कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

भारत के लोगों को धर्म निरपेक्षता की रक्षा, बचाव और मजबूती के लिए लड़नी होगी लड़ाई- हर्ष मंदर

इस देश पर यहां के सभी निवासियों का बराबर का अधिकार है. किसी भी धर्म, भाषा, जाति, लिंग और वर्ग के लोग इस देश पर अपना वर्चस्व नहीं दिखा सकते.

गुरुवार को नई सरकार बनते ही भारत की कई चीज़ें ध्वस्त हो गईं. देश की अर्थव्यवस्था में सुधार की जरूरत है, ग्रामीण इलाके संकटग्रस्त हैं, रोज़गार की समस्या भी बदतर है. लगातार गिर रहा रुपया भी मुश्किलें खड़ी कर रहा है. मीडिया, पुलिस, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, योजना प्रक्रियाएं और चुनाव आयोग जैसे देश के संस्थान भी जल्द से जल्द पुनर्निर्माण को तरस रहे हैं. लेकिन, इन सबसे अधिक ख़तरनाक स्थिति में हमारी सेक्युलर लोकतंत्र को पहुंचा दिया गया है. इनके फिर से खड़ा होने की क्या संभावनाएं हैं?

धर्म निरपेक्षता के मुद्दे को लेकर द हिंदू ने बीते 22 मई को हर्ष मंदर का एक लेख प्रकाशित किया था.

बांटने वाला चुनावी कैंपेन

हाल ही में ख़त्म हुए ऊबाऊ चुनावी कैंपेन के दौरान दिए गए भाषणों को ध्यान से सुनना चाहिए. अपने चुनावी मंचों से विपक्ष के नेताओं ने किसानों की चिंता, बेरोज़गार युवाओं की समस्या, रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार, घोर पूंजीवाद और संस्थाओं पर आक्रमण जैसे सभी मुद्दे उठाए लेकिन शायद ही किसी ने लिंचिंग, मुसलमानों, इसाईयों और दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा के बारे में बात की हो. इसके साथ ही किसी नेता ने धर्म निरपेक्षता पर भी बात नहीं की.

भारत में सेक्युलरिज़्म का विचार यहां की  बहुलतावादी संस्कृति, अशोक और अकबर के जीवन-कर्म, बुद्ध, नानक और कबीर के विचारों से लिया गया है. आजादी की लड़ाई के समय गांधी, अंबेडकर, मौलाना आज़ाद और नेहरू जैसे लोगों ने सेक्युलरिज़्म के विचार को और भी अलंकृत किया. आज़ाद भारत में इस बात को प्रमुखता से रखा गया कि इस देश पर यहां के सभी निवासियों का बराबर का अधिकार है. किसी भी धर्म, भाषा, जाति, लिंग और वर्ग के लोग इस देश पर अपना वर्चस्व नहीं दिखा सकते.

लातूर में बालाकोट हमले पर वोट की अपील करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

सेक्युलरिज़्म भारतीय संविधान की आत्मा है. संविधान में आज भी सेक्युलरिज़्म जस का तस लिखा हुआ है, लेकिन अब उसकी आत्मा को छलनी किया जा चुका है. ना सिर्फ भारतीय जनता पार्टी बल्कि कहीं ना कहीं विपक्षी दलों ने भी मान लिया है कि भारत अब एक धर्म निरपेक्ष देश नहीं बल्कि बहुसंख्यकवादी हिन्दू राष्ट्र हो गया है. इस नए भारत में अल्पसंख्यक धर्मों, जातियों और लिंग के लोगों को दोयम दर्जे का माना जा रहा है. उनकी सुरक्षा ऊंची जाति पितृसत्तातमक हिन्दू धर्म के लोगों के भरोसे रह गई है. हिन्दू धर्म की बातों को हिंसक तरीके से हिन्दुत्व की विचारधारा में बदल दी गई है.

अगर हम 2019 के आम चुनाव को नरेन्द्र मोदी बनाम अन्य की लड़ाई बता रहे हैं, तो हम चूक कर रहे हैं.

आरएसएस बनाम संविधान

हालांकि इस बार देश में चुनाव को बिल्कुल अलग तरीके से लड़ा गया. एक तरफ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था तो दूसरी तरफ़ भारतीय संविधान का सेक्युलर विचार. नरेन्द्र मोदी आरएसएस वाली हिन्दुत्व के एक दुर्जेय, लड़ाकू, अथक और शक्तिशाली शख़्सियत हैं. और उनकी छवि को चमकाने में कॉरपोरेट मीडिया का एक धड़ा लगा हुआ है. लेकिन भारत के धर्म निरपेक्षता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा नरेन्द्र मोदी की छवि नहीं है. अब देश के हर संस्थान, हर राजनीतिक दल, मीडिया, विश्वविद्यालय, न्यायपालिका, सिविल सर्विसेज़ और यहां तक कि हर आम भारतीय के भीतर आरएसएस की विचारधारा समा गई है.

