कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

बहुसंख्यक हिन्दुओं द्वारा राष्ट्रभक्ति का प्रमाण देने का वक्त आ गया है

हममें से कोई भी इस दौर के प्रकोप से नहीं बच सकेगा, यह हिंसा एक दिन हम सबको निगल जाएगी.

क्या आपने लखनऊ की ग़लियों में कश्मीरी दुकानदार के साथ बर्बर तरीके से की गई मारपीट का विडियो देखा है? क्या आपको धक्का लगा? क्या अब भी किसी इंसान की दर्द-भरी पुकार सुनकर आपके भीतर कुछ बेचैनी होती है? फ़िल्मों की तरह झूठी हिंसा और मारपीट नहीं, असली मारपीट, असली खून और असली चीत्कार सुनकार आपके भीतर कोई असर होता है?

क्या वायरल विडियो देखकर आपने कुछ समय के लिए स्मार्टफोन दूर रख दिया? क्या भारत में भारत के लोगों के साथ ही हो रही इस तरह की हिंसा के सबूत को अन्य लोगों को फॉरवर्ड करके बाँटा? इस तरह के अप्राकृतिक क्षण का आपके उपर क्या असर हुआ?

अपने आंखों के सामने अन्याय देखकर किसी मनुष्य को किस तरह की प्रतिक्रिया देनी चाहिए? क्या कोई हमें याद दिला सकता है?

पिछले 24 घंटे से मेरे सोशल मीडिया फ़ीड पर हिंसा के चार विडियो सामने आए हैं. सभी विडियो उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश के हैं. इन सभी में पुरुषों की भागीदारी है. कुछ विडियो में बराबरी के लोगों के बीच टकराव है, तो कुछ टकराव सामाजिक और राजनीतिक रूप से ग़ैर बराबर लोगों के बीच देखा गया है.

भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी और भाजपा विधायक राकेश बघेल एक बैठक के दौरान मारपीट पर उतर आए.

एक विडियो में  एक युवक को बढ़ती बेरोज़गारी  के मुद्दे पर सरकार से सवाल पूछने के कारण मारा गया है. मुजफ़्फ़रनगर के इस शख़्स ने एक टीवी कार्यक्रम में रोज़गार के मुद्दे पर सवाल पूछा था. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी द्वारा जोर शोर से उठाए जा रहे विकास और रोज़गार में वृद्धि का इस शख़्स ने प्रमाण मांगने की जुर्रत की थी.

दूसरे विडियो में भाजपा के एक सांसद ने अपनी ही पार्टी के एक विधायक को कॉन्फ़्रेंस रूम में एक बैठक के दौरान, अपनी चप्पल से मारा. जनता द्वारा चुने गए नेताओं के बीच मूर्खता पूर्ण तरीके से मारपीट का यह वाकया अचंभित करने वाला था. अब नेताओं से हमारी अपेक्षाएं इतनी कम हो गई हैं कि मुझे इस तमाशे से कुछ ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ा. मैंने इससे नज़र फ़ेर ली और इससे दूरी बनाए रखना ही ठीक समझा.

तीसरे और चौथे विडियो ने मेरी आत्मा को चोट पहुँचाई है. इन पंक्तियों को लिखते वक्त मेरी उंगलियां कांप रही हैं. दोनों विडियो में लखनऊ के डालीगंज में  भगवा कपड़ा पहने चार लोगों द्वारा दो कश्मीरी मुसलमान व्यापारियों को पीटते हुए देखा जा रहा है. विडियो में हम उन दोनों असहाय कश्मीरियों की चीखों को सुनते हैं. अंत में शहर का ही एक स्थानीय निवासी आता है और इस हिंसा को रोकने की कोशिश करता है.

लखनऊ में कश्मीरी व्यक्तियों पर हमला करते भगवा धारी

न्यू इंडिया, अर्थात नए भारत में आपका स्वागत है. पूरे भारत में हिन्दुत्व की विचारधारा वाले उच्च जाति के लोगों द्वारा मुसलमानों, दलितों एवं अन्य अल्पसंख्यकों के लोगों के ऊपर हो रही हिंसा का नया उदाहरण देखने मिलता है. पुलवामा में सीआरपीएफ़ जवानों के काफ़िले पर आतंकी हमले के बाद  कश्मीरी मुसलमानों के साथ मारपीट की घटनाओं का एक पैटर्न देखा गया है. देश के दूसरे हिस्सों में कश्मीरी मुसलमानों को उनके व्यापार, घरों और  कॉलेजों से बेदख़ल करने के लिए हिंसा का प्रयोग किया गया.

