कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

शर्मनाक: भोजन के अभाव में झारखंड के एक आदिवासी वृद्ध की मौत

चुनावी माहौल के कारण कोई काम नहीं मिल रहा था, जिसके कारण परिवार वालों को खाने के लाले पड़े थे और भूख के कारण उसकी मौत हो गयी.

झारखंड के जामा प्रखंड में स्थित ऊपर रंगनी गांव में 50 वर्षीय मोटका मांझी की मौत भूख के कारण हो गई. वे पहाड़िया जनजाति से ताल्लुक रखते थे. उनकी मौत बीते हफ़्ते बुधवार को हुई थी, शनिवार, 25 मई को उनका अंतिम संस्कार किया गया

दैनिक जागरण की ख़बर के अनुसार मृतक के परिजनों का आरोप है कि मोटका मांझी की मौत भूख की वजह से हुई है. चुनावी माहौल के कारण कोई काम नहीं मिल रहा था, जिसके कारण परिवार वालों को खाने के लाले पड़े थे और भूख के कारण उसकी मौत हो गयी.

मृतक की पत्नी अलावती अपने तीन बच्चे सुरेश मांझी, अनिल मांझी और सुनील मांझी के साथ खाने के लिए अनाज मिलने का इंतजार कर रही है. इस परिवार के किसी भी सदस्य को सरकारी योजना का कोई लाभ नहीं मिला है.

अलावती देवी और उनके बच्चों ने दैनिक जागरण को बताया कि उनके परिवार को राशन कार्ड, जॉब कार्ड एवं प्रधान मंत्री आवास योजना की भी स्वीकृति नहीं मिली है.”

तीनों बेटे मिट्टी और ताड़ के पत्तों से घर बनाकर अपना जीवन काट रहे हैं. दैनिक जागरण के मुताबिक स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि बीते 15 दिनों से मोटका मांझी का परिवार ताड़ का फल खाकर जी रहा था. पहले ईंट-भट्ठा में मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण होता था, लेकिन, चुनाव के दौरान आचार संहिता लगने के कारण परिवार की माली हालत ख़राब हो गयी. फिलहाल इस परिवार के पास खाने का एक दाना भी नहीं है.

इस मामले में बीडीओ का कहना है कि मृतक का ससुराल रामगढ़ में है और वह परिवार के साथ वहीं रहता है. वोट देने के लिए आया था.भूख से मरने का कोई सवाल ही नहीं उठता है. उसके पास गुलाबी कार्ड था, जिसमें परिवार के हर सदस्य को पांच किलो अनाज दिया जाता है. डाकिया योजना के तहत कार्ड नहीं बना था. मौत की वजह कुछ और हो सकती है.”

बीडीओ का कहना है, “परिवारवालों को मौत के दिन ही घटना की जानकारी देनी चाहिए थी. लेकिन, अब सामने आकर भूख से मरने का आरोप लगा रहे हैं. दाह संस्कार कर देने के बाद मौत का कारण भी पता नहीं चलेगा. परिवार की स्थिति देखते हुए आपदा राहत के तहत एक बोरा अनाज दिया गया है. और जो भी संभव होगा, मदद की जाएगी.”

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