कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

कामकाजी महिलाओं ने लोकसभा चुनाव के लिए जारी किया मेनिफ़ेस्टो, उचित वेतन और अवकाश की रखी मांग

महिलाओं का कहना है कि कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जाता है.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से एक दिन पहले बीते गुरुवार को सैकड़ों महिलाएं कामकाजी महिला घोषणापत्र के उद्देश्य के साथ दिल्ली के जंतर मंतर पर एकत्र हुईं. ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन्स (AICCTU) और ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव विमेंस एसोसिएशन (AIPWA)  द्वारा कामकाजी महिलाओं की मांगों  से अवगत  कराने के लिए इस चर्चा का आयोजन किया गया था.

आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए  राजनीतिक पार्टियों और मीडिया द्वारा  बेरोज़गारी और कृषि संकट जैसे मुद्दों को व्याप्क रूप से मान्यता दी जा रही  है. इस घोषणापत्र में कामकाजी महिलाओं के मुद्दों को उजागर किया गया है. जिन आमतौर पर राजनेताओं द्वारा ध्यान नहीं जाता.

ऐक्टू और ऐपवा का कहना है कि दिन-रात घर के अन्दर और बाहर मेहनत करने के बावजूद भी महिलाओं को मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जाता है, उन्हें मजदूर तक का दर्जा भी नहीं दिया जाता है. उन्होंने कहा कि पिछले पांच सालों में देश ने भयंकर अंधकार का समय देखा है. उन्होंने मोदी सरकार पर बलात्कारी नेताओं का बचाव करने और ‘बेटी-बचाओ’ का ढोंग करने का भी आरोप लगाया गया है.

कामकाजी महिलाओं की स्थिति को लेकर इन संगठनों का कहना है कि घरों में काम करने वाली महिलाओं को आज भी समाज और सरकार सेवा या धर्म से ज्यादा कुछ नहीं समझती है.  उन्होंने कहा कि आशा, आंगनबाड़ी और रसोइया इत्यादि स्कीम के वर्कर्स को वेतन की जगह मानदेय या प्रोत्साहन राशि  के नाम पर कुछ सौ रुपए पकड़ा दिए जाते हैं.

इस मेनिफेस्टो चर्चा में कहा गया कि हाल फिलहाल में बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात समेत पूरे देश में महिला कार्यकर्ताओं के संघर्ष के बावजूद सरकार ‘45वें भारतीय श्रम सम्मेलन’ में पारित बिन्दुओं को लागू नहीं कर रही है.

बल्कि श्रम कानूनों को सुधार के नाम पर तेज़ी से ख़त्म किया जा रहा है और  ‘फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट’, ‘नीम (राष्ट्रीय रोजगार संवर्धन मिशन) और नेताप (अपरेंटिसशिप प्रोग्राम के माध्यम से राष्ट्रीय रोजगार) जैसी स्कीमों को लाकर पक्के रोज़गार को ख़त्म किया जा रहा है.

44 श्रम कानूनों को ख़त्म कर 4 लेबर कोड लाने का फ़ैसला सरकार ने कर लिया है. ये सारे बदलाव पहले से ही रोज़गार में महिलाओं की खराब स्थिति को और बदतर बना देंगे. ठेकेदारी, अस्थायी रोज़गार इत्यादि में काम कर रही महिलाओं को इन बदलावों के चलते और ज्यादा दमन-परेशानी का सामना करना पड़ेगा.

संगम विहार की सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) रीता भारद्वाज ने न्यूज़सेन्ट्रल24×7  से बातचीत करते हुए कहा कि जब उन्होंने 2006 में काम करना शुरू किया था, तब उन्हें 500 रुपए प्रति माह का वेतन मिलता था. लेकिन 13 साल बाद भी उन्हें प्रति माह 3 हजार रुपए से अधिक वेतन नहीं मिलता है. जबकि उन पर अपने क्षेत्र के 500-600 परिवारों के देखभाल की जिम्मेदारी है.

पूर्वी विनोद नगर की रहने वाली विभा, जो रिहायशी इलाकों में रसोइया का काम करती हैं, उनके हालात भी कुछ ऐसे ही हैं. वह, अपने परिवार में कमाने वाली एकमात्र महिला हैं. उनको मिलने वाला वेतन परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है. जबकी उनके पति बीमारी के शिकार हैं. उन्होंने कहा कि पूरे साल में उन्हें एक दिन की भी पेड-लीव नहीं मिलती है.

कोंडली की माला ने मजदूरी में भेदभाव और असामयिक भुगतान के मुद्दों को उजागर किया. वहीं नरेला की रहने वाली एक विधवा राशीदन ने बताया कि उन्हें विधवा पेंशन और वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिल रही है, क्योंकि उन्होंने आधार संबंधी विवरण नहीं दिया था.

महिलाओं ने घोषणा की कि चुनाव तक उन्मादी टीवी ‘न्यूज़’ चैनलों का बहिष्कार करेंगे, जो चुनावी माहौल में जहर घोलने और चुनाव में मजदूरों और आम लोगों के मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं. महिलाओं ने कहा कि हम सांप्रदायिक ज़हर फैलाने और धर्म के आधार पर देश की जनता को बांटने की हर कोशिश का विरोध करेंगे.

महिला मजदूरों ने मांगपत्र में कहा कि 26,000 रुपए न्यूनतम मासिक वेतन की गांरटी हो. न्यूनतम वेतन न देने वालों के ऊपर सख्त कार्रवाई का प्रावधान हो. आशा, आंगनबाड़ी, रसोइया इत्यादि स्कीम वर्कर्स को सरकारी कर्मचारी का दर्ज़ा दिया जाए.

महिलाओं ने कार्यस्थलों पर लैंगिक भेदभाव व यौन हिंसा मुक्त वातावरण का निर्माण करने और विशाखा दिशानिर्देश लागू करने के लिए ‘सेल’ इत्यादि का गठन सुनिश्चित करने की भी मांग की है.

इसके साथ ही महिलाओं ने कहा है कि ठेकेदारी प्रथा को ख़त्म कर, ठेके पर काम करने वाली महिला श्रमिकों के कल्याण व पक्के रोज़गार के लिए अलग से कानून बनाए जाए. मैला उठाने की प्रथा को ख़त्म करने के लिए बने कानून को सख्ती से लागू किया जाए, विशेषकर महिला सफाई कर्मचारियों के हो रहे आर्थिक, लैंगिक, जातिगत शोषण पर तुरंत रोक लगाई जाए.

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