कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

छतीसगढ़: वन अधिकार पत्र होने के बावजूद 17 आदिवासी परिवारों के 30 एकड़ ज़मीन पर प्रशासन ने ज़बरदस्ती जमाया कब्जा

अधिकारियों ने कहा, ये सरकार का बड़प्पन है कि “थोड़ी क्षतिपूर्ति दे रहे हैं.”

छत्तीसगढ़ में नई सरकार के बनने के बाद उम्मीद थी कि आदिवासियों के साथ न्याय होगा. लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है. ताज़ा मामले में प्रशासन द्वारा सारे नियम-क़ानून को ताक पर रख कर 17 आदिवासी परिवारों की लगभग 30 एकड़ ज़मीन पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा कर लिया गया है.

घटना छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के अंतागढ़ ब्लॉक के गांव पतकालबेड़ा की है. यहां दिल्ली राजहरा रावघाट रेल परियोजना के तहत भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है.

सबरंग इंडिया के ख़बर के मुताबिक़, इन आदिवासी परिवारों के पास वन अधिकार क़ानून के तहत ज़ब्त की गई ज़मीन के लिए व्यक्तिगत वन अधिकार पत्र भी मौजूद है. इसके बाद भी प्रशासन द्वारा इन आदिवासियों को बदेखल किया जा रहा है.

बता दें कि अधिकार पत्र के तहत ग्राम सभा अनुमति लेनी होता है, साथ ही ज़ब्त की गई ज़मीन के मालिकों को इस मामले की पूरी जानकारी यानी नोटिस के मुआवजे की प्रक्रिया पूरी की जानी थी.

इसके बावजूद सभी नियम-क़ानून को हाशिए पर रखकर 17 आदिवासियों की ज़मीन पर कब्जा कर लिया गया है.

सबरंग इंडिया के रिपोर्ट के मुताबिक. यहां की ज़मीन कब्ज़ा करने की कोशिश पहले भी की गई थी. साल 2017 में कोई नोटिस दिए बगैर ही वन विभाग और ठेकेदार की मिलीभगत से इस ज़मीन पर लगे पेड़ों को काट दिया गया और वहां रेत बिछाकर ज़मीन को समतल कर दिया गया था.

इस दौरान कुल 271 फलदार पेड़ों को नष्ट किया गया और यहां बसे 4 आदिवासों परिवारों का घर उज़ाड़ दिया गया. तब ग्रामीणों ने मामले की जानकारी प्रशासन ने दी. लेकिन, प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की और ना ही ग्रामीणों को कोई मुआवज़ा मिला.

इस मामले पर प्रशासन की लापरवाह रवैया को देखते हुए ग्रामीणों ने दो साल बाद यानी 2019 में इस ज़मीन पर चल रहे निर्मण कार्य को बंद करवा दिया. जिसके बाद प्रशासन द्वारा उन्हें मुआवजा देने का निर्णय लिया गया.

बीते 4 मई को, अनुविभागीय अधिकारी अंतागढ़ के कार्यालय में कांकेर अपर कलेक्टर, अनुविभागीय अधिकारी और कांकेर विधायक अनूप नाग के साथ गांव वालों की बैठक हुई. जहां ग्रामीणों ने बताया कि यहां क़ानून का उल्लंघन किया जा रहा है. भूमि अधिग्रहण कर ना तो उन्हें कोई मुआवज़ा दिया जा रहा है और ना ही कोई नौकरी.

इस पर बैठक में शामिल अधिकारियों का जवाब आहत करने वाला है. अधिकारियों ने कहा कि, ये सरकार का बड़प्पन है कि “थोड़ी क्षतिपूर्ति दे रहे हैं.” इसके साथ अधिकारियों ने कहा कि ज़ब्त की गयी ज़मीन पर आदिवासी परिवारों का कोई अधिकार नहीं है, वे पीढ़ियों से यहां कब्ज़ा किए हैं. फ़िर भी सरकार उन्हें मुआवज़ा दे रही है तो यह सरकार का बड़प्पन है.

इसके साथ ही बैठक में ग्रामीणों पर दवाब ड़ाला गया कि वे अपर्याप्त क्षतिपूर्ति मंज़ूर करें और इसके अलांवा कोई अन्य मुआवज़ा या नौकरी की मांग नहीं करें.

इसके बाद ग्रामीणों में रोष व्याप्त है. उन्होंने लिख़ित शिकायक कर अधिकारियों के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रखने की बात कही है.

ग़ौरतलब है कि, भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के तहत वन अधिकार पत्र धारकों और राजस्व पट्टाधारकों, दोनों को ही ‘भूस्वामी’ माना गया है. इसलिए वनपट्टे की भूमि अधिग्रहण के लिए भूमि अधिग्रहण कानून 2013 का पालन करना आवश्यक है.

You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+