इस तरह की व्यापक हिंसा के बावजूद भी किसी राजनेता ने इन कश्मीरी लोगों के समर्थन में कोई बयान नहीं दिया. कश्मीरी छात्रों को निशाना बनाया जाता रहा और उनसे अवसर छीनने की कोशिशें लगातार जारी रही लेकिन किसी भी राजनैतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति ने अपने ही देश में उपेक्षा का शिकार हो रहे इन कश्मीरीयों के जीवन को बचाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाए.

अब वह समय आ गया है, जब हमें मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों की बजाय यहां के सभी बहुसंख्यक हिन्दुओं से उनकी राष्ट्रभक्ति का प्रमाण मांगना चाहिए. उनसे भारतीयता के प्रति उनकी वफ़ादारी का प्रमाण मांगने का वक्त आ गया है.

भारत का संविधान हमें कुछ अधिकार देता है और एक नागरिक के तौर पर हमारे लिए कुछ कर्तव्य भी निर्धारित करता है. हमारे स्कूलों में पढ़ाया जाता है कि भारत के हर नागरिक को समानता और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है. हमारे पास शोषण का प्रतिकार करने का अधिकार है. संविधान ने 11 मूल कर्तव्य निर्धारित किए हैं. इनमें एक कर्तव्य यह भी है कि हम भारत की समग्र संस्कृति और भाईचारे की भावना की रक्षा करें. माध्यमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले अपने बच्चों की किताबों को खोलें और अपने कर्तव्यों को समझें.

हम लोग (जो खुद को भारतीय कहते हैं) कैसे इस तरह की हिंसा होने दे सकते हैं? ऐसी हिंसा जो निरीह और आसानी से निशाना बनाये जाने वाले लोगों के साथ की जाती है, कैसे हम उसका समर्थन कर सकते हैं? कैसे हम अपने समाज के तानेबाने को नुक़सान पहुंचाने दे सकते हैं?

गुजरात के ऊना में, दलित पुरुषों पर जुलाई 2016 में गौ-रक्षकों द्वारा हमला किया गया था.

जब कभी भी हम यह सुनते या देखते हैं कि किसी भी भारतीय को उसकी पहचान — मुस्लिम, कश्मीरी या दलित — की वज़ह से हिंसा का शिकार बनाया जाता है, तो इससे सबसे अधिक नुक़सान हमारी मानवता का होता है. इस तरह की घटनाओं पर चुप्पी साधकर, मौन समर्थन देकर या इसके दोषियों को दंड मुक्त करके हम अपनी ही सभ्यता को ज़ख़्मी कर रहे हैं. वह सभ्यता जिसने हमें पाला है, हमें भारतीय होने की पहचान दी. वह सभ्यता जिसने हमें भाषा, संस्कृति या धर्म में असमानता होने के बावजूद भी आपसी भाईचारा  बनाए रखने की पहचान दी.

हममें से कोई भी इस दौर के प्रकोप से नहीं बच सकेगा, यह हिंसा एक दिन हम सबको निगल जाएगी. इसने हमारे संबंधों को बर्बाद करना शुरू कर दिया है और हमारे अस्तित्व के सामने एक संकट ला खड़ा किया है — कि हम कौन हैं एवं एक समाज के तौर पर और कितना नीचे गिर सकते हैं?

इस हिंसा को रोज़ अलग अलग लोगों को शिकार करते हुए देख कर हम खुद अपने आप को ही बर्बाद कर रहे हैं. हम अपने ही वज़ूद को खाई में धकेल रहे हैं.

नताशा बधवार ‘इमोर्टल फॉर अ मोमेंट’ और ‘माइ डॉटर्स मम’ किताबों की लेखिका हैं. हर्ष मंदर और जॉन दयाल के साथ इन्होंने ‘रिकॉन्सिलिएशन: कारवां ए मोहब्बत’स जर्नी ऑफ सोलिटरिटी थ्रू ए वूँडिड इंडिया’ का सह-संपादन भी किया है.

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है. मूल लेख को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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