कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अपनी मांगों को लेकर पदयात्रा करने वाले किसान रोक दिए गए दिल्ली-यूपी सीमा पर

किसानों को रोकने के लिए भारी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है।

“यदि हम अपनी समस्याओं के बारे में सरकार को नहीं बताएंगे, तो किसे बताएंगे? क्या हमें पाकिस्तान या बांग्लादेश चले जाना चाहिए?”

यह सवाल पूछा है भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने।

ग़ौरतलब है कि 23 सितंबर से 2 अक्टूबर तक हरिद्वार से नई दिल्ली के किसान घाट तक चलने वाली “किसान क्रांति पदयात्रा” को दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर रोक दिया गया है। सोमवार को पूर्वी दिल्ली में एक हफ़्ते के लिए धारा 144 लगा दी गई है। किसानों को दिल्ली में प्रवेश करने की इजाज़त नहीं दी गई। भारी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है।  हालांकि, नरेश टिकैत का कहना है कि उन्होंने अनुशासित तरीक़े से अपनी मांगों को लेकर पदयात्रा निकाली है।

सोमवार 1 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से वार्ता विफ़ल होने के बाद किसान दिल्ली की ओर कूच करने लगे थे।

इस रैली में क़रीब तीस हज़ार किसान शामिल हैं जिनमें यूपी के साथ-साथ हरियाणा के किसान भी शामिल हैं।

किसानों ने पूरा क़र्ज़ माफ़ करने, स्वामिनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने, बिजली की बढ़ी कीमतें वापिस लेने की मांगों के साथ ही 10 साल पुराने डीज़ल वाहनों पर पाबंदी लगाने जैसे तमाम किसान विरोधी फ़रमान वापस लेने की मांग करते हुए यह पदयात्रा निकाली है।

जनसत्ता की एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के रहने वाले रमेश यादव, जो हरिद्वार में शुरूआत के समय से ही जुड़े हुए हैं, ने कहा है, “किसानों के बीच आक्रोश है। आख़िर वे यूं ही इतने दिनों तक पदयात्रा क्यों करेंगे?”

वहीं, हरियाणा के 61 वर्षीय सतपाल दिलोवली बताते हैं, “हम प्रतिदिन क़रीब 25 किलोमीटर की पदयात्रा कर रहे हैं। ट्रेक्टर के नीचे, फ़ुटपाथो पर और खेतों में सो रहे हैं। पहले तीन दिन हमने भारी बारिश का सामना किया और उसके बाद तीखी धूप का।”

ज्ञात हो कि इसी साल मार्च के महीने में महाराष्ट्र के क़रीब 35 हज़ार किसानों ने भी अपनी मांगों को लेकर पदयात्रा निकाली थी।

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