आरएसएस की नज़र में मुसलमान और ईसाई भारत के असल नागरिक नहीं हैं. देश के लिए उनकी वफ़ादारी हमेशा शक़ की निग़ाहों से देखी जाती है. इसलिए उन्हें भारतीय राजनीति या समाजिक व्यवस्था में दूसरों पर आश्रित होने का दिखावा करना पड़ता है. इस कारण बीते चुनाव में हेट स्पीच में इतनी प्रधानता से आया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने विरोधी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मज़ाक इसलिए उड़ाया क्योंकि राहुल ने मुसलमान और ईसाई बहुल संसदीय क्षेत्र को अपने लिए चुना.

प्रतीकात्मक चित्र

भारतीय जनता पार्टी के दूसरे नेताओं ने इसे ग्रीन वायरस और टर्माइट्स का नाम दिया. इसी कारण भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एनआरसी को देश के सभी हिस्से में लागू करने की बात कही. इसके लागू होने से दूसरे देश के हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों को नागरिकता मिलने में आसानी हो जाएगी. भारत के संविधान में हर नागरिक को उसके धर्म का ध्यान रखे बग़ैर बराबर की नागरिकता देने का प्रावधान है, लेकिन एनआरसी लागू होने से सीधे तौर पर इसका उल्लंघन होगा. इसी कारण देश के मुसलमानों की लिंचिंग की जा रही है और इसाईयों के चर्च पर हमले किए जा रहे हैं और भाजपा के नेता जोरशोर से इसका लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं. देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी और डरे सहमें अल्पसंख्यकों के बीच इस तरह के संबंध बन गए हैं.

डर के माहौल में

नरेन्द्र मोदी के दोबारा सत्ता में आने से यह साबित हो गया है कि भारत नफ़रत और डर में अपनी जड़ें जमा चुका है. यह माना जा सकता है कि बहुसंख्यक हिन्दुओं ने आरएसएस की विचारधारा को अपना समर्थन दे दिया है. यह चुनाव परिणाम यह दिखाता है कि भारतीय संविधान के सेक्युलर और मानवीय दृष्टिकोण की जगह लोगों ने  हिंसक और बहुसंख्यकवादी हिन्दुत्व की विचारधारा अपना ली है. यह विचारधारा अल्पसंख्यकों के प्रति नफ़रत और शक की निगाहों से देखती है. यह परिणाम सभी लेफ़्ट, लिबरल और लोकतांत्रिक विचारों को रखने वाले लोगों तथा सिविल सोसाईटी, मीडिया और विश्वविद्यालय पर संकट डाल सकती है. लेख और कलाओं पर भी संकट मंडरा सकता है.

गुड़गांव में मुस्लिम परिवार पर हमला

अगर ऐसा होता कि एनडीए बहुमत नहीं ला पाती, तो देश के अन्य क्षेत्रीय दल भारतीय जनता पार्टी को इस शर्त पर समर्थन दे सकते थे कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की जगह नितिन गडकरी या फिर राजनाथ सिंह को बनाया जाए. इस पर अधिकतर दलों की सहमति होती. अधिकतर राजनीतिक पार्टियां नरेन्द्र मोदी के अलावे दूसरे विकल्प को आसानी से स्वीकार कर लेती. लेकिन, ऐसा सोचना भी किसी मुग़ालते से कम नहीं है. आज भारत जिस स्थिति में पहुंच गया है, वहां से वापस लाना मुश्किल है. आरएसएस ने तो बहु-स्वीकार्य नेता अटल बिहारी वाजपेयी का इस्तेमाल भी संस्थानों के ख़ात्मे और सेक्युलरिज़्म को कम करने के लिए किया.

लखनऊ में कश्मीरी व्यक्तियों पर हमला करते भगवा धारी

अगर देश में यूपीए या फिर क्षेत्रीय दलों की गठबंधन सरकार बन जाती तो भी स्थिति में कोई सुधार नहीं होने वाली थी. इन सबके साथ, भारतीय जनता पार्टी ने 2004 के बाद से किसी भी एग़्जिट पोल में बुरा प्रदर्शन नहीं किया है, लेकिन उसने अधिकतर चुनाव हारे. भाजपा की बहुसंख्यकवादी राजनीति ने विपक्षी दलों को कमजोर किया है. परिणाम चाहें जो भी हो, धर्म निरपेक्षता को बचाने और मजबूत करने की लड़ाई भारत की जनता को ही लड़नी होगी. भारत अब क्षमा और करूणा की बंजर ज़मीन बन गया है. भारतीय समाज से नफ़रत को दूर करने में पीढ़ियों का समय लग जाएगा. इस लड़ाई को साहस, धैर्य और प्यार से लड़ना होगा. तब आख़िर में इतिहास हमारे साथ यानी प्यार के साथ होगा.

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