कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों पर संकट, फैलेगी साम्प्रदायिकता की आग: मोदी सरकार 2.0 को लेकर कुछ सम्भावनाएँ और डर

यह सूची है उन कार्यों की जो मैं उम्मीद करता हूँ कि यह सरकार कभी ना करे. लेकिन साथ ही डरता भी हूँ कि ऐसा किया जाएगा.

सरकार बनने के शुरुआती दिनों की उथल-पुथल के दौरान, कई टिप्पनिकर्ता आशावादी सूचियाँ बनाते हैं कि सरकार को अपने पहले 100 दिनों में क्या करना चाहिए.

विचारधारा-प्रभावित संकेत

लेकिन 2019 चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी की भारी जीत के बाद मेरी मनोदशा इससे बिलकुल अलग है. आज मैं आशा नहीं बल्कि एक दिन प्रतिदिन बढ़ती अशांति महसूस कर रहा हूँ. जब गृह मंत्री और मानव संसाधन मंत्री के पदों के लिए प्रधानमंत्री मोदी की पसंद पर ध्यान देता हूँ, यह अशांति और गहरी हो जाती है.

गौ रक्षा के परिवेश में पशुपालन और डेरी को कृषि मंत्रालय से अलग कर दिया है, और इनका चार्ज तीन ऐसे मंत्रियों को दे दिया है जो कि हेट स्पीच और कट्टरपंथी हिंदुत्व की राजनीति के लिए पहचाने जाते हैं.

इन सबके माध्यम जो संकेत दिए जा रहे हैं उनसे यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी के पहले पाँच वर्षों कि तुलना में यह सरकार अपनी विचारधारा से और अधिक प्रभावित होगी. इसका लक्ष्य होगा कट्टरपंथी बहुसंख्यकवाद राजनीति के एजेंडे को हर क़ीमत पर आगे बढ़ाना. यह विभिन्न मुद्दों पर सरकार के द्दृष्टिकोण में ज़ाहिर होगा — मुद्दे जैसे कि नागरिकता, कश्मीर, हिंदुत्व आतंकवाद, राम मंदिर एवं विरोध. अब सरकार यह महसूस करेगी कि इतिहास बदलने, लेफ़्ट-लिबरल विश्वविद्यालयों को तबाह करने, वैज्ञानिक मानसिकता को ख़त्म करने एवं गौ रक्षा क़ानूनों को और क्रूर बनाने के लिए उसे जनमत द्वारा अधिकृत किया गया है.

कुछ संभावनाएं 

इस कारण, मैंने जो सूची बनायी है वो कुछ अलग है. यह सूची उन कार्यों की है जो मैं उम्मीद करता हूँ कि यह सरकार कभी ना करे. लेकिन साथ ही डरता भी हूँ कि ऐसा किया जाएगा.  मुझे यह डर नहीं है कि संविधान की भाषा बदल दी जाएगी, मुझे डर है कि इस संविधान के प्रत्यक्ष अभ्यासों की धज्जियाँ उड़ जाएँगी. मुझे डर है की नफ़रत भरी भाषा के प्रयोग में भयावह वृद्धि होगी जिससे और ज़्यादा नफ़रत एवं हिंसा भड़केगी. मॉब लिंचिंग के डर से भारत के मुसलमानों को अविकसित अल्पसंख्यक बस्तियों में अपना जीवन गुज़ारने पर मजबूर नहीं होना पड़े इसलिए लिंचिंग हमारे विभिन्न भारतीय सामाजिक समझौते का हिस्सा नहीं बननी चाहिए.

