कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

MeToo के दौर में भंवरी देवी को याद करने की ज़रूरत क्यों है ?

भंवरी देवी का केस इस देश की पूरी सामाजिक-प्रशासनिक हक़ीक़त का आइना है.

22 सितम्बर, 1992 की शाम. जयपुर से करीब 55 किमी दूर भटेरी गाँव. भंवरी देवी और उसका पति मोहनलाल दोनों अपने खेत पर काम कर रहे थे. शाम का सूरज ऐसे मालूम होता था जैसे अपने घोड़ों को लेकर मानो कहीं छिप जाना चाहता हो. तभी गाँव के पांच दबंग लठैत भंवरी और उसके पति को घेर लेते हैं, असहाय भंवरी के साथ दुष्कर्म किया जाता है जिसके बाद न्याय पाने के लिए शुरू होता है भंवरी देवी का संघर्ष. जिसकी परिणति संसद में यौन शोषण के विरुद्ध महिलाओं के लिए क़ानून बनने के रूप में होती है.

आखिर भंवरी देवी के संघर्ष की कहानी में ऐसा क्या ख़ास है जिसे जानना बेहद ज़रूरी है. आखिर कौन थी भंवरी देवी और उसकी लड़ाई किससे थी ? समाज से ? प्रशासन से ? या सरकार से ?

भंवरी देवी राजस्थान के भटेरी गाँव की एक सामजिक कार्यकर्ता थी. भटेरी गुर्जर बाहुल्य वाला गाँव है जबकि भंवरी कुम्हार जाति से थी जोकि जातीय सोपान में हाशिए पर है.

भंवरी देवी, फ़ोटो साभार-Furkan Latif Khan/NPR

नब्बे के दशक में राजस्थान में बालविवाह बेहद सामान्य बात हुआ करती थी भंवरी की शादी तब कर दी गई थी जबकि वह मात्र 5 से 6 वर्ष की थी जबकि उनके पति मोहन लाल प्रजापत मात्र 8 वर्ष के ही थे.

1985 में राजस्थान सरकार ने ‘महिला विकास कार्यक्रम’ की शुरुआत की जिसके तहत स्थानीय महिलाओं को ही साथिन ( दोस्त ) के रूप में नियुक्त किया गया. जिसका मूल उद्देश्य बिजली,पानी, स्वास्थ्य, साफ़ सफाई एवं सामजिक समस्याओं जैसे बाल विवाह, आदि की समस्याओं को सरकार के सामने लाना था.

1987 आते-आते भंवरी देवी ने जमीन से जुड़े कईयों मुद्दे उठाए, भंवरी देवी ने न्यूनतम मजदूरी से लेकर पड़ोसी गांवों में महिलाओं के साथ होने वाले यौन शोषण जैसे मुद्दों को उठाया तो भंवरी को गाँव वालों का भी समर्थन मिलने लगा. लेकिन भंवरी के जीवन में मुसीबतों का पहाड़ तब टूटा जब उसने अपने ही गाँव में एक 9 महीने की बच्ची का बालविवाह रोकने का प्रयास किया.

भंवरी द्वारा गाँव भटेरी में बालविवाह के विरुद्ध कैम्पेन चलाया गया लेकिन गाँव वालों ने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया. यहाँ तक कि ग्रामप्रधान ने भी भंवरी का साथ नहीं दिया. गाँव में कथित उच्च जाति गुर्जर समुदाय के ही रामकरन द्वारा अपनी बिटिया का विवाह 9 माह की उम्र में ही तय कर दिया गया था. भंवरी ने बालविवाह न करने के लिए रामकरन के परिवार को मनाने की खूब कोशिश की लेकिन रामकरन एवं उसका परिवार नहीं माना.

