कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

बढ़ रही है बिहार में लालू की शैली में राजनीतिक व्यंग्य बाण की मांग

नून रोटी खाएंगें, मोदी से टकराएंगें. ठीक है. जैसे अनेक गीत बिहार में बन रहे हैं प्रतिरोध के स्वर

लालू प्रसाद यादव भारत की राजनीति में किसी पहचान के मोहताज नहीं है. सामाजिक न्याय के अगुआ नेताओं में लालू प्रसाद की राजनीति का विशिष्ट स्थान है. छात्र राजनीति के धुरंधर लालू जहां आपातकाल में जयप्रकाश के साथ डटकर रहे, वहीं मंडल आंदोलन के आवेग में वह बिहार में हो रहे सामाजिक पुर्नजागरण आंदोलन में अग्रणी भूमिका में थे. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बिहार के अतिपिछड़ों, अकलियतों और अल्पसंख्यकों को सशक्तिकरण का एहसास कराने वाले लालू की आलोचनाएं कम हैं. लालू-राबड़ी शासनकाल की क्रूरतम आलोचनाएं बिहार में कानून व्यवस्था को लेेकर हुई. राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों की गुंडागर्दी सहित शहाबुद्दीन और साधु यादव जैसों का तांडव भी सत्ता की शह पर ही हुआ करता था. हालांकि, इसका भारी खामियाज़ा भी उन्हें भुगतना पड़ा. वर्ष 2003 में जनता दल (यूनाइटेड) का गठन हुआ और वर्ष 2005 में नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री बने. लालू-राबड़ी के दौर में गैर-यादव ओबीसी जातियों ने भी खुद को ठगा महसूस किया और नीतीश के साथ चली गईं. 2015 बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जदयू और राजद साथ जरूर आए लेकिन लालू-राबड़ी के कार्यकाल से चस्पां ‘जंगलराज’ नहीं छूट सका.

हालांकि सामान्यत: मीडिया का रवैया लालू के खिलाफ ही रहा है. जंगलराज जैसे मुहावरे मीडिया की ही देन हैं. चूंकि मीडिया की सरंचना ब्राह्मणवादी रही है, वह खुद भी लालू की सत्ता समाप्त करने में उनके विपक्षियों के संग एक पार्टी बनता चला गया. महागठबंधन से अलग होकर नीतीश जब फिर से एनडीए में शामिल हो गए, फिर भी मीडिया और खासकर बिहार का स्थानीय मीडिया अवसारवादी राजनीति पर तीक्ष्ण सवाल करने से कतराता रहा. स्थानीय मीडिया के वरिष्ठ पदों पर पदस्थ कर्मचारी ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में बताते हैं कि बिहार सरकार की आलोचना लिखने पर अखबार को विज्ञापन गंवाने पड़ते हैं और, वे अखबार के व्यापारिक हितों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते.

जनता भले मीडिया स्वामित्व की बारीकियों को न समझती हो लेकिन वे कुछ अखबारों और चैनलों को चिन्हित कर चुके हैं जिनका झुकाव पार्टी विशेष की तरफ है. मुझे इस बात का एहसास बिहार की राजधानी पटना से गया जाने के क्रम में हुआ.

उपेन्द्र यादव अपने तीन सहयोगियों के साथ पटना से गया जा रहे थे. सफर में पेट्रोल और डीजल के दामों में हो रही वृद्धि पर बातचीत हो ही रही थी कि उपेन्द्र ने अपने सहयोगियों को अपने साले द्वारा भेजा गया व्हाट्सएप ऑडियो सुनाया. मैं उस वीडियो को यहां ट्रांसक्राइब कर रहा हूं:

लालू- हैल्लो, जेटली जी बोल रहे हैं?

जेटली- हैल्लो, हू इज़ स्पीकिंग देयर?

लालू- इट्स लालू हियर.

जेटली- अच्छा, अच्छा, लालू जी नमस्कार!

लालू- नमस्कार, नमस्कार.

जेटली- और, आपकी तबीयत कैसी है?

लालू– अरे क्या रहेगी हमारी तबीयत. हमारी तबीयत तो वैसी ही है जैसी इंडियन इकोनोमी की है!

जेटली- मतलब, लालू जी?

लालू- अरे, मतलब क्या..अरे हमारा ब्लड प्रेशर और सूगर वैसे ही बढ़ता जा रहा है जैसे पेट्रोल का दाम बढ़ता जा रहा है. और, हमारा स्वास्थ्य वैसे ही गिरता जा रहा है जैसे रुपया का वैल्यू गिरता जा रहा है.

