुखार से पीड़ित संजीदा ख़ातून के साथ उनकी मां रौशन ख़ातून, फोटो- अभिनव प्रकाश

 क्या कहते हैं बीमार बच्चों के घरवाले

लल्ला कुमार सोमवार सुबह श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में भर्ती हुआ. उसके पिता सुरेश राय बताते हैं, “इस अस्पताल में ईलाज ठीक ढंग से नहीं हो रहा है. लेकिन इसके बारे में हमें पहले से जानकारी होती तो यह नौबत नहीं आती.” सुरेश राय राज्य के नीतीश सरकार से नाराज हैं. उनका कहना है, “इतने बच्चों की मौत हो गई, लेकिन आज तक मुख्यमंत्री देखने नहीं आए. 4 लाख रुपए दे रहे हैं. हम पैसा लेकर क्या करेंगे जब हमारा बच्चा ही हमारे साथ नहीं रहेगा.”

कई परिजन अस्पताल प्रबंधन से नाराज़ हैं. उनका कहना है कि लापरवाही के साथ ईलाज किया जा रहा है. कोई पूछने वाला नहीं है. अस्पताल के पीआईसीयू 2 वार्ड में भर्ती डेढ़ साल की संजीदा खातून की मां रौशन खातून का कहना है, “अस्पताल में अगर ईलाज ठीक से होता तो तीन दिन से हमारा बच्चा आंख नहीं खोलता? हम कहां जाएं आपलोग बताइए. अच्छा डॉक्टर कोई हो तो बताइए जिससे हमारा बच्चा बच जाए. बचने वाला है कि नहीं सर हमारा बच्चा देखकर बताइए ना?”

पीड़ित बच्चे के साथ परिजन, फोटो-अभिनव प्रकाश

इस पर पीआईसीयू 2 वार्ड में मौजूद नर्स का कहना है कि संजीदा खातून की स्थिति बहुत ही गंभीर है.

राज्य से लेकर केंद्र तक के नेताओं के पहुंचने के बाद भी दुरुस्त नहीं व्यवस्था

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, बिहार सरकार के स्वास्थ्य मंत्री डॉ मंगल पाण्डेय सहति कई केंद्र सहित राज्य स्तरीय नेता एसकेएमसीएच अस्पताल पहुंचकर स्थिति का जायजा ले चुके हैं. लेकिन अस्पताल में डॉक्टर और बेड की कमी की व्यवस्था पर कोई कारगर क़दम नहीं उठाए गए हैं. आईसीयू के एक बेड पर दो-दो बच्चों का ईलाज चल रहा है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने अपने दौरे के वक्त स्थिति में सुधार का आश्वासन दिया था, लेकिन स्थिति पहले जैसी ही है.

125 से अधिक बच्चों की मौत हो जाने के बाद मंगलवार को राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल पहुंचे थे. अपने मासूम बच्चों की लाश को कंधे देने की स्थिति में पहुंचे परिजनों ने नीतीश कुमार वापस जाओ के नारे लगाए.

क्या है चमकी बुखार या ए..एस.

मानव मस्तिष्क में लाखों की संख्या में कोशिकाएं होती हैं. शरीर के सभी गतिविधियों को चलाने में इन कोशिकाओं का बड़ा योगदान रहता है. जब इन कोशिकाओं में सूजन या अन्य दिक्कतें आती हैं तो उसे एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (ए.ई.एस.) कहा जाता है. इस स्थिति को बोलचाल की भाषा में चमकी बुखार भी कहा जाता है. 1 से 14 साल तक के बच्चे इससे अधिक प्रभावित होते हैं. शरीर में सोडियम और ब्लड शुगर की कमी के से ग्रस्त बच्चे एवं कुपोषण से जूझ रहे बच्चों पर इस बीमारी का असर तेजी से होता है.

इसके मुख्य लक्षण में शामिल हैं- हाथ-पैर में अकड़ होना, बेहोशी, बुखार या उल्टी होना.

क्या है बीमारी का कारण

इस बीमारी का मुख्य कारण अभी भी रहस्य का विषय बना हुआ है. तमाम शोधों के बावजूद भी इसका सटीक कारण पता नहीं चल सका है. कुछ विशेषज्ञों ने इसका कारण लीची को माना है. लीची को जिम्मेदार मानने वाले डॉक्टर विशेषज्ञों का कहना है कि लीची के भीतर एमसीपीजी नाम का तत्व पाया जाता है, जो एईएस का कारण है.

हालांकि राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक विशाल नाथ इन आरोपों को नकारते हैं. न्यूज़सेंट्रल24×7 से बातचीत में उन्होंने कहा कि एमसीपीजी नाम का तत्व लीची के पल्प (गुदे) में नहीं बल्कि उसके बीज में पाया जाता है और कोई भी बच्चा लीची का बीज नहीं खाता है इसलिए लीची को दोष देना बेकार की बात है. उन्होंने आगे कहा कि एक साल-डेढ़ साल के बच्चे लीची नहीं खाते हैं, फिर भी उन्हें यह रोग हो रहा है. कई बच्चे तो बिस्कुट खाने से बीमार पड़ रहे हैं, इसलिए इसके लिए लीची को जिम्मेदार मानना ठीक नहीं है.

मुजफ़्फरपुर में हर साल भारी संख्या में बच्चों की मौत चमकी बुखार से होती है. साल 2012 में 178 बच्चे इसका शिकार हुए थे. 2014 में इसने 139 बच्चों की जान ली थी. 2019 में अभी तक यह आंकड़ा 125 पर पहुंच चुका है.

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