कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

शहरों पर कर्फ्यू थोपता है युद्ध, हजारों परिवारों के जीवन पर होता है इसका असर, शहीद की बेटी ने बयां किया दर्द

दीक्षा द्विवेदी के पिता मेजर सीबी द्विवेदी कारगिल के जंग में शहीद हो गए थे.

भारत-पाकिस्तान सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच कुछ लोग शांति बनाए रखने और युद्ध न करने की बात कर रहे हैं. इसी श्रेणी में कारगिल के शहीद मेजर सीबी द्विवेदी की बेटी दीक्षा द्विवेदी ने बताया है कि जब एक सैनिक युद्ध के मैदान पर लड़ता है, तो उसका परिवार क्या महसूस करता है.

द क्विंट से बात करते हुए दीक्षा द्विवेदी ने उस दर्द और पीड़ा को बयां किया, जिससे हर शहीद सैनिक के परिवार को गुजरना पड़ता है.

दीक्षा ने कहा कि ये बात मैं जितनी बार कहूं कम है कि जब सैनिक युद्ध के मैदान पर लड़ता है तो उसका परिवार क्या महसूस करता है. यह सिर्फ शायद हम जैसे लोग समझ सकते हैं.

उन्होंने कहा कि अपने पिता को खोना जंग नहीं थी, लेकिन उनके बिना जीवन फिर से शुरू करना एक जंग और संघर्ष था. उन्होंने कहा कि मैं, मेरी बहन और मेरा परिवार इस स्थिति के इतने करीब हैं कि जब भी जंग जैसा कुछ होता है तो हम यह सोचकर रोते हैं कि एक और परिवार को हमारी जैसी स्थिति से गुजरना पड़ेगा, जिससे हम 1999 में गुजरे थे.

दीक्षा ने आगे कहा कि अपमान बंद करें. शांति, मानवता और सहानुभूति को बढ़ावा दें. जब आप युद्ध के बारे में बात कर रहे हों तो सैनिकों के साथ सहानुभूति रखें. आपने खून से लथपथ विंग कमांडर अभिनंदन के विडियो को साझा किया. आपको क्या लगता है, जब वे वापस आएंगे तो क्या महसूस करेंगे. इसे रोक दो.

दीक्षा आगे कहती है कि ऐसा कुछ भी करने से पहले सोचें. युद्ध का वास्तविक मतलब अपनी शांति को छोड़ना, जिसका आप हर रोज़ आनंद ले रहे हैं. आप इस शांति को युद्ध के लिए खतरे में डाल रहे हो. जंग में कुछ भी अच्छा नहीं है.  युद्ध का असली परिणाम होगा कि हम एक ऐसे शहर में तब्दिल हो जाएंगे, जहां हर समय कर्फ्यू लगा रहता है. हम पढ़ाई नहीं कर पाएंगे औप शांति के साथ सामान्य जीवन प्रभावित रहेगा.

उन्होंने अंत में कहा कि मुझे गर्व है कि मैं शहीद मेजर सीबी द्विवेदी की बेटी हूं. जिसने अपने देश के लिए लड़ते हुए अपनी जान दे दी. ज्ञात हो कि मेजर सीबी द्विवेदी साल 1981 में सेना में भर्ती हुए थे. उन्हें तोपखाने की रेजिमेंट में गनर के रूप में नियुक्त किया गया था.

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