जेटली- यू नो मिस्टर लालू, इट्स ऑल ड्यू टू इंटरनेशनल इकोनोमिक क्राइसिस.

लालू- ओह, कमॉन मिस्टर जेटली. डोन्ट टॉल्क पटर-पटर. इट इज़ वेरी सीरियस मैटर. ऑन इकोनोमिक मैटर, यू आर फेल टोटली, मिस्टर जेटली.

जेटली- आप कैसी बातें कर रहे हैं लालू जी? लालू यादव जी, यू जस्ट कैन नॉट टॉक टू मी लाइक डैट.

लालू- हां तो क्या कर लीजिएगा? अरविंद केजरीवाल की तरह 10 करोड़ के मानहानी का मुकदमा कर दीजिएगा. मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक, और जेटली की दौड़ कचहरी तक. डोंट बिहेव लाइक एंग्री ओल्ड मैन मिस्टर जेटली. 2014 में जब तेल के दाम गिरे, तो आपलोगों ने तो ऐसा कहा जैसे आप ही लोगों के चलते तेल का दाम गिर गया है. मोदी जी तो ऐसा लगा जैसे विष्णुजी का दशवतार हो गए. और, अब जब तेल का दाम बढ़ रहा है तो उसका कारण इंटरनेशनल बता रहे हैं. मने कि मीठा-मीठा गप-गप, तीता-तीता थू-थू!

ऑडियो रिकॉर्डिंग को लालू और केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली के बोलने की शैली में रिकॉर्ड किया गया है. उपेन्द्र के सहयोगी बातचीत सुनते हुए ठहाके लगाते हैं. सवारी गाड़ी में उपेन्द्र के आसपास मौजूद लोग भी हंसते हैं. उपेन्द्र के सहयोगी मिथुन कहते हैं, “मोदी और शाह तो लालू को फंसा न दिया. अभी बाहर रहते तो फिर से तेल पिलावन रैली होता!”

दरअसल, लालू प्रसाद यादव की लाठी रैली, तेल पिलावन रैली, गरीब रैली, चेतावनी रैली आदि जैसी आक्रामक प्रतिरोध रैलियां करने का इतिहास रहा है. मिथुन से मैंने पूछा कि मोदी और शाह ने लालू को फंसा दिया, ये बात वह किस आधार पर कह रहे हैं. “अचानक क्या हुआ जो नीतीश कुमार लालू का साथ छोड़कर पाला बदल लिए? वह आज की डेट में विपक्ष के साथ रहते तो प्रधानमंत्री की रेस में रहते न? उनको खत्म कर दिया. लालू जी के अलावा कौन है जो संघ और भाजपा को रगेदता था. इसीलिए उनको जेल में डाला. वो खबर भी आया ही न कि कैसे प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से लालू जी को जेल में डालने का दबाव था,” मिथुन ने कहा. उपेन्द्र के एक अन्य सहयोगी कुंदन सिन्हा ने मिथुन की बात में जोड़ा, “क्यों सिर्फ विपक्ष के नेताओं को ही सीबीआई परेशान कर रही है. आप बताइए, तेजस्वी नाबालिग था और आईआरसीटीसी के घोटाला में शामिल हो गया. केजरीवाल के दफ्तर में सीबीआई का छापा पड़ गया. लोया वाले मामले में सरकार जांच क्यों नहीं करवा देती है. दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा. वो सब छोड़िए, राफेल जहाज की कीमत कितनी है, यह क्यों नहीं बताया जा सकता है. जब सबकुछ ठीक ही है तो क्यों डर रही है भाजपा?”

इन व्यंग्यों पर गौर करने से मालूम पड़ता है कि लालू के जेल जाने से राजद के प्रति सहानुभूति का माहौल तैयार करने की कोशिश है. श्रोताओं और दर्शकों को बताया जा रहा है कि हिंदू-मुस्लिम और राम मंदिर जैसे बेजा बहसों के इतर मंहगाई, भ्रष्टाचार, लोकतांत्रिक संस्थानों के पतन आदि पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए.