हिन्दुओं में अक्षयतृतीय एक ऐसा दिन होता है जिसे विवाह के लिए शुभ मुहूर्त माना जाता है अक्सर इसी दिन बालविवाह की संख्या भी अधिक होती है. अक्षयतृतीया के दिन यानी जिस दिन शादी होनी थी पुलिस प्रशासन द्वारा गाँव में बराबर पहरा लगाया गया. इसका परिणाम यह हुआ कि उस 9 माह की बच्ची का बालविवाह रोक लिया गया लेकिन रात के अँधेरे में ही करीब 2 बजे शादी संपन्न करा दी गई. इसके बाद पुलिस द्वारा विवाह कराने वालों के खिलाफ़ कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई.

यहीं से भंवरी देवी का गाँव में सामाजिक बहिष्कार शुरू होता है. गाँव की उच्चजातियों को यह नागवार गुजरा कि एक कुम्हारिन औरत उनके निजी मामलों में हस्तक्षेप करे और उन्हें समझाए. गाँव वालों के द्वारा भंवरी को दूध देने से प्रतिबंध लगा दिया गया. भंवरी के परिवार द्वारा बनाए जाने वाले मिटटी के बर्तनों को खरीदने का भी गाँव में बहिष्कार कर दिया गया. भंवरी को उसकी नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया जाने लगा. कुछ दिन में ही भंवरी के पति को गुर्जर जाति के कुछ दबंगों द्वारा पीट दिया गया.

22 सितम्बर, 1992 के दिन भंवरी और भंवरी के पति दोनों खेत पर काम कर रहे थे तभी गाँव की दबंग जाति के पांच लोगों ने दोनों को घेर लिया. भंवरी के पति की दबंगों ने लाठियों से पिटाई की. इसके बाद पति मोहन लाला को दबंगों द्वारा पकड़कर बाँध लिया गया. भंवरी के अनुसार दबंगों द्वारा उसके साथ बारी बारी से बलात्कार किया गया. यह उसी परिवार से सम्बंधित लोग थे जिनके यहाँ बाल विवाह होने से रोकने के लिए भंवरी द्वारा प्रयास किया गया था.

अब यहाँ से भंवरी अपने लिए न्याय पाने के लिए लड़ने की ठानती है. भंवरी नज़दीकी बस्सी थाने एफ़आइआर कराने के लिए पहुँचती है जैसा कि रेप के अधिकतर मामलों में होता है पुलिस यहाँ भी मामला दर्ज करने में आनाकानी करने लगी़ लेकिन यहाँ संवेदनशीलता की सीमाएं पार कर दी गईं. सबूत के तौर पर भंवरी से उसका ‘लहंगा’ जमा करने के लिए कहा गया जो उसने पहना हुआ था. भंवरी को पुलिस स्टेशन से 3 किलोमीटर दूर ‘साथिन गाँव’ तक अपने पति की खून से लतपथ साफ़ा से खुद को ढककर आना पड़ा| ध्यातव्य रहे कि उस वक्त घड़ी में सुबह के 1 बज रहे थे.

भंवरी का दुर्भाग्य यहीं खत्म नहीं हुआ जब भंवरी अपना मेडिकल टेस्ट कराने प्राइमरी हेल्थ सेंटर पहुंची तो उसका मेडिकल टेस्ट करने से मना कर दिया गया चूँकि वहां कोई महिला डॉक्टर ही नहीं थी जो भंवरी का मेडिकल टेस्ट करती.