मुझे डर है कि असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) का लागू होना एक ऐसे स्तर पर राष्ट्र्हीनता को जन्म देगा, जिसे आज तक किसी भी देश में नहीं देखा गया है. इसमें कोई शक़ नहीं है कि बांग्लादेश इन कथित ‘राष्ट्रहीन’ लोगों को पनाह नहीं देगा, जिस कारण इनमें से कई लोग असम के कॉन्सेंट्रेशन-कैम्प जैसे डिटेन्शन सेंटर में रहने को मजबूर होंगे, एवं इनके सभी आम अधिकार छीन लिए जाएँगे. इससे म्यांमार के रोहिंग्या समुदाय जैसी स्थिति उत्पन्न होगी — व्यापक सामजीक हिंसा और सरकार द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों का शोषण

यदि नागरिकता (संशोधन) विधेयक पारित कर दिया जाता है, तो बंगाल में रहने वाले हिन्दू अपने आप भारतीय नागरिक हो जाएँगे और केवल मुसलमान नागरिकता पाने से वर्जित रहेंगे. यह दोनों समुदाय के बीच 1947 के विभाजन के तुल्य

एक डरावनी दरार का कारण बनेगा एवं साथ ही, भारतीय सविंधान —जिसकी आत्मा में है हर नागरिक को बराबरी से देखना, चाहे वे किसी भी धर्म को मानते हों— पर एक घातक प्रहार होगा.

इसके बाद, असम के लाखों लोगों की यह पीड़ा देश के अन्य राज्यों में फैलेगी. बंगाल में एनआरसी और नागरिकता (संशोधन) विधेयक के जानलेवा मिश्रण से लाखों भारतीय मुसलमान, एक निर्दयी और पक्षपाती राष्ट्रीय व्यवस्था के शिकार हो अपनी नागरिकता और भविष्य के बारे में में भय और अनिश्चितता के चक्रव्यूह में फँस जाएँगे.

एक तरफ़ नागरिकता को धर्म से जोड़ने का अनैतिक एवं असंवैधानिक कार्य किया जाएगा, तो दूसरी तरफ़ आतंकवाद और धर्म के बीच ऐसी ही बोगस कड़ी को स्थापित किया जाएगा. हिंदुत्व आतंकवाद के मामलों पर लीपापोती कर प्रज्ञा ठाकुर जैसे कथित अपराधियों; एवं एम.एम कालबुर्गी जैसे रैशनलिस्ट और गौरी लंकेश जैसे प्रगतिवाद पत्रकारों के हत्यारों को निष्कलंक कर, मुसलमान नौजवानों की आतंकवाद के आरोप में गिरफ़्तारी में एक बार फिर इज़ाफ़ा होगा.

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर

पशुपालन मंत्रालय के तीनों मंत्री गौ हत्या के ख़िलाफ़ क़ानून को और क्रूर बना सकते हैं — जिसमें निर्धारित सज़ा और कठोर बना दी जाएगी लेकिन आवश्यक सबूतों के स्तर को गिरा दिया जाएगा. इससे दलितों और मुसलमानों को धमकाने और लिंच करने का गौ रक्षकों का हौसला और बढ़ेगा. मेवात और उत्तर प्रदेश जैसे इलाक़ों में पशुपालन करने वाले ग़रीब मुसलमान यह काम छोड़ने को मजबूर हो जाएँगे लेकिन रोज़गार के विकल्प कम होने के कारण अपनी रोज़ी-रोटी चालाने के लिए लाचार हो जाएँगे. इसी तरह दलितों को भी मृत पशुओं की खाल निकालने की जगह अन्य रोज़गार ढूँढने में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को एक और झटका लगेगा. साथ ही दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय के लोग प्रोटीन का एकमात्र सस्ता स्त्रोत खो देंगे क्यूँकि बीफ़ (और यहाँ तक की भैंस का माँस) खाना एक अत्यधिक जोखिम भरा कार्य बन जाएगा.

विरोध प्रदर्शनों के प्रति सरकार की कठोर, सैन्यवादी नीति एक बार फिर कश्मीर में कोहराम मचाएगी. यदि मोदी सरकार कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के आर्टिकल 370, और आर्टिकल 35A को हटाने के अपने निश्चय पर बनी रहती है, तो जन-प्रकोप का बाँध टूट जाएगा.

केंद्र सरकार क़ानून बना कर अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने का रास्ता निकाल सकती है. जो साम्प्रदायिक भावना इस क़दम का हिस्सा होगी, वो देश के हर कोने में मुस्लिम विरोधी दंगों की आग उगलेगी, वही आग जिसने  1992 में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किए जाने के बाद भारत को निगल लिया था.