मैंने कुंदन से पूछा कि राफेल के बारे कथित भ्रष्टाचार की सूचना का स्त्रोत क्या है? वह कहते हैं, “गूगल पर राफेल डालते हैं. बहुत सारा लिंक आ जाता है. मोटा-मोटी जानकारी इकट्ठा हो जाता है. आजकल हमलोग के व्हाट्सएप ग्रुप में भी बहुत सारा जानकारी आता रहता है.” मैंने उनसे गुजारिश की कि अगर वे राफेल के संबंध में व्हाट्सएप संदेश सुना सकें. कुंदन ने एक अन्य ऑडियो सुनाया. यह उन्हें उनके ऑफिस ग्रुप में तकरीबन 15 से 18 दिन पहले प्राप्त हुआ था. उसके अंश कुछ यूं थे:

लालू- ऐं जेटली जी, ये राफेल डील का क्या मामला है?

जेटली- लालू जी, द प्वाइंट शूद बी नोटेड कि अभी जो हमलोग राफेल ले रहे हैं वो पहले वाले राफेल से (फंबल), उसमें मिसाइल लगे हुए हैं और उसकी टेकनॉलोजी ज्यादा बेटर है.

लालू- तीस साल से तो आपका पार्टी चिचिया रहा है कि राजीव भाई-राजीव भाई, तोप दलाली किसने खाई! ऐं जेटली जी, इ तो जेट फाइटर प्लेन है तो आप ही बता दीजिए न, जेटली भाई-जेटली भाई, जेट दलाली किसने खाई.

जेटली- हमलोग इसको भारत और फ्रांस के ज्वाइंट वेंचर में चलाने की कोशिश कर रहे हैं.

लालू- अरे, रहने दीजिए जेटली जी, इ जो आप अनिल अंबानी से फाइटर प्लेन बनवा रहे हैं..जो आदमी मोबाइल का कंपनी नहीं चला सका, वो मिसाइल का कंपनी क्या चलाएगा? जो इंसान अपना बड़ा भाई के साथ ज्वाइंट वेंचर नहीं चला सका, वो भारत और फ्रांस का ज्वाइंट वेंचर क्या चलाएगा?

सफर में सह-यात्रियों के साथ का यह वाकया मैं भूल गया था. किसी रिपोर्ट के सिलसिले में बिहार के बेगूसराय जिले के बछवाड़ा गांव में था. वहां एक समारोह में ‘अच्छे दिन’ पर बज रहे गाने ने मेरा ध्यान खींचा. गाने की पंक्तियां कुछ यूं है:

तीन साल हुई जनता बेहाल,
कबतक दिलासा दिलाएंगें,
देश की जनता पूछ रही है-2
अब अच्छे दिन कब आएंगें?-2
देश में सत्ता, प्रदेश में सत्ता
राम राज्य कब लाएंगें -2
देश की जनता पूछ रही है,
पंद्रह लाख कब आएंगें,
देश की जनता पूछ रही है-2
अब पंद्रह लाख कब आएंगें.
किए थे वादा, क्या था इरादा,
दिए जनधन खाता खोलवाई हो,
पंद्रह लाख की ताक में जनता,
बैठी आस लगाई हो.
हुई नोटबंदी, कर दिए नसबंदी
काला धन कब लाएंगें,
देश की जनता पूछ रही है-2
पंद्रह लाख कब आएंगें-2.

गीतकार के बारे में पता करने पर मालूम हुआ कि यह संजय लाल यादव ने लिखा और गाया हैं. संजय ने यह गीत जुलाई 2017 में लिखी थी. हमने संजय के यूट्यूब चैनल से उनतक संपर्क बनाया. संजय कहते हैं, “मैं मूलत गायक हूं और देश में जो घट रहा है उससे चिंतिंत हूं. यह गीत मैंने तकरीबन दो साल पहले लिखा था. मुझे नहीं मालूम था कि लोग इसे इतना प्यार देंगे.” संजय ने बातचीत में बताया कि उनका झुकाव समाजवादी पार्टी की ओर है. वह चाहते हैं कि लोग भाजपा द्वारा किए गए वादों का हिसाब मांगें और उसपर तय करे कि 2019 में किसे वोट करना है.

इन गीतों या ऑडियो को ध्यान से सुनने पर पाएंगें कि इनमें गंभीर राष्ट्रीय मुद्दों को रोचक तरीके से पेश किया जा रहा है. मनोविज्ञान के अनुसार, गीत की शक्ल में सुनी हुई पंक्तियों को दिमाग जल्दी पकड़ता है और वे देर तक टिकती हैं.