भंवरी को जयपुर के संवाई माधो अस्पताल में टेस्ट कराने के लिए रेफर कर दिया गया. लेकिन पीएचसी ने अपने रेफरल में लिख दिया कि उसने केवल पीड़ित की उम्र जांचने के लिए रेफर किया है. मेडिकल ज्यूरिस्ट ने बिना मजिस्ट्रेट के आर्डर के किसी भी प्रकार का टेस्ट करने से मना कर दिया. इधर भंवरी जब मजिस्ट्रेट के पास पहुंची तो मजिस्ट्रेट द्वारा भी कोई भी आर्डर देने से इसलिए मना कर दिया गया क्योंकि तब तक उसकी ड्यूटी का समय खत्म हो चुका था. मजिस्ट्रेट ने भंवरी से अगले दिन आने के लिए कहा. फलतः भंवरी के यौन अंगों की जाँच को 48 घंटे से अधिक बीत गए जबकि देश के क़ानून के हिसाब से घटना के 24 घंटे के अंदर ही पीड़िता का टेस्ट कर लिया जाना चाहिए. इसका परिणाम यह हुआ कि उसके घावों और स्क्रेचों को रिकॉर्ड ही नहीं किया जा सका और पीड़िता की शिकायत में से उसकी फिजिकल असहजता को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. हालांकि बाद में पुलिस द्वारा आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन आरोपियों का साथ धनराज मीणा द्वारा दिया गया जो कांग्रेस पार्टी से उस समय स्थानीय विधायक थे.

तीन दिन बाद राजस्थान पत्रिका में एक छोटे से कोने में भंवरी के साथ हुए रेप की ख़बर छपती है. लेकिन कुछ ही दिन बाद 2 अक्टूबर को राजस्थान पत्रिका में ‘’क्रूर हादसा’’ के नाम से दोबारा बड़ा सा एक सम्पादकीय छपता है जिसके बाद जयपुर स्थित कईयों महिला संगठनों ने इस मुद्दे को उठाना शुरू कर दिया.

भंवरी पर रेप केस को गढ़ने का आरोप भी लगा. भंवरी को झूठा कहा जाने लगा तमाम आरोप भंवरी पर ही मढ़ दिए गए. भंवरी को सार्वजनिक अपमान सहना पड़ा. जबकि गाँव में उसका परिवार सामजिक एवं आर्थिक बहिष्कार झेल ही रहा था.

लेकिन भंवरी को इससे अधिक धक्का तब लगा जबकि 15 नवम्बर, 1995 को जिला न्यायालय और सेशन न्यायालय ने पाँचों आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया. इस मामले की सुनवाई के बीच में ही पांच जजों का तबादला हुआ. छठवे जज ने कहा कि ‘’आरोपी अपराधी नहीं हैं’’ इसके साथ ही आगे छठे जज ने कहा कि ‘’भंवरी का पति ऐसे चुपचाप बैठकर अपनी पत्नी का रेप होते हुए नहीं देख सकता’’

इसके बाद केस खत्म कर दिया गया.

फ़ोटो साभार-VIVIDHA

अदालत ने आरोपियों को बरी करते समय अन्य बेतुकी और अजीबोग़रीब दलीलें भी दीं थीं
जैसे:-
~60-70 साल के बुजुर्ग बलात्कार नहीं करते.
~ एक गाँव में रहने वाला चाचा अपने भतीजे के सामने दुष्कर्म नहीं कर सकता.
~ अगड़ी जाति का कोई पुरुष किसी पिछड़ी जाति की महिला का रेप नहीं कर सकता क्योंकि वह ‘अशुद्ध’ होती है.

स्थानीय विधायक ने आरोपियों के छूट जाने के बाद एक विजयी रैली आयोजित की| विधायक की पार्टी की महिला विंग ने भी रैली में भंवरी को झूठा करार देने के लिए भाग लिया.

इसके बाद एकबार फिर भंवरी देवी का मामला सुर्ख़ियों में आ गया. अदालत की पूर्वाग्रह वाली टिप्पणियों की देश और दुनियाभर में आलोचना हुई. जयपुर स्थित कई महिला संगठनों ने इसके विरुद्ध अपना विरोध जताया. महिला संगठनों के दबाव में राज्य सरकार को अदालत के फैसले के खिलाफ़ हाईकोर्ट में अपील करनी पड़ी. अदालत के इस फैसले के बाद देशभर में भंवरी के लिए न्याय के लिए आवाज उठने लगीं.

लेकिन तब से आजतक भंवरी को न्याय नहीं मिल पाया है. आज करीब 20 से अधिक वर्ष गुजर जाने के बाद भी इस मामलें में केवल एक बार सुनवाई हुई है. यह तब है जबकि सीबीआई द्वारा भंवरी के कपड़ों से पांच अलग अलग लोगों के सीमन( वीर्य) के पाए जाने की पुष्टि कर दी गई है.

चूँकि भंवरी के साथ दुष्कर्म तब हुआ जबकि वह राजस्थान सरकार की एक योजना में साथिन ( सहायिका ) के रूप में काम कर रही थी इसलिए नियोक्ता के रूप में राजस्थान सरकार की जिम्मेदारी बनती थी कि वह भंवरी देवी को न्याय दिलाए. लेकिन राजस्थान सरकार ने यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया कि भंवरी पर हमला उसके निजी खेत में हुआ है’’

इसके बाद जयपुर के कई महिला संगठन सामने आए. विशाखा नाम के एक महिला संगठन के नेतृत्व में चार महिला संगठनों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली गई. याचिका में महिलाओं के लिए कार्यस्थलों को सुरक्षित बनाने एवं महिलाओं की सुरक्षा के लिए नियोक्ता को जिम्मेदार बनाने की याचिका में मांग की गई.

अगस्त 1997 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पीआइएल पर सुनवाई की गई. सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फै़सले में कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा से सम्बंधित कुछ गाइडलाइन्स जारी की. जिन्हें आज ‘’विशाखा गाइडलाइन्स’’ के नाम से जाना जाता है.

भंवरी देवी केस ने महिलाओं के एक नए आन्दोलन को जन्म दिया. आजादी के दशकों बाद जिस लीगल सिस्टम की कमी थी उस ओर सरकार और सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचा. जिसका परिणाम यह हुआ कि 2013 में विशाखा गाइडलाइन्स को ही आधार बनाकर संसद ने 2013 में ‘’कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न अधिनियम’’ पारित किया.

आज जबकि पूरी दुनिया से होता हुआ METOO कैम्पेन भारत में अपनी दस्तक दे चुका है तो हर ओर कड़े कानूनों और हिदायतों की बात की जाने लगी है. इस बीच भंवरी देवी एवं उन तमाम महिला संगठनों के संघर्ष को याद किए जाने की जरूरत है. लेकिन भंवरी देवी के कालखंड और आज की वस्तुस्थिति में कोई बिल्कुल भी बदलाव नहीं आया है.

आज भी बालविवाह जारी हैं, आज भी दलित औरतों पर होने वाले दुष्कर्मों की घटनाएं जारी हैं. खु़द एनसीआरबी 2016 की रिपोर्ट के अनुसार दलितों पर होने वाले अत्याचारों में महिलाओं के साथ होने वाले दुष्कर्मों की संख्या ज़्यादा है. आज भी यौनशोषण का शिकार होने वाली महिलाओं को ही उल्टे आरोपों को झेलना पड़ता है उन्हें समाज में पूर्वाग्रह की नज़र से देखा जाने लगता है उन्हें ताहने दिए जाते हैं. आज भी देश के लगभग सभी पुलिस स्टेशन महिलाओं के साथ होने वाले यौन दुराचारों के मामलों में असंवेदनशील बने हुए हैं. आज भी अदालतें रेप पीड़ितों को न्याय देने में असफल हैं, एनसीआरबी की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार केवल 25 प्रतिशत मामलों में ही रेप के आरोपियों को सजा मिल पाती है.

अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो भंवरी देवी का केस इस देश की पूरी सामजिक-प्रशासनिक हक़ीक़त का आइना है. यही कारण है कि MEETOO के इस दौर में भंवरी देवी को याद किया जाना चाहिए और उन तमाम महिला संगठनों को भी याद करने की जरूरत है जिन्होनें भंवरी की लड़ाई में अपनी दम लगा दी थी.

(लेखक आईआईएमसी से हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई कर चुके हैं.)

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