कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

प्रत्यक्षदर्शियों का दावा- फ़र्जी एनकाउंटर में हरियाणा पुलिस ने ली 26 वर्षीय मुस्लिम युवक की जान

मेवात ज़िले में गुरुवार, 21 फ़रवरी को पुलिस के साथ हुए कथित मुठभेड़ में अरशद मारा गया.

हरियाणा: मेवात के बिसरु गांव निवासी अरशद(26), जो ग्यारह महीने के बच्चे का बाप था, पिछले गुरुवार को पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में मारा गया. पुलिस की मानें तो गुरुवार सुबह जब पुलिस अरशद और इनके साथियों को पकड़ने बिसरु गांव पहुंची तो उन्होंने पुलिस पर ही फायरिंग शुरू कर दी. जवाबी कार्रवाई में जहां अरशद की मौत हो गई है वहीं उनके साथी इकराम(41), मुश्ताक़(30) और मुस्ताक़(40) घायल हो गए.

एनकाउंटर का दूसरा पहलू

बिसरु गांव के निवासी पुलिस के इस विवरण से इत्तफ़ाक़ नहीं रखते हैं, जिसमें कहा गया कि बदमाशों के तरफ़ से फ़ायरिंग की गई, जिसके जवाब में पुलिस भी गोली चलाती है. स्थानीय लोगों का कहना है गुरुवार सुबह नौ बजे अरशद, इकराम, मुश्ताक़, मुस्ताक, अज़ाद(36) और टिल्लू(36) चाय पीने के लिए धूप में बैठे थे. अचानक गांव के रास्ते से चार सिविल गाड़ियो और 2 पीसीआर में पुलिस आती है. लोगों का कहना है कि अरशद और उनके साथियों के पास किसी प्रकार के हथियार नहीं थे.

गांव में रहने वाला शरफ़ू बताता है, “कल सुबह नौ बजे की ही बात है. अरशद, इकराम, मुस्ताक के साथ उसके और तीन दोस्त नहाकर धूप में बैठे थे. अचानक गांव के रास्ते गाड़ियों से पुलिस आती है. पुलिस देख कर सभी भागने की कोशिश करते हैं. लेकिन सभी को पुलिस पकड़ लेती है. अरशद को तीन पुलिस वाले पकड़कर जमीन पर लेटा देते हैं और चौथा पुलिस वाला उसके सिर में गोली मार देता है.”

फ़ायरिंग को लेकर शरफ़ू बताता है कि “वो तो चाय पीने के लिए ही बैठे थे. अचानक पुलिस की रेड पड़ जाती है. हथियार तो उनके पास था ही नहीं. फ़ायरिंग कहां से करेंगे”

मौक़े पर मौजूद असमीना बताती है कि “पुलिस वालों ने अरशद को मुंह की साइड से लिटा रखा था. गोली मारने के बाद उसे पांच-सात मिनट तक दबाये रखा जब तक वो तड़पना छोड़ नहीं दिया. उसके बाद एक पुलिस वाले ने इकराम को पकड़ा और उसकी गर्दन को नीचे झुका दिया. दूसरे पुलिस वाले ने उसके कूल्हे पर गोली मार दी. फिर मुश्ताक़ को पैर में पकड़ कर गोली मारी और एक अन्य के साथ भी ऐसे ही हुआ है.”

असमीना कहती है कि मैंने पुलिस को माना किया था. मैंने कहा, “आप इसे यहां नहीं मारे, यहां से ले जाए….इस पर पुलिस वाला कहता है कि ये आपका खालू लगता है क्या?”

घटना की चश्मदीद गवाह रही रश्मि भी बताती है कि “सारे के सारे पुलिस वाले थे. किसी ने फ़ायरिंग नहीं की. बस पुलिस वाले ने गोली मारी.”

उन पुलिस वालों की पहचान करने को लेकर रश्मि थोड़ा हिचकती है लेकिन यह पूरे विश्वास के साथ कहती हैं कि वह यह बयान कहीं भी दे सकती हैं.

हरियाणा पुलिस के द्वारा घटना का विवरण

पुलिस अधिक्षक, नूंह,संगीता कालिया ने द हिंदू को बताया कि “एक पुलिस दल ने बिसरु गांव के बाहरी इलाके पर छापा मारा. हमें इनपुट मिली थी कि अपने गैंग के साथ उस गांव में छिपा है. इस पुलिस टीम में नूह पुलिस स्टेशन के 7 सदस्य और रेवाड़ी की एक टुकड़ी थी.

पुलिस टीम को देखते ही आरोपी गोली चलाना शुरू कर दिए. इस मुठभेड़ में कॉन्स्टेबल पवन घायल हो गए. एक गोली उनके दाहिने हाथ पर और दूसरा उनके सीने पर . हालांकि बुलेट प्रूफ जैकेट से वह बच गए. पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की और अरशद को एक गोली लगी.”

द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक़ हरियाणा और राजस्थान में अरशद के ऊपर कई मुक़दमे दर्ज किए गए थे. दो मामलों में वह आरोपमुक्त हो चुका था, लेकिन पांच अन्य मुक़दमे में उसकी गिरफ़्तारी पेंडिंग थी. उसके ऊपर 25,000 रुपए का ईनाम रखा गया था.
उधर, इकरम हत्या के मुक़दमे में 50,000 का ईनामी बदमाश था. पांच राज्यों में उसके ख़िलाफ़ 9 मुक़दमे दर्ज किए गए थे.

सुप्रीम कोर्ट का दिशा-निर्देश और “स्टेट स्पॉन्सर्ड टेररिज़्म”

2014 में सुप्रीम कोर्ट ने मुठभेड़ में हुए हत्याओं के संदर्भ में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे. इसमें मुठभेड़ की जगह की रिकॉर्डिंग करना, मृतक के बारे में परिजनों को सूचित करना, जब तक एनकाउंटर संदेह के घेरे से बाहर ना आ जाए, तब तक पुलिस अधिकारी को इस पर अवार्ड लेने से रोकना. और एनकाउंटर मामले की जांच सीआईडी ​​या किसी दूसरे पुलिस स्टेशन के कर्मियों द्वारा कराने की बात शामिल है.

पिछले कुछ वर्षों में खासतौर से उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर की घटनाओं में वृद्धि हुई है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने भी उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को एक नोटिस जारी किया था. लेकिन, अभी उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

एनकाउंटर मसले पर 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य नहीं है कि किसी भी अपराधी के ख़ौफ़नाक होने की वज़ह से उसका एनकाउंटर कर दिया जाए. निश्चित तौर पर पुलिस को आरोपी को गिरफ़्तार करना चाहिए और उसके बाद उसके ऊपर ट्रायल चलाया जाना चाहिए. इस अदालत ने बार-बार ऐसे ‘ट्रिगर हैप्पी’ पुलिस कर्मियों फटकारा है, जो अपराधियों को मार देते हैं और उसे एक मुठभेड़ की घटना के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं. ऐसी मौतों को बिल्कुल रोका जाना चाहिए. इन घटनाओं को हमारे आपराधिक न्याय प्रशासन प्रणाली द्वारा कानूनी नहीं माना जा सकता है. इन्हें राज्य प्रायोजित आतंकवाद (स्टेट स्पॉन्सर्ड टेररिज़्म) माना जाता है.”

अरशद का भाई हकम फ़ोन पर बस इतना ही कह पाता है कि “यह एनकाउंटर नहीं है जी…मेरे भाई को पकड़कर गोली मारी गई है… यह वन साइडेड अटैक है.”

(मो. आरिफ़ एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्हें कारवां-ए-मोहब्बत से फ़ेलोशिप प्राप्त है.)

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