कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

Exclusive: वाह न्यू इंडिया! तार-तार हुई बनारस की परंपरा, मणिकर्णिका घाट से लौट गई सजी हुई चिताएं

मणिकर्णिका घाट विश्व का एकमात्र ऐसा घाट है, जहां चौबीसों घंटे शव जलाने का काम होता है. इससे पहले कभी भी शव जलाने को लेकर ऐसी रोक नहीं लगी थी.

काशी के 84 घाटों में चर्चित एक घाट का नाम है मणिकर्णिका घाट. इस घाट के बारे में कहा जाता है कि यहां दाह संस्कार होने पर व्यक्ति की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसी कारण अधिकतर लोग अपने अंतिम समय में इसी घाट पर आना चाहते हैं. मणिकर्णिका घाट पर एक भी ऐसा दिन नहीं जाता, जब यहां 250-300 शवों का दाह संस्कार न होता हो.

मणिकर्णिका घाट भारत का नहीं बल्कि पूरे विश्व का एक मात्र ऐसा घाट है, जहाँ दिन रात यानि 24 घंटे शवों का दाह संस्कार किया जाता है. हिंदू रीति रिवाजों के मुताबिक सिर्फ दिन में ही दाह संस्कार किया जाता है, लेकिन इस मामले में मणिकर्णिका घाट अलग है क्योंकि यहाँ न सिर्फ दिन में बल्कि रात में भी शव जलाए जाते हैं. बताया जाता है कि, ‘भगवान शंकर की पत्नी पार्वती की मणि यहाँ गिरी थी, यहाँ दाह संस्कार करने से सीधे व्यक्ति को मोक्ष की प्रप्ति होती है, इसीलिए यहाँ 24 घंटे शव दाह होता है. मणिकर्णिका घाट को महाश्मशान कहा जाता है.

पिछले महीने महाश्मशान घाट पर शवों का दाह संस्कार रोक दिया गया. सजी हुई चिताओं का दाह-संस्कार रोक दिए जाने की वजह से यहाँ पर हड़कंप मच गया. करीब 8 घंटे तक शवों का दाह-संस्कार बंद पड़ा रहा. इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब महाशमशान पर चिताएं जलाने पर रोक लगी है.

बता दें कि काशी विश्‍वनाथ मंदिर विस्‍तारीकरण के तहत बनने वाले विश्‍वनाथ धाम में मणिकर्णिका घाट के आसपास की काफी आबादी वाले एरिया को भी शामिल किया गया है. घाट के पास स्थित लकड़ी की टालें भी धाम की जद में हैं. विश्‍वनाथ मंदिर के सीईओ विशाल सिंह, नगर निगम और जिला प्रशासन के अधिकारी फोर्स के साथ घाट पर पहुंचे और अवैध कब्‍जा बताकर लकड़ी की टालों को हटाने लगे. लकड़ी विक्रेताओं ने एकजुट होकर विरोध किया, लेकिन भारी फोर्स के सामने किसी की एक न चली.

प्रशासन की मनमानी देखर आक्रोशित हुए लकड़ी विक्रेताओं ने शवों को जलाने के लिए लकड़ी देना बंद कर दिया तो डोम राजा ने भी लकड़ी विक्रेता का साथ दिया. डोम राजा का भी साथ मिलने से चिता के लिए आग नहीं मिली. ऐसे में शवों की लाइन लग गई. जब शवों की लाइन लगनी शुरू हो गई तो लोग शवों को लेकर हरिश्चंद्र घाट पहुंचे जहां पर दाह-संस्कार किया गया.

बनारस की गलियों से गुजरती लाश. (चित्र साभार: रिजवाना तबस्सुम)

इस घाट पर दाह-संस्कार से जुड़े काम करने वाले लगभग 38 साल के जितेंद्र बताते हैं, “अभी तक कभी भी इतना देर के लिए दाह-संस्कार बंद नहीं हुआ था. एक बार बस कुछ मिनट के लिए दाह संस्कार पर रोक लगा था लेकिन वो मिनटों की बात थी. इस बार तो घंटों तक दाह संस्कार रोक दिया गया.”

करीब 45 साल के सेमरू कहते हैं,  “प्रशासन की तरफ से बहुत बड़ी गलती है. इनको ऐसा नहीं करना चाहिए था.” वे आगे कहते हैं, “ये अपने आप को हिंदुवादी बोलते हैं इनको ये भी पता नहीं कि आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए. इन लोगों की जिद की वजह से सजी हुई चिताएँ यहाँ से वापस गईं. उसका किसी और घाट पर अंतिम क्रिया क्रम हुआ. इसकी सजा इनको आज नहीं तो कल मिलेगी ही.”

इसी घाट पर रहने वाले श्वम्भू बताते हैं, “अचानक से आना और भगाने लगना कहाँ का इंसाफ है.” प्रशासन को समझना चाहिए कि ये किसी का घर नहीं है, ये शमशान घाट है, महाशमशान घाट. यहाँ पर दाह-संस्कार होता है, कोई खेल नहीं. जो चीज सदियों से चली आ रही है उसके साथ कोई कैसे खिलवाड़ कर सकता है? यहाँ पर कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि लाशों का जलना ना होता हो. 24 घंटे में आप किसी भी वक्त आओ यहाँ पर लाश जलती ही रहती है, लेकिन इस सरकार की वजह से यहाँ पर सजी हुई चिताएँ भी वापस ले जानी पड़ी हैं.”

इसी घाट पर शव-दाह में लगने वाले लकड़ी का काम करने वाले झुन्नु बताते हैं कि यहाँ पर शव दाह रोकने से ना सिर्फ सिर्फ हमारी रीतियों को ठेस लगी है, बल्कि सदियों पुरानी आस्था भी टूट गई है. इस सरकार पर से हमारा भरोसा और यकीन भी टूटने लगा है. इस सरकार ने ना सिर्फ हमारे काम को रोका है बल्कि, हमारी आस्था, हमारे यकीन और हमारे भरोसे को तोड़ने की कोशिश की है.

इस पूरे मामले पर न्यूज़सेंट्रल24X7 ने नगर निगम के अधिकारी से बात की. अपर नगर आयुक्त अजय कुमार सिंह ने कहा कि हमारे यहाँ से केवल कर्मचारी गए थे. काशी विश्‍वनाथ कॉरीडोर प्रोजेक्ट के सीईओ विशाल सिंह से बात करने की कोशिश की है, उनसे बात नहीं हो पाई. उनके पीए ने बताया कि ऐसा नहीं है कि दाह संस्कार रोका गया हो. केवल लकड़ी हटाने का काम था वो ही किया गया. दाह संस्कार का काम एक मिनट के लिए भी नहीं रोका गया.

क्या है काशी विश्‍वनाथ कॉरीडोर प्रोजेक्ट

काशी विश्‍वनाथ कॉरीडोर प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट कहलाता है. यह कॉरिडोर काशी विश्वनाथ मंदिर, मणिकर्णिका घाट और ललिता घाट के बीच 25,000 स्क्वेयर वर्ग मीटर में बन रहा है. इसके तहत फूड स्ट्रीट, रिवर फ्रंट समेत बनारस की तंग सड़कों के चौड़ीकरण का काम भी चल रहा है. इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद आप गंगा किनारे होकर 50 फीट सड़क से बाबा विश्वनाथ मंदिर जा सकेंगे. इसके अलावा यहां आपको बेहतर स्ट्रीट लाइट्स, साफ़-सुथरी सड़कें, पीने के पानी का इंतजाम मिलेगा. इतना ही नहीं, काशी विश्‍वनाथ कॉरीडोर से काशी के प्राचीन मंदिरों को संरक्षित करने की बात कही जाती है.

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