कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

देश पर थोपा जा रहा “एक समान सोच” का बोझ, असहमति की आवाज़ पर बरसाई जा रही लाठियां

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1952 और 1957 के चुनाव में कहा था कि मैं एक नहीं, दो नहीं बल्कि अपने जीवन का सारा चुनाव हारने को तैयार हूँ पर धर्म-निरपेक्षता से कभी समझौता नहीं करूँगा.

देश में मोदी सरकार बनने के बाद से ही “एक” शब्द का प्रचलन खूब बढ़ा है. “एक देश एक चुनाव”, “एक राष्ट्र एक टैक्स” और “एक जैसी सोच” का मुलम्मा नागरिकों के ऊपर थोपा जा रहा है. अलग सोच रखने वालों को कुचलने की पूरी कोशिश हो रही है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के साथ भी वही हुआ. ग़रीब घरों से आने वाले और व्यवस्था की ख़ामियों पर सवाल पूछने वाले छात्रों के ऊपर फीस का बोझ लादकर उन्हें तोड़ने की कोशिश हो रही है. जानी-मानी लेखिका फराह नक़वी बताती हैं कि हम ऐसे मोड़ पर आ गए हैं जहां विविधता और भिन्नता के ख़िलाफ़ नफ़रत और भय फैलाई जा चुकी है.

इन सबके बीच विपक्ष कहां है? चाहे वो पूरे देश में एनआरसी लागू करने की बात हो या जेएनयू के छात्रों के साथ ज़ुल्म. विपक्षी नेता किसी भी मुद्दे पर खुल कर सामने नहीं आ रहे. वोट बैंक की राजनीति के कारण उनके भीतर अपनी सत्ता जाने का भय है. लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1952 और 1957 के चुनाव में कहा था कि मैं एक नहीं, दो नहीं बल्कि अपने जीवन का सारा चुनाव हारने को तैयार हूँ पर धर्म-निरपेक्षता से कभी समझौता नहीं करूँगा.

इस समय में हमारी क्या जिम्मेदारी है ये बात पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी बताते हैं. कारवां-ए-मोहब्बत से बातचीत में उन्होंने कहा कि संविधान का पहला पन्ना हमें रोज पढ़ना चाहिए. एक नागरिक के तौर पर हमें जितने विचार चाहिए वो संविधान के पहले पन्ने यानी प्रस्तावना में दिया गया है. इसे पढ़ने से हम न्याय, समानता और बंधुत्व की भावना से भारत के असली विचार को समझ पाएंगे.

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद बताते हैं कि हिंदुस्तान के दो बुनियादी सिद्धांत हैं. पहला यह कि मुसलमानों और ईसाईयों को बराबर का अधिकार मिलेगा और दूसरा सिद्धांत है आरक्षण का. इन दोनों से छेड़छाड़ होने पर हिंदुस्तान ख़त्म हो जाएगा.

आज मुसलमानों के प्रति उपेक्षा और द्वेष के कारण शहरों के नाम तक बदले जा रहे हैं. मुग़लसराय को पंडित दीनदयाल उपाध्याय कर दिया गया. इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया गया. यह प्रक्रिया अनवरत जारी है. प्रो. अपूर्वानंद बताते हैं कि यह पहली बार नहीं है. 1949 में भी उत्तर प्रदेश के कई शहरों के नाम बदले जा रहे थे. जिन शहरों के नाम के आख़िरी में “बाद” था उनमें से बाद हटाकर “नगर” जोड़ा जा रहा था. इंदिरा गांधी ने इस पर कड़ा विरोध जताया. उन्होंने अपने पिता जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा कि अगर इस पर रोक नहीं लगी तो वे अपना नाम बदलकर फिरोजा बेग़म कर लेंगी. पहले के नेताओं का अपना एक सिद्धांत था, जिन्होंंने कभी भी धर्म-निरपेक्षता से समझौता नहीं किया.

धीरे-धीरे राजनीति बदलती गई. अब यह इस मोड़ पर आ गई है कि राजधानी दिल्ली में सरेआम जेएनयू के छात्रों पर लाठीचार्ज किए जा रहे हैं. विकलांग छात्रों तक को नहीं छोड़ा गया. बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में एक मुस्लिम शिक्षक को इसलिए अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी क्योंकि वह मुसलमान था और संस्कृत पढ़ाने की चाह और योग्यता रखता था. पूरे देश में एनआरसी लागू होने की बात हो रही है. तीन महीने से अधिक समय से जम्मू-कश्मीर पूरी तरह ठप पड़ा है. मॉब लिंचिंग की संस्कृति को राजनीति का समर्थन मिल रहा है. अब हमें और आपको यह देखना होगा कि हमारे पुरखों ने जिस हिंदुस्तान की नींव रखी थी वह बचती हुई नज़र आ रही है? अगर नहीं, तो उस हिंदुस्तान को ज़िंदा करने के लिए हमें आगे आना होगा.

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