कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

“या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा या आसमान में धान जमेगा”: मजदूर दिवस पर पढ़िए श्रमिकों के संघर्ष को बयां करती कुछ कविताएं

मैं किसान हूं, आसमान में धान बो रहा हूं. कुछ लोग कह रहे हैं कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता, मैं कहता हूं पगले घघले! अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है, तो आसमान में धान भी जम सकता है

एक मई को दुनिया भर में मजदूर दिवस के तौर पर याद किया जाता है. अपना हक पाने के लिए मजदूरों ने लंबा संघर्ष किया है. सन् 1889 में 1 मई को अंतरराष्ट्रीय छुट्टी घोषित किया गया.

1923 में भारत में पहली बार मद्रास में मई दिवस मनाया गया. इस विशेष दिन पर हमें कुछ कवियों-चिंतकों की कविताओं और पंक्तियों को पढ़कर  मजदूरों के संघर्ष को याद रखने की जरूरत है. ऐसी ही कुछ कविताओं को नीचे पढ़ा जा सकता है:

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने अपनी कविता में लिखा कि हम मेहनतकश लोग खेत और एक देश नहीं बल्कि पूरी दुनिया को मांगेंगे

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,

इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे

यां पर्वत-पर्वत हीरे हैं, यां सागर-सागर मोती हैं

ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे

वो सेठ व्यापारी रजवाड़े, दस लाख तो हम हैं दस करोड

ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा मांगेंगे

जो खून बहे जो बाग उजड़े जो गीत दिलों में कत्ल हुए,

हर कतरे का हर गुंचे का, हर गीत का बदला मांगेंगे

जब सब सीधा हो जाएगा, जब सब झगडे मिट जाएंगे,

हम मेहनत से उपजाएंगे, बस बांट बराबर खाएंगे

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे, इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे

अदम गोंडवी ने रोटी की क़ीमत का महत्व बताते हुए लिखा:

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है

उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का

उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले

हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महंगी है ये वो औरत बताएगी

जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है.

आसमान में धान जमाने की जीवटता दिखाते हुए कवि रमाशंकर यादव “विद्रोही” ने लिखा:

मैं किसान हूं

आसमान में धान बो रहा हूं

कुछ लोग कह रहे हैं

कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता

मैं कहता हूं पगले घघले!

अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है

तो आसमान में धान भी जम सकता है

और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा

या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा

या आसमान में धान जमेगा.

हिन्दी के प्रगतिवादी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने लिखा कि हमारे ही ह्रदय का गुप्त स्वर्णाक्षर प्रकट होकर विकट हो जाएगा. मुक्तिबोध की यह कविता बताती है कि संघर्ष की चिंगारी हमारे भीतर से ही निकलेगी:

हमारी हार का बदला चुकाने आएगा

संकल्पधर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर

हमारे ही ह्रदय का गुप्त स्वर्णाक्षर

प्रकट होकर विकट हो जाएगा.

प्रगतिवादी कवि केदारनाथ अग्रवाल ने मजदूरों के संघर्ष और जीवटता को दिखाते हुए यह तस्वीर पेश की:

मैंने उसको

जब जब देखा

लोहा देखा

लोहे जैसा

जलते देखा

गलते देखा

मैंने उसको

गोली जैसा चलते देखा

छायावदी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने श्रम करती हुई महिला की जो तस्वीर पेश की, वो आज भी श्रमिकों के संघर्ष को बयां करती है. मर्यादा के बंधनों में बंधी भारतीय श्रमिक स्त्री को निराला ने देखा. वह महिला उस स्थिति में थी जैसे मार खाने के बाद रो भी नहीं पाई हो.

वह तोड़ती पत्थर;

देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर..

कोई न छायादार

पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;

श्याम तन, भर बंधा यौवन,

नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,

गुरु हथौड़ा हाथ,

करती बार-बार प्रहार…

देखते देखा मुझे तो एक बार

उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;

देखकर कोई नहीं,

देखा मुझे उस दृष्टि से

जो मार खा रोई नहीं.

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