भारतीय इतिहास में फेरबदल

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दृष्टिकोण को लाखों भारतीय बच्चों के दिमाग़ में स्थापित करने के लिए पूरे देश में इतिहास की किताबों के पुनर्लेखन का एक बड़ा प्रोजेक्ट चलाए जाने की सम्भावना है. इसमें प्राचीन भारत को एक सुनहरे समय के रूप में दर्शाया जाएगा जहाँ 21वीं सदी की हर वैज्ञानिक उपलब्धि की कल्पना और संरचना की जा चुकी है. दलित और बौद्ध समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ ब्राह्मणों द्वारा की गयी हिंसा को ढक दिया जायगा. मध्यकालीन भारत को एक अन्धकारमय काल की तरह दिखाया जाएगा जहाँ मुसलमान शासकों ने अधीन हिन्दू पर अत्याचार कर उनके धर्म और संस्कृति को कुचल दिया. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अनेक अज्ञात हिंदुत्ववादी देशभक्तों को जगह दे दी जाएगी और अन्य स्वतंत्रता सेनानी जैसे सरदार पटेल, लाल बहादुर शास्त्री और यहाँ तह कि महात्मा गांधी और डॉक्टर बी.आर. अम्बेडकर को भी हिंदुत्व के साँचे में ढाल दिया जाएगा. हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गांधीजी का आजीवन संग्राम और इस कारणवश एक हिंदुत्ववादी विचारक के हाथों उनकी हत्या को इतिहास के पन्नो से मिटा दिया जाएगा.

फ़ोटो साभार- WeForNews

विश्विद्यालयों में प्रगतिशील विचार और विरोध ख़त्म हो जाएगा. सामाजिक आंदोलन और नागरिक समाज संस्थाओं को ग़ैर-क़ानूनी क़रार कर उनके फ़ंडिंग स्त्रोतों को जाम कर दिया जाएगा. भारत के सभी सार्वजनिक संस्थानों जैसे कि लोकपाल, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सी.बी.आइ), राष्ट्रीय जाँच एजेन्सी (एन.आइ.ए),  शासकीय सेवा (लेटरल एंट्री के द्वारा) और यहाँ तक की न्यायपालिकाओं को हिंदुत्ववादी विचारधारा के समर्थकों से भर दिया जाएगा. भारतीय सशस्त्र सेनायें भी इससे बच नहीं पाएँगी. चुनिंदा पूँजीवादियों को फ़ाएदा पहुँचाने के लिए लेबर, ज़मीन अधिग्रहण और पर्यावरण सम्बंधी क़ानून एवं बैंकिंग विनियमनों में ‘बदलाव’ लाए जाएँगे. सरकार की बहुसंख्यवादी एवं प्रो-व्यापार नीतियों के प्रति मीडिया की प्रत्यक्ष चियरलीडिंग में और उछाल आएगा.

हम इस बारे में डिबेट कर सकते हैं कि आख़िर क्यूँ इतने भारतीय मतदाताओं ने मोदीजी को चुना. लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय जनता पार्टी इस बहुमत को संघ के मास्टरप्लान को समेकित करने के अवसर रूप में देखेंगे, आख़िर संघ ही भाजपा की विचारधारा की नींव है. इसी के साथ, भारत को पूर्ण रूप से बदल दिया जाएगा.

यही वजह है कि इस सरकार से मेरी अपेक्षा यह नहीं है कि इसे क्या करना चाहिए, बल्कि यह है कि क्या नहीं करना चाहिए. यदि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की यह नई सरकार उपर्युक्‍त बिंदुओं में से सभी या एक भी कार्य पूरा करने में सक्षम होती है तो जो भारत हम अपने बच्चों को सौपेंगे वह भारत स्वतंत्रता और न्याय या सामान्य उदारता का भारत नहीं होगा. आज मुझे उम्मीद तो नहीं है, लेकिन अगर मैं ग़लत साबित हुआ तो ख़ुशी से फ़ूला ना समाऊँगा.

You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+