कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ये मीडिया अगर बिक भी जाये तो क्या है

आपको और मुझको शांति मिले न मिले, हमारी मीडिया को तो मोक्ष मिल ही गया है।

मन की शांति के लिए अनंत काल से लोग अलग-अलग तरकीबें सुझाते आए हैं – योगा, व्यायाम, ध्यान-चिंतन, फलां-ढिमका भगवान की पूजा आदि। तीन सौ बार एक मन्त्र का उच्चारण करो या पच्चीस बार किसी के मज़ार पर मत्था टेको। समस्या पर सब सहमत, किन्तु समाधान पर कोई नहीं। इसलिए मैं शुक्रगुजार हूँ पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश की आब-ओ-हवा में आए बदलाव की। इस बदलाव का सबसे बेहतरीन मंज़र हमारी मीडिया में देखने को मिला। ख़बरों की जाँच-पड़ताल और समीक्षा के ज़िम्मे से कबके हाथ धो चुके न्यूज़ चैनलों ने निकम्मेपन में नया मक़ाम हासिल किया। देखते ही देखते न्यूज़ में विशेषज्ञों की जगह राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं और अन्य मूँह-फटों ने ले ली और विचार-विमर्श की जगह चिल्लम-चिल्ली ने। तर्क-वितर्क का स्थान गाली-गलौंच व लात-घूसों ने हथिया लिया। यदि आपके विचार दकियानूसी और आवाज़ बुलंद है, तो एक न एक पैनल पर सीट पक्की। पहले खबर के कारण ये ‘पैनलिस्ट’ झगड़ते थे, पर अब ये झगड़े ही आज की ताज़ा ख़बर बन गए। इसी बादौलत तकरीबन सभी सभ्य जन आखिरकार राज़ी हुए कि न्यूज़ से परहेज करना ही मन की शांति का सर्वोच्च उपाय है। यहाँ तक कि डॉक्टर भी अब ब्लड प्रेशर के मरीजों को खाने में नमक बाद में, टी.वी. न्यूज़ का सेवन पहले कम करने की सलाह देने लगे।

यदि कुरुक्षेत्र के संग्राम के समय संजय अपनी दिव्य दृष्टि का वाई-फाई कनेक्शन काट देते तो धृतराष्ट्र को अपने वंश के नाश की डेली अपडेट का सिर दर्द न मोल लेना पड़ता।

अब मेरी नादानी ही कहिये कि मुझे ग़लतफ़हमी थी कि सुधीर चौधरी के तिहाड़ जेल निवास या ‘2000 के नोट में लगी ट्रेकिंग चिप’ जैसे अनाप-शनाप प्रोग्रामों की पीड़ा झेलने के पश्चात लोगों ने ज़ी न्यूज़ से परहेज़ कर लिया होगा। या अर्नब गोस्वामी द्वारा रोज़ाना “नेशन वांट्स टू नो” चिंघाड़े जाने से तंग आकर शायद रिमोट के ‘ऑफ़’ बटन से दोस्ती की होगी। इंडिया टीवी के ‘काल कपाल महाकाल’ जैसे सनकी शो देखकर थकान महसूस की होगी। किन्तु कचरे के आस पास रहने के आदि हम भारतवासी अब अपनी नाक पर हाथ रखने की ज़हमत भी नहीं उठाते। न मैंने खाने में नमक कम किया, न पिताजी ने न्यूज़ देखना।

चाहकर भी इस पतन का दोष बेचारे दर्शकों के सर नहीं मढ़ा जाता। आखिर देश का हाल जानने को हम जाएँ तो जाएँ कहाँ  कोबरापोस्ट द्वारा किए गए स्टिंग ‘ऑपरेशन 136’ ने प्रिंट मीडिया का सहारा भी छीन लिया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक जागरण जैसे मुख्य मीडिया घरानों के कार्यकारी हिंदुत्वा एजेंडा धकेलने के लिए घूस मंज़ूर करते कैमरे पर पकड़े गए। लोकतंत्र के इन रखवालों ने सत्ताधारियों की विचारधारा के साथ-साथ नोटों की धारा के आगे भुजंगासन कर शान्ति प्राप्त कर ली। फिर भी हमने खुदको दिलासा दिया कि लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्भ गिर ही तो रहा है, गिरा तो नहीं है भाई?

लेकिन उम्मीद पर दुनिया ही क़ायम है, मीडिया नहीं। ‘इंडिया टुडे’ ने पिछले हफ्ते पत्रकार की आवश्यकता को भी निकाल फैंक, भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा को ही एंकर की कुर्सी पर बैठा दिया। निष्पक्ष पत्रकारिता का खुला मज़ाक उड़ाने के लिए डिबेट का टॉपिक भी उपयुक्त था, “क्या विपक्षी एकजुटता 2019 में मोदी के लिए चुनौती है?” इस घंटे भर की राष्ट्रीय शर्मिन्दिगी के प्रसारण के दौरान स्क्रीन के ऊपर चमकता ‘इंडिया टुडे’ का लोगो मानों दर्शकों को चिढ़ा रहा था कि देखो! यह है आज का भारत। इमरजेंसी के भारत में पत्रकार संघर्ष करते-करते जेल गए, लेकिन आज के भारत में भगवा पहनी यह मीडिया अपनी ज़िम्मेदारियाँ त्याग कर समाधि लेने निकल गई है। निष्पक्षता और पारदर्शिता की मोह-माया से परे हैं ये भगवाधारी सम्पादक, प्रबंधक और पत्रकार। आपको और मुझको शांति मिले न मिले, हमारी मीडिया को तो मोक्ष मिल ही गया है।

मेनस्ट्रीम मीडिया में आज एक व्यक्ति है जो अनगिनत धमकियों के बावजूद भी प्राईमटाइम पर शासकीय अन्यायों के ख़िलाफ़ बेबाक बोलता आ रहा है। जिस तरह ज़िया-उल-हक़ की तानाशाही के खिलाफ हबीब जालिब की बग़ावत की मिसाल आज तक क़ायम है, उम्मीद है कि रवीश कुमार के एंटी-नेशनल हौंसलों का ज़िक्र भी उसी तरह बरकरार रहेगा।

और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना
रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना

 

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