कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: गया में मांझियों का हाल: ना घर, ना शौचालय, भूमिहीन मज़दूरों की बिता रहे ज़िंदगी

गया में राजनैतिक रूप से इतना महत्व रखते हुए भी मांझी समुदाय के लोगों के बीच बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है.

2019 लोकसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग 11 अप्रैल यानी गुरुवार को होने जा रही है. जिन लोकसभा क्षेत्रों में कल मतदान होने वाले हैं उनमें बिहार का गया ज़िला भी शामिल है. गया लोकसभा सीट के 17 लाख वोटरों में लगभग 2.5 लाख वोटर केवल मांझी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. इसलिए पार्टियों ने मांझी समुदाय से आने वाले लोगों को ही अपना उम्मीदवार बनाया है. एक ओर महागठबंधन की तरफ़ से जहां पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का लोकप्रिय चेहरा सामने है तो वहीं दूसरी तरफ एनडीए ने विजय मांझी पर अपना दाव खेला है. बिहार में मांझी समुदाय महादलित की श्रेणी में आता है. इलाके़ में राजनैतिक रूप से इतना महत्व रखते हुए भी मांझी समुदाय के लोगों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. चुनाव के मौसम में मांझी समुदाय के लोगों की मौजूदा स्थिति का जायज़ा लेने पहुंचे हमारे संवाददाता दीपक कुमार ने गया के बोधगया प्रखंड से ग्राउंड रिपोर्ट भेजा है. पढ़ें और प्रतिक्रिया व्यक्त करें.

(संपादक)



“बिजली देने से मज़दूर का क्या होगा? जब घर ही नहीं है तो बिजली कहां लगाएगा. अगर मजदूर के रहने- सहने का ठिकाना ही नहीं तो फिर पानी देकर क्या करिएगा. कहां ले जाएंगे पानी?” खेतिहर मज़दूर नेता कारु पासवान अनुरोध करते हैं कि आप यहां से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित जिकटिया गांव का मांझी टोला हो आइए. वहां आपको सच मालूम चल जाएगा.

8 फ़रवरी,सोमवार की दोपहर. गया स्टेशन से लगभग 20 किलोमीटर दूर बोधगया प्रखंड का जिकटिया गांव. गांव में पक्की सड़क जाती तो ज़रूर है लेकिन मांझी टोले को पार नहीं कर पाती. बीच में ही ख़त्म हो जाती है. सड़क के दोनों किनारे ही मांझियों की बस्ती है. घर के नाम पर मिट्टी की दीवार और ऊपर से डाली गई घपरैल.

मांझी समुदाय की इस बस्ती में पचास से ज़्यादा ही घर होंगे. लगभग हर घर से एक या दो परिवार अपना गांव छोड़कर अपने ससुराल या रिश्तेदारों के यहां जा बसा है. कारण बस एक ही है रहने का कोई साधन न होना. परिवार में सदस्यों की संख्या के अनुपात में घरों की संख्या न के बराबर है. लोगों के पास अपनी ज़मीन भी नहीं है कि दूसरे जगह घर बना सकें.

नारायण मांझी(45) जिनके अपने कुल नौ भाई हैं. उनके बाल-बच्चों को मिला लिया जाए तो पूरे घर में सदस्यों की संख्या 40 के पार हो जाएगी. लेकिन घर के नाम पर मिट्टी की दीवार पर खड़ा किया गया एक खपरैलनुमा कोठरी.

नारायण मांझी का मिट्टी की दीवार पर खड़ा किया गया एक खपरैलनुमा कोठरी/ फ़ोटो-दीपक कुमार(न्यूज़सेन्ट्रल24X7)

 

नारायण मांझी बताते हैं, “यहां हरेक घर में आपको यह समस्या दिखेगी. मेरे घर से ही मेरे कुछ भाई ससुराल चले गए. न ज़मीन था न घर. ससुराल में जगह मिल गया तो रह गए वहां.”

“रात में आपलोग सोते हैं कहां?” के जवाब में नारायण बताते हैं, “अब तो गर्मी आ गया. इधर-उधर जमीन पर कुछ बिछाकर सो जाते हैं. खटिया(चारपाई) भी नहीं जुट रहा कि हमलोग उस पर सोए.”

गया में 11 अप्रैल को मतदान होने वाले हैं. गया लोकसभा सीट के 17 लाख वोटरों में लगभग 2.5 लाख केवल मांझी समुदाय से हैं. इसलिए हर बार की तरह इस बार भी सभी दलों ने मांझी समुदाय से आने वाले व्यक्ति को ही अपना उम्मीदवार बनाया है. महागठबंधन के तरफ़ से पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का लोकप्रिय चेहरा सामने है तो एनडीए ने विजय मांझी पर अपना दाव खेला है.

इलाक़े में राजनैतिक रूप से इतना महत्व रखते हुए भी मांझी समुदाय के लोगों के बीच बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है. इनके लिए आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद कुछ नहीं बदला. खाने के लिए अन्न नहीं तो रहने के लिए घर भी मयस्सर नहीं. कैशलेस इकोनॉमी जैसे भारी-भरकम शब्द तो यहां से कोसों दूर हैं. बस हर आंखों में ही एक ही कहानी है- किसी प्रकार अपने हिस्से की ज़िंदगी काट लूं.

मिनाक्षी और पारो..जो दलित बस्ती की सबसे उम्रदराज महिला हैं.

 

मज़दूरी में मिलते हैं दो-ढाई किलो चावल

जिकटिया गांव में अधिकतर मांझी परिवार खेतिहर मज़दूर हैं. परिवार का प्रत्येक सदस्य चाहे वो महिला हो या पुरुष, दूसरे किसान के खेतों में जाकर काम करता है. काम के बदले हरेक दिन उन्हें बