कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: ‘घर में शौचालय होता तो मेरी मां नहीं मरती’: राजधानी दिल्ली के तुगलकाबाद में जान ज़ोखिम में डाल जंगल में शौच करने को मजबूर महिलाएं

भाजपा सांसद रमेश बिधुड़ी से जब न्यूज़सेंट्रल24x7 ने शौचालय बनवाने के बारे में पूछा तो वे भड़क कर बोले, “भाग-दौड़ कीजिए और खुद बनवा दीजिए.”

“मेरी मां (मीरा देवी*) सुबह शौच के लिए जंगल में गई थी. वहीं किसी ने उनके साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की. हमलावर ने उनके सिर पर ईंट से मारा था. उनके शरीर के पिछले हिस्से पर नाखून और दांत काटने के निशान थे. मां वहां से भाग कर घर आई. लेकिन, इस हादसे ने उनकी जान ले ली.” यह बताते हुए पिंकु कुमार (32) की आंखें भर आती है.

यह घटना अप्रैल 2013 की है. यह वही वक़्त था जब पूर्वी दिल्ली के गांधीनगर इलाके में एक पांच साल की बच्ची को बंधक बनाकर उसके साथ बार-बार बलात्कार किया गया था. इसके कुछ दिन पहले 16 दिसंबर 2012 को घटित हुआ निर्भया रेप केस को शायद ही कोई भूल सकता है. ये दोनों घटनाएं दुनिया के सामने आई पर मीरा देवी* के बारे में उनके गली-मोहल्ले के लोगों के अलावा और कोई नहीं जान पाया.

पिंकु आगे कहते हैं, “गांधी नगर की वह बच्ची और मेरी मां एम्स के 7वीं मंजिल पर स्थित आईसीयू में भर्ती थे. 17 दिनों तक मेरी मां वेंटिलेटर पर रही थी. मीडिया ने उस बच्ची के केस को प्राथमिकता दी. लेकिन, मदद मांगने के बावजूद भी मेरी मां के केस पर मीडिया ने ध्यान नहीं दिया. पुलिस ने ज़िम्मेदारी निभाते हुए मां को एम्स तो पहुंचा दिया था. लेकिन, आरोपी को आज तक सजा नहीं मिली और ना ही उसकी पहचान हुई. यदि शौचालय होता तो मां बाहर नहीं जाती और ना ही यह हादसा होता.”

पिंकु कुमार और उनकी पत्नी ज्योति देवी / फोटो-काजल सिंह

मीरा देवी* (66) के साथ हुई इस घटना को 7 साल बीत चुके हैं. पिंकु को आज भी नहीं पता कि उनकी मां का क़ातिल कौन था. राजधानी दिल्ली के तुगलकाबाद विधानसभा क्षेत्र में स्थित लाल कुंआ गांव में घटित इस घटना के पीछे एक वजह है – शौचालय ना होना. पर 7 साल बाद भी यहां की कोई भी महिला या लड़की मीरा देवी* की जगह हो सकती है. क्योंकि, यहां आज भी शौचालय नहीं है और महिलाएं उसी जंगल में जाने को मजबूर हैं जहां यह घटना हुई थी.

स्वच्छ भारत मिशन लाल कुआं में धराशायी

लाल कुंआ के ब्लॉक-G से थोड़ी ही दूरी पर जंगल है जहां इस इलाके की औरतें और बच्चियां शौच के लिए जाती है. वहीं, यह जंगल अपराधियों और असामाजिक तत्वों का ठिकाना भी है. ऐसे में महिलाओं का जंगल में अकेले जाना ज़ोखिम भरा होता है.

अपनी मां की दर्दनीय मृत्यु के बाद पिंकु ने अपनी पत्नी के लिए घर में खुद से ही एक शौचालय बनाया है जिसे सिर्फ उनकी पत्नी उपयोग करती हैं. इस शौचालय में सेप्टिक टैंक की जगह एक डिब्बे का उपयोग किया गया है जिसे हर दो महीने बाद पिंकु खुद खाली करते हैं. पिंकु को स्वच्छ भारत योजना के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उनकी पत्नी, ज्योति (28) कहती हैं, “शौच के लिए बेटी को अपने साथ लेकर जाती हूं क्योंकि घर में बने शौचालय का उपयोग ज्यादा लोग नहीं कर सकते. जल्दी भर जाता है.”

कविता, जो 10 साल पहले यहां शादी करके आई थी, बताती हैं, “बाहर जाने से हम औरतों को कई तरह की समस्याओं को झेलना पड़ता है. जब भी मैं शौच के लिए बाहर निकलती थी तो एक व्यक्ति पीछे लग जाता था. दिखने में तो पढ़ा-लिखा लगता था. लेकिन, हरकतें बहुत घटिया थी. परेशान होकर मैंने खुद पत्थर फेंक कर मारा था. गली-मोहल्ले में जब बात फैली तो आदमी यहां से गायब हो गया.”

कविता और वकीला / फोटो-काजल सिंह

वहीं, साथ बैठी वकीला कहती हैं, “कुछ संपन्न परिवार वालों ने अपने घर में शौचालय बनवा लिया है. लेकिन, ग़रीब तबके के लिए यह मुश्किल बरकरार है. कुछ लोगों के पास शौचालय बनवाने के लिए जगह की कमी है, तो कोई खर्च की वजह से नहीं बना रहा है.”

स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय योजना के लिए शहरी क्षेत्रों में घर-घर जाकर शौचालय का सर्वेक्षण किया जाना था. शहरी क्षेत्रों में शौचालय के लिए 8000 रुपए की प्रोत्साहन राशि दी जाती है. इसके साथ जिसके पास शौचालय बनवाने के लिए जगह नहीं है उनके लिए 500 मीटर की सीमा में सामुदायिक शौचालय उपलब्ध कराना है.

हालांकि, इसकी जानकारी इस इलाके में किसी को नहीं है. कविता और उनके पति कहते हैं, “क्या है यह शौचालय योजना ? इसकी कोई जानकारी हमें नहीं है और ना ही किसी ने बताया है. ”

लाल कुंआ में स्थित जंगली इलाका / फोटो-काजल सिंह

बता दें कि तुगलकाबाद क्षेत्र में शौचालय बनाना एक मध्यम वर्गीय परिवारऔर ग़रीब तबके के लिए बड़ी चुनौती है क्योंकि, पथरीला इलाका होने की वजह से शौचालय बनाने के लिए खुदाई करने पर पत्थर निकलता है. यदि बड़े आकार के पत्थर हो तो उसे तोड़ना मुश्किल हो जाता है.

यहां सुनीता के घर में भी शौचालय नहीं है. वह कहती हैं, “हम लोगों के लिए यहां शौचालय बनाना बड़ी मुश्किल है. क्योंकि, पहाड़ी इलाका होने की वजह से 30 से 35 हज़ार का खर्च लगता है. शौचालय योजना के बारे हमें भी कोई जानकारी नहीं हैं.”

सुनीता के साथ बैठे अनवर कहते हैं, “यहां शौचालय पर बात करने या फिर इस योजना की जानकारी देने के लिए कोई नहीं आया. महिलाओं के लिए यह बड़ी समस्या है. पहली बार इस परेशानी को लेकर कोई आया है. इस इलाके में कोई सरकारी शौचालय भी नहीं है.”

सुनीता और अनवर / फोटो-काजल सिंह

शौचालय बनवाने के मार्ग में सीवर का ना होना बड़ी परेशानी

यहां दूसरी बड़ी समस्या सीवर की है. सीवर ना होने की वजह से कई लोग चाहते हुए  भी शौचालय नहीं बनवा पा रहे हैं. करीब 3 साल पहले सीवर की लाइन तो डाल दी गई है. लेकिन, आज तक उसे चालू नहीं किया गया है.

प्रेमलता (41) अपने पति और 2 बच्चों के साथ एक छोटे से कमरे में रहती है. रोजी-रोटी के चलाने के लिए ठेला लगाते हैं. वह कहती हैं, “मैं और मेरी बच्ची सब बाहर ही जाते हैं. बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सोचा था कि एक शौचालय बनवा लें. लेकिन, सीवर आज तक चालू नहीं हुआ.”

प्रेमलता/ फोटो-काजल सिंह

भाजपा और आप के बीच महिला सुरक्षा

यहां सीवर और शौचालय की समस्या को लेकर आप विधायक सहीराम पहलवान ने कहा कि यह अनधिकृत कॉलोनी वन विभाग और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के अधीन आता है. डीडीए और वन विभाग से अनुमति लेने के बाद हम सीवर लाइन की समस्या का समाधान कर रहे हैं. महिला सुरक्षा पर उन्होंने कहा, “शौचालय की कोई समस्या नहीं है. यहां तीन सरकारी शौचालय बने हुए हैं. (यह तीनों शौचालय G-ब्लॉक से काफी दूर है.) ये शौचालय जंगल से सुरक्षित है. इसलिए महिलाओं को उन शौचालयों का उपयोग करना चाहिए. मोदी सरकार की योजना की जानकारी भाजपा देगी हम नहीं.”

आप विधायक सहीराम पहलवान / फोटो-काजल सिंह

जब न्यूज़सेट्रल 24×7 ने भाजपा सांसद रमेश बिधुड़ी से सवाल किया तो पहले उन्होंने कहा कि वहां की ज़मीन डीडीए और वन विभाग के तहत आता है. इसलिए वहां कुछ करने के लिए जल्दी अनुमति नहीं मिलती है (बता दें कि रमेश बिधुड़ी इस इलाके से लगातार तीन बार विधायक रहने के बाद 2014 और 2019 में सांसद बने हैं).

भाजपा सांसद रमेश बिधुड़ी

महिलाओं की समस्या का समाधान कब तक होगा, इस सवाल का जवाब देने के बजाए बिधुड़ी भड़क गए और रिपोर्टर को ही शौचालय बनवाने की नसीहत देने लगे. “आप बनवा दीजिए. सोशल वर्क कर रही हैं. भाग-दौड कीजिए और खुद बनवा दीजिए.” जब उनकी ज़िम्मेदारी याद दिलाई गई तो उनका जवाब था, “हमारी ज़िम्मेदारी थी. हम देख रहे हैं. वहां तुम देखने नहीं जा रही हो. जब होगा हम बनवा देंगे.” इसके बाद सवालों से बचते हुए उन्होंने फोन काट दिया.

(*पहचान गुप्त रखने के लिए पीड़िता का नाम बदल दिया गया है.)

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