कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

हे धर्मवीरों! आपकी मातृभाषाएं मर रही हैं, उन्हें बचा लो

आज एक पत्रकार को नहीं मालूम कि प्रेमचंद इस दुनिया में हैं भी या नहीं. इस काल को हिन्दी का सबसे बुरा युग समझना चाहिए.

हम एक भावना प्रधान देश के नागरिक हैं. हमारी भावनाएं हिन्दू-मुसलमान और मंदिर-मसजिद के नाम पर आहत होती हैं, लेकिन अगर उस भावना का एक छोटा सा हिस्सा भी हमने अपनी भाषाओं के विकास में लगाया होता तो आज हमारी मातृभाषाओं की दुर्गति नहीं होती. हिन्दी, उर्दू के साथ-साथ लगभग सभी भारतीय भाषाएं इस समय त्रासदी के दौर से गुजर रही हैं.

जमील गुलरेज़ ने भारतीय भाषाओं को बचाने की मुहिम शुरू की है. कारवां-ए-मोहब्बत से बातचीत में उन्होंने बताया- “एक बड़े मीडिया हाउस के पत्रकार को प्रेमचंद पर आयोजित एक कार्यक्रम के लिए बुलाया तो उन्होंने सवाल पूछा कि क्या इस प्रोग्राम में प्रेमचंद जी भी आ रहे हैं.” यही हमारे समाज और उसके भावुकता के खोखलेपन की पहचान है. यहां एक पत्रकार को भी नहीं मालूम कि प्रेमचंद इस दुनिया में हैं भी या नहीं.

सिर्फ हिन्दी या उर्दू ही नहीं हमारी सभी भाषाएं उपेक्षा का शिकार हुई हैं. जमील गुलरेज़ बताते हैं कि हम अपने बच्चों को मज़हबी तालीम देने पर ज्यादा ध्यान देते हैं. इस पर सुधार नहीं हुआ तो कुछ दिनों में हमारी मातृभाषाएं मर जाएंगी. लेखक और अभिनेता नसीरुद्दीन शाह बताते हैं कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह विश्वास करना भी मुश्किल हो जाएगा कि किताब नाम की भी कोई चीज़ हुआ करती थी. किताब भी अतीत बन कर रह जाएंगे. ये एक सभ्य और जागरूक समाज के लिए घातक है.

बेमतलब की सांप्रदायिक गतिविधियों में हम इतने ज्यादा लीन हो गए हैं कि हमें इस बात की फिक्र ही नहीं कि हमारी मां और दादी द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषाएं मौत के कग़ार पर खड़ी हैं. उन्हें बचाइए. धर्म के नाम पर हो रही राजनीति के शिकार बनकर ना हम अपने समाज का भला कर सकेंगे ना परिवार का. इसलिए मज़हबी तालीम या सांप्रदायिक ज्ञान के बजाय हमें अगली पीढ़ी को भाषायी ज्ञान से अवगत कराना होगा. जमील गुलरेज़ की तरह हमारी और आपकी भी जिम्मेदारी है कि अपने स्तर से अपनी मातृभाषा को बचाने का प्रयास करें. इसके लिए हमें संप्रदाय के नाम पर चल रहे फ़र्जीवाड़े की राजनीति से दूर होना होगा.

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