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कश्मीरियत ज़िंदा है: 29 साल बाद अपने सरज़मीं पर वापस लौटा एक कश्मीरी पंडित, मुस्लिम व्यापारियों ने किया भव्य स्वागत

रोशन लाल मावा को साल 1990 में कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने निशाना बनाया था. उस घटना के बाद वह कश्मीर घाटी छोड़कर चले गए थे.

जब भी कश्मीर की बात आती है तो कश्मीरी पंडितों पर सियासत शुरू हो जाती है. कश्मीरियत पर सवाल खड़े किए जाते हैं. लेकिन हर बार घाटी में हिंदू-मुस्लिम दोस्ती की कुछ ऐसी कहानियां जन्म लेती है जो कश्मीरियत को और ठोस बनाती है. एक ऐसी ही कहानी है रोशन लाल मावा की.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के अनुसार 74 साल के रोशन लाल मावा 29 साल बाद बुधवार को अपने सरज़मीं कश्मीर लौट आए हैं. मावा वहीं कश्मीरी पंडित हैं जिन्हें साल 1990 में कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने निशाना बनाया था. मावा में इसमें गंभीर रूप से जख़्मी हो गए थे. उस घटना के बाद वह कश्मीर घाटी छोड़कर चले गए.

लेकिन एक बार फिर कई दशकों बाद मावा लौटे. उसी उम्मीद और प्यार के साथ. श्रीनगर में शुरू किए गए बिजनेस को स्थापित करने में उन्हें मुसलमान भाइयों का बखूबी साथ मिल रहा है.

अपने सरज़मीं पर वापस लौटे मावा ने कहते हैं, ‘कश्मीर जैसी कोई ज़गह नहीं है.’ बुधवार को वाणिज्यिक केंद्र ज़ाइनाकदल में कश्मीरी मुस्लिम व्यापारियों ने मावा का गर्मज़ोशी से स्वागत करते हुए उन्हें ‘दस्ताबंदी’ से सम्मानित किया.

इस दौरान मावा ने कहा, “एक युवक ने पिस्टल से मुझे चार गोलियां दागी. एक गोली मेरे सिर पर भी लगी. यह हमला गडा कोचा के इसी दुकान पर हुआ था. इसके बाद मेरा परिवार मुझे इलाज़ के लिए दिल्ली लेकर गया था और हम वहीं सेटल हो गये. पुरानी दिल्ली के खारी बावली में हमने ड्राय फुट्रस का बिजनेस शुरू किया.”

उन्होंने कहा, “दिल्ली में मेरा अच्छा बिजनेस है, घर है. इसके बावजूद भी अपने लोगों के बीच आने की इच्छा ने मुझे 29 सालों में गलियों में बिताने को मजबूर कर दिया.”

मावा ने आगे कहा, “मैं बीते वक़्त की बात भुल कर अपने सरज़मीं पर फ़िर से अपना बिजनेस शुरुआत करने आया हूं. यहां के मुस्लिम व्यापारियों ने मेरा भव्य स्वागत किया है. यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है. मैने पूरे देश की यात्रा की है लेकिन कश्मीर जैसी कोई ज़गह नहीं है.”

मावा चाहते हैं कि सरकार सभी कश्मीरी पंड़ितों को यहां वापस लौटने के लिए मौकों की तलाश करनी चाहिए. मावा ने कहा, “कश्मीरियत ज़िदा है. कश्मीरी मुस्लिमों और पंडितों में भाईचारा अब भी बरकरार है.”

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