कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

इधर इंदिरा जयसिंग ने न्यायाधीश के ख़िलाफ़ उठाई आवाज़, उधर उनके ख़िलाफ़ हुए केस दर्ज

उच्चतम न्यायालय में जयसिंग के ख़िलाफ़ याचिका कोर्ट के ख़ुद के रूल्ज़ के ख़िलाफ़ दर्ज हुई है.

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंग मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न मामले में क्लीन चिट दिए जाने की मुखर विरोधी रही हैं. अब सुप्रीम कोर्ट में एक आपराधिक मामले में उन्हें प्रतिवादी बना दिया गया है. और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की तैयारी की गई है.

इसके साथ ही उनके पति और वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर को भी आपराधिक याचिका में फंसाया गया है. ग्रोवर ‘लॉयर्स कलेक्टिव’ एनजीओ के निदेशक हैं, जो मानवाधिकार मुद्दे से जुड़े कार्यों के क्षेत्र में काम करती है. एनजीओ पर आरोप लगे हैं कि इसने विदेशी चंदे को ग़लत उपयोग किया है. याचिका के बाद नोटिस जारी किया गया है.

आज यानी बुधवार को एनजीओ ‘लॉयर्स कलेक्टिव’ ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर उन सारे आरोपों को खारिज किया है. उक्त एनजीओ ने अपने ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि हमें 2016 के बाद से किसी प्रकार की कोई फंडिंग नहीं मिली थी क्योंकि लॉयर्स कलेक्टिव का विदेशी अनुदान पंजीकरण (एफसीआरए) गृह मंत्रालय ने रद्द कर दिया था.

जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि इंदिरा जयसिंग सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ़ यौन उत्पीड़न के मामले में इन हाउस इंक्वायरी कमेटी की जांच के तरीकों की आलोचना की थी.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की इस कमेटी ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर क्लीन चिट दे दी है. हालांकि जांच के सुनवाई के दौरान महिला कर्मचारी को अपना रखना वकील रखने की भी इजाजत नहीं दी गई थी. शीर्ष अदालत ने मुख्य न्यायाधीश को क्लीन चिट देते हुए कहा था कि इन्दिरा जयसिंह बनाम शीर्ष अदालत और अन्य के मामले में यह व्यवस्था दी गयी थी कि आंतरिक प्रक्रिया के रूप में गठित समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जायेगी.

फिर इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता जयसिंग ने ट्वीट किया था कि ” यह एक घोटाला है. इंदिरा जयसिंग बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया भी कर्नाटक के एक सिटिंग हाई कोर्ट द्वारा यौन उत्पीड़न का मामला था. यह एक प्री-आरटीआई है. कानून में खराबी है. सार्वजनिक हित में जांच समिति के निष्कर्षों का खुलासा किया जाना चाहिए.”

आज जारी किए गए बयान में आरोप लगाया कि यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देशों का उल्लंघन करती है, जिसमें सूचीबद्ध किए जाने संबंधी नियम दिए गए हैं. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के मुताबिक यह याचिका 6 मई को शाम 3:19 बजे डाली गई. फिर इसमें कई आपत्तियां थीं, जिन्हें 7 मई को हटा लिया गया. उनका आरोप है कि हालांकि यह मामला कोर्ट में 7 मई को मौखिक रूप में पेश नहीं हुआ, लेकिन 8 मई को कोर्ट नंबर 1 में इसे सूचीबद्ध किया गया था. यह सूचीबद्ध करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन था.

आगे कहा गया है, “हमारे संज्ञान में यह लाया गया है कि आज की अदालती कार्रवाई के दौरान हालांकि याचिकाकर्ता के वकील ने किसी तरह के अंतरिम आदेश को मौखिक रूप में नहीं मांगा था, फिर कोर्ट ने यह आदेश पारित किया है कि याचिका का लंबित होना इस मामले में किसी भी तरह से सरकारी एजेंसियों के लिए बाधा नहीं बनेगी.

You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+