दिलचस्प है कि इस तरह के गीतों का इस्तेमाल चुनाव प्रचार में राजनीतिक पार्टियां करती रही हैं. लेकिन ये गीत या ऑडियो ऐसे लगते हैं जैसे ‘पॉलिटिक्ल स्टेटमेंट’ बन गए हो. गीत सुनकर यह जरूर लगता है कि ये भाजपा की नीतियों और वादाओं के खिलाफ गाए गए हैं लेकिन किसी भी राजनीतिक दल की भूमिका स्पष्ट नज़र नहीं आते. न ही कोई पार्टी इन्हें अपने प्रचार अभियान में शामिल करती दिखती हैं.

भागलपुर प्रवास के दौरान ताबिश इमाम ने मुझे एक यूट्यूब वीडियो दिखाया. यह लालू प्रसाद यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की बातचीत थी. ताबिश को भी यह वीडियो व्हाट्सएप पर ही प्राप्त हुआ था. उसके अंश कुछ इस प्रकार थे:

लालू- हैल्लो, जोगी से बोल रहे हैं

आदित्यनाथ- हां, मैं जोगी बोल रहा हूं. जोगी आदित्यनाथ. आप कौन बोल रहे हैं

लालू- जोगी जी, हम लालू यादव बोल रहे हैं.

आदित्यनाथ- अरे लालू जी, प्रणाम.

लालू- प्रणाम, प्रणाम.

आदित्यनाथ- कैसे-कैसे याद किया

लालू- क्या जोगी जी, इ सब क्या हो रहा है, ऐें. आप रेलवे स्टेशन का नाम बदल दे रहे हैं. कई एक शहर का नाम बदलते जा रहे हैं. ऐं जोगी जी, ये नाम में क्या रखा है.

आदित्यनाथ- आप कहते हैं, नाम में क्या रखा है. और, हमारे प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि काम में क्या रखा है.

लालू- ऐं जोगी जी, शेक्सपियर जी ने कहा था, वॉट इज़ इन ए नेम. नाम में क्या रखा है. तो इ बात आपको समझना चाहिए था न जोगी जी.

आदित्यनाथ- लालू जी, माफ कीजिएगा परंतु शेक्सपियर नाम पर मुझे ऐतराज है. और, मेरा बस चले तो मैं शेक्सपियर का नाम बदलकर शक्ति कपूर कर दूंगा.

लालू- अगर एइसा है कि जितना विदेशी नाम है उन सबको बदल देना है, तो आपको तो सबसे पहले, आपका जो पार्टी का अध्यक्ष है अमित शाह जी, उनका नाम बदलिए. उनका जो शाह टाइटिल है, वो तो फारसी देश से आया है. अमित शाह जी का नाम बदलकर अमित साहू जी क्यों नहीं कर देते हैं.

आदित्यनाथ- अगर हमारा बस चले तो हम इटली की राजधानी रोम को पहले जय श्री रोम करेंगे और बाद में फिर उसको जय श्री राम कर देंगे

लालू- हमको लगता है करीना का बेटा तैमूर का नाम तैमूर से बदलकर चनाचूर कर दीजिएगा.

आदित्यनाथ- हां, हम वैसे सभी नाम बदल देंगे जिसमें विदेशी आक्रमणकारियों की बू आती है.

लालू- हां तो ठीक है, मियां टोली का नाम बदलकर माया टोली कर दीजिए. हूमायूं कॉलोनी का नाम बदलकर हेमा मालिनी कॉलोनी कर दीजिए. आप तो ग़ज़ब आदमी हैं जोगी जी, आप तो वैलेंटाइन डे का भी नाम बदलकर कामदेव दिवस कर दीजिएगा और योगा डे का नाम बदलकर रामदेव दिवस कर दीजिएगा. माने, हम तो पहले जानते थे कि खाली इंसान ही हिंदू और मुसलमान होता है, आप तो शहर और रेलवे स्टेशन का भी धर्मांतरण करने में लग गए, जोगी जी.

‘नैनो नॉलेज’ नाम के यूट्यूब चैनल पर कई वीडियो उपलब्ध हैं. हालांकि कुछ वीडियो को चैनल द्वारा हटा भी दिया गया है. आप पाएंगें कि उक्त चैनल के हर एक वीडियो पर लाख से ज्यादा व्यूज़ हैं और इसके छोटे-छोटे क्लिप्स ऑडियो फॉर्मेट में व्हाट्सएप पर प्रसारित किए जा रहे हैं. ताबिश के छोटे भाई दानिश ने न्यूज़सेन्ट्रल24X7 को बताया कि इस तरह के वीडियो और ऑडियो कंटेंट उनके सोशल मीडिया पर आम हैं.

