कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

सो जाते हैं फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर, मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खातेः क्यों मनाया जाता है मजदूर दिवस, जानें महत्वपूर्ण बातें

भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत 1 मई 1923 को भारतीय मजदूर किसान पार्टी द्वारा चेन्नई में की गई थी.

1 मई को दुनियाभर में मजदूर दिवस (लेबर डे) के रूप में मनाया जाता है. इसकी शुरुआत आज से सालों पहले सन् 1886 में अमेरिका में लाखों मजदूरों ने काम के घंटे तय करने के हड़ताल के बाद हुई थी. इस हड़ताल में 11,000 फैक्टरियों के कम से कम 3,80,000 मजदूर शामिल हुए और इसके बाद अनिश्चित काम के घंटों को 8 घंटों में तब्दील किया गया.

भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत

भारत समेत विश्व के तकरीबन 80 देशों में लेबर डे मनाया जाता है. भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत 1 मई 1923 को भारतीय मजदूर किसान पार्टी द्वारा चेन्नई में की गई थी. भारतीय मज़दूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार का कहना था कि दुनियाभर के मजदूर इस दिन को मजदूर दिवस के तौर पर मनाते हैं, तो भारत में भी इसको मान्यता दी जानी चाहिए. इसके बाद कई जनसभाएं व जुलूस आयोजित किए गए फिर 1 मई को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मान्यता मिली ताकि मजदूर उत्पीड़न, न्यूनतम मजदूरी कानून और प्रवासी मजदूरों को लेकर जागरुकता फैलाई जा सके.

श्रमिकों को लेकर बाबा साहेब के विचार

बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर का कहना था कि किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है. उद्योगपति, मालिक या प्रबंधक समझने की बजाय अपने-आप को ट्रस्टी समझने लगे. लोकतंत्रिक ढांचों में तो सरकार भी लोगों की तरफ़ से चुनी जाती है, जो राजनीतिक लोगों को अपने देश की बागडोर ट्रस्टी के रूप में सौंपते हैं. वह प्रबंध चलाने के लिए मज़दूरों, कामगारों और किसानों की बेहतरी, भलाई और विकास, अमन और कानूनी व्यवस्था बना रखने के लिए वचनबद्ध होते हैं.

सरकार की जिम्मेदारी औद्योगिक शान्ति, उद्योगपतियों और मज़दूरों के बीच सुखदायक, शांतमय और पारिवारिक संबंध कायम करना, झगड़े और टकराव की सूरत में उनका समझौता और सुलह करवाने का प्रबंध करना है. इसके साथ ही न्याय के सिद्धांत अनुसार इंसाफ़ प्रदान करना और उन की बेहतरी के लिए समय-समय पर कानूनी और विवरण प्रणाली निर्धारित करना है.

श्रम कानून

यह कानून उद्योग और श्रम संबंधी विधान के अंतर्गत कारखाने तथा श्रमिकों के काम की दशा में काम करता है. कारखानों के मलिकों और श्रमिकों के दायित्व का उल्लेख इसमें है. सामाजिक सुरक्षा के अंतर्गत वे सारे अधिनियम आते हैं जो श्रमिकों के लिए विभिन्न सामाजिक लाभ-बिमारी, रोज़गार, प्रसूति, प्रॉविडेण्ट फण्ड, न्यूनतम मजदूरी इत्यादि व्यवस्था करते हैं. इस कानून के अंतर्गत कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948, कर्मचारी प्रॉविडेण्ट फण्ड अधिनियम 1952, न्यूनतम भृत्ति अधिनियम 1948, मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 इत्यादि शामिल है.

आधुनिक श्रम विधान के कुछ महत्वपूर्ण विषय- मजदूरी की मात्रा, मजदूरी का भुगतान, मजदूरी से कटौतियां, कार्य के घंटे, विश्राम अंतराल, साप्ताहिक अवकाश, सवेतन छुट्टी, कार्य की भौतिक दशायें, श्रम संघ, सामूहिक सौदेबाजी, हड़ताल, स्थायी आदेश, नियोजन की शर्ते, बोनस, कर्मकार क्षतिपूर्ति, प्रसूति हितलाभ एवं कल्याण निधि आदि है.

भारत के साहित्यकार-कवि-सामाजिक चिंतकों ने मजदूरों के हक़ की आवाज़ उठाई है. मजदूरों की चिंता बयां करने वाली कुछ कविताएं नीचे की पंक्तियों में दी गई हैं.

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है

उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का

उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले

हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महंगी है ये वो औरत बताएगी

जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है.

(अदम गोंडवी)

सो जाते हैं फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर

मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते

(मुनव्वर राना)

पेड़ के नीचे जरा सी छांव जो उसको मिली

सो गया मजदूर तन पर बोरिया ओढ़े हुए

(शारिब मौरान्वी)

बोझ उठाना शौक़ कहां है मजबूरी का सौदा है

रहते रहते स्टेशन पर लोग क़ुली हो जाते हैं

(मुनव्वर राना)

मैं किसान हूँ
आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता
मैं कहता हूँ पगले!
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा।

(रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’)

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,

इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे

यां पर्वत-पर्वत हीरे हैं, यां सागर-सागर मोती हैं

ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे

वो सेठ व्यापारी रजवाड़े, दस लाख तो हम हैं दस करोड

ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा मांगेंगे

जो खून बहे जो बाग उजड़े जो गीत दिलों में कत्ल हुए,

हर कतरे का हर गुंचे का, हर गीत का बदला मांगेंगे

जब सब सीधा हो जाएगा, जब सब झगडे मिट जाएंगे,

हम मेहनत से उपजाएंगे, बस बांट बराबर खाएंगे

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,

इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे

(फ़ैज अहमद फ़ैज)

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