कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

बरेली में मलेरिया से मौत का तांडव जारी, योगी सरकार डाल रही है पर्दा

बरेली जिले में आठ हजार की आबादी वाले बेहेटा गांव में अब तक मलेरिया से 9 लोगों की जान जा चुकी है।

इस महीने की शुरुआत से ही बीमारी के चलते मौत का तांडव जो बरेली के लोगों ने देखा है, उसपर ना सरकार ने ध्यान दिया ना ही मीडिया ने। महीने भर से बरेली, बदायूं, सहित कई जिले मलेरिया की चपेट में हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के आधिकारिक आकड़ों की मानें तो इस इलाके में मलेरिया ने 84 लोगों की जान ले ली है।

अभी हाल ही में वहां से लौटे वरिष्ठ पत्रकार विनय सुल्तान की रिपोर्ट के मुताबिक़ सिर्फ बरेली में 13 से 24 सितंबर के बीच सरकारी जांच में मलेरिया के 17,110 रोगी पाए गए। जिनमें 6071 लोग जानलेवा मलेरिया (पीएफ) से पीड़ित थे। सरकारी आंकड़ों की मानें तो 25 सितंबर तक इस बीमारी के चलते 25 लोगों की जान जा चुकी है। इस जिले के चार ब्लॉक मझगवां, रामपुर, फरीदपुर और भमौरा में भी बीमारी भयंकर रूप से फैली हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार वहां पड़ने वाले एक गांव बेहेटा बुजुर्ग में बीमारी का सबसे अधिक खौफ है। आठ हजार की आबादी वाले इस गांव में अब तक इस बुखार से मरने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं। यहां सरकार ने सिर्फ 4 लोगों को गिना है, लेकिन गांव के मुखिया भगवान दास ने बताया कि इस बीमारी के चलते 9 लोगों की जान जा चुकी है।

सरकार का कहना है कि इस गांव में मलेरिया फेल्सीफेरम की वजह से सिर्फ 4 मौतें हुई हैं, लेकिन सरकारी आंकडें के उल्ट गांव के लोगों का कहना है कि अबतक 40 से ज्यादा लोग मरे हैं। इसी गांव में कई ऐसे परिवार भी हैं, जिनमें इस बीमारी के कारण तीन मौतें भी हुई हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक़ सरकार मलेरिया फेल्सीफेरम के चलते 25 जनों की मौत होने की बात कह रही है। सरकार द्वारा दिए गए इस आंकडें में सिर्फ एक व्यक्ति की मौत जिला अस्पताल में हुई है। बाकी बचे लोगों की मौत घर या निजी अस्पतालों में हुई है। मेडिकल विभाग की जांच में 21 ऐसे लोग भी पाए गए हैं, जिनकी मौत की वजह मलेरिया फेल्सीफेरम की बजाए डेंगू या दूसरे किस्म के बुखार हैं। इसे भी जोड़ें तो सरकारी दावों में यह आंकड़ा 46 का हो जाता है।

बरेली में एक निजी क्लिनिक चलाने वाले एक डॉक्टर ने विनय सुल्तान को बताया कि पिछले कई सालों से यहाँ इस तरह की बिमारियां फ़ैल जाती हैं। पिछले तीन सालों से डेंगू के कई मामले सामने आए थे। इस बार मलेरिया फेल्सीफेरम के मामले सामने आ रहे हैं। जब इस तरह की बीमारी जब ज्यादा फ़ैल जाती हैं, तो प्रशासन का दबाव बढ़ जाता है।

इससे पहले डेंगू के मामले में भी ऐसा ही हुआ था। सरकार शुरुआत में मानने को तैयार नहीं थी कि यह डेंगू है। उस समय निजी अस्पतालों ने सरकार के दबाव से बचने के लिए  डेंगू को ‘डेंगू लाइक फीवर’ नाम दे दिया था। ऐसा इस साल भी दोहराया जा रहा है। मलेरिया (पीएफ) ज्यादा खतरनाक है और लापरवाही का मौका नहीं देता, इसीलिए झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे बैठे ग्रामीण लोग सबसे ज्यादा इसका शिकार बन रहे हैं। मौत का सही आंकड़ा सरकारी दावों से बहुत बड़ा है।

बरेली में सरकारी दावा है कि 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं। इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक के मायाजाल के चलते यहां इलाज़ कराने आने वाले मरीजों रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है। ऐसे में महज दो दर्जन लोगों की मौत के सरकारी दावों पर सवाल खड़े होते हैं।

रिपोर्ट के आखिर में विनय सुल्तान ने सरकार की नाकामयाबियों पर चुटकी लेते हुए लिखा है,

“इस बार बरेली में अगस्त के महीने में औसत से ढाई गुना ज्यादा बारिश हुई. मच्छरों के पनपने के लिहाज से यह उपजाऊ स्थिति है. लेकिन क्या सिर्फ बरसात को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?”

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