व्हॉट्सैप पर वायरल वीडियो

मैंने इन वीडियो के संबंध में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए मोबाइल सेंटरों से संपर्क किया. भागलपुर में आयूष मोबाइल कॉर्नर के दिलीप ने बताया, “लोग मेमोरी कार्ड लेकर आते हैं और कहते हैं लालू वाला कॉमेडी वीडियो डाल दीजिए. चूंकि हमारे पास इस तरह की डिमांड आती है तो जो भी नया वीडियो आता है, उसे हम एक फोल्डर में डाल देते हैं ताकि मेमोरी कार्ड में ट्रांसफर करने में आसान हो.”

पटना के राजा बाजार मार्केट में बिल्लू भी मोबाइल रिपेयर और मेमोरी कार्ड में गाने डालने का काम करते हैं. वह बताते हैं, “अभी भी एक क्लास है जो यूट्यूब के साथ सहज नहीं हो सका है. वे हमारे पास आते हैं. उनकी डिमांड होती है कि ‘पॉलिटिक्स वाला’ गाना भी डाल दीजिए. जो भी हमारे पास उपलब्ध होता है, हम मेमोरी कार्ड में ट्रांसफर कर देते हैं.”

बिल्लू ने एक महत्वपूर्ण बात बताई कि ज्यादातर प्रवासी मजदूरों की ओर से इस तरह की पॉलिटिक्ल कंटेंट की डिमांड आती है. “शायद दूर-दराज के शहरों में जाने के बाद उन्हें बिहार की राजनीति में क्या डेवलपमेंट हो रहा है, इसकी जानकारी नहीं मिल पाती होगी इसीलिए वे इस तरह (प्रदेश की राजनीति से प्रेरित कंटेंट) मांगते हैं,” बिल्लू ने बताया. “महागठबंधन की सरकार गिरने के बाद तेजस्वी का विधानसभा में भाषण भी बहुत सारे लोग मांगने आते हैं. अभी तो फिर भी कम हो गया. जब सरकार गिरी थी उनदिनों दिनभर में बीसियों आदमी वह वीडियो चीप में डलवाने आया करते थे,” बिल्लू ने जोड़ा.

पिछले दिनों आंगनबाड़ी और जीविका कर्मचारियों ने भी नीतीश सरकार पर लोक गीत के माध्यम से अपना प्रतिरोध जताया है. ये लोकगीत सोशल मीडिया पर काफी पसंद भी किए जा रहे हैं. उनकी पंक्तियां कुछ ऐसी हैं-

“नून रोटी खाएंगें, मोदी को हटाएंगें. ठीक है?
नून रोटी खाएंगें, मोदी से टकराएंगें. ठीक हैं?”

“बाबू भईया कहला से कुछ न होई,
जब ले गद्दी से न हटाइम, मन खुश न होई.”

“रोडे-रोडे, गलिये-गलिये मोदी के हटाइब रे बहिनी,
नीतीशवा के अंखियां, निकाल ल हो बहिनी.”

मेनस्ट्रीम मीडिया के जनतंत्र विरोधी रवैये जिसने सत्ता प्रतिष्ठान से सवाल करने और दर्शकों को बरगलाने में महारत हासिल कर ली है, सूचना प्रसारण के इसी वैक्यूम को राजनीतिक गीत और व्यंग्यात्मक हास्य भरने का काम कर रहे हैं. न सिर्फ ये अपनी रोचकता के लिए लोकप्रिय हो रहे हैं बल्कि राजनीतिक समझ भी विकसित करने का काम कर रहे हैं. हालांकि इसके अपने खतरे ज़रूर हैं क्योंकि संभव है कि ये गीत/व्यंग्य तथ्यों के पैमानों पर सटीक न उतर पाएं. पर इस बात में कोई दोमत नहीं कि जो सॉफ्ट मीडिया का स्पेस 2014 के चुनावों में सिर्फ भाजपा का प्रचार साम्रगी के लिए उपलब्ध था, उसमें भाजपा की ही आलोचनाओं वाले कॉन्टेंट ने खेल मजेदार बना दिया है.

(लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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