कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि खतरे का सामना कर रही है: फारूक अब्दुल्ला

"वक्त की दरकार है कि धार्मिक स्वतंत्रता और देश में कानून के शासन की हिफाजत के लिए सामूहिक कोशिश की जाए."

नेशनल कांफ्रेंस (नेकां) अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने बुधवार को कहा कि साम्प्रदायिकता के बढ़ने से देश की धर्मनिरपेक्ष छवि खतरे का सामना कर रही है।

हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में श्रीनगर सीट से विजयी अब्दुल्ला ने कहा कि वक्त की दरकार है कि धार्मिक स्वतंत्रता और देश में कानून के शासन की हिफाजत के लिए सामूहिक कोशिश की जाए।

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ने यहां विभिन्न प्रतिनिधिमंडलों से बातचीत में कहा कि उत्तर भारत में विभिन्न स्थानों पर मुसलमानों को निशाना बना कर किए गए हमले दुखद हैं। क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने इसी भारत की कल्पना की थी? केंद्र सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती इन घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकना है।

उन्होंने कहा कि भारत में बढ़ती साम्पद्रायिकता का मुकाबला देश के सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को करना होगा।

उन्होंने कहा कि यदि साम्प्रदायिकता के इस फासीवादी रूख को बेलगाम बढ़ने दिया गया तो यह हमारे समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने बाने को नुकसान पहुंचाएगा।

अब्दुल्ला ने कहा कि साम्प्रदायिक नफरत हमारे समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। नयी सरकार को इस बारे में फैसला करना है कि क्या वह साम्प्रदायिकता को बेरोकटोक बढ़ने देना चाहती है ? विकास का विचार तब तक असंभव है जब तक कि 25 करोड़ मुसलमानों को इसमें (विकास में) सहभागी नहीं बनाया जाता।

उन्होंने कहा कि मुसलमानों को साथ लिए बगैर सरकार देश को आगे ले जाने की नहीं सोच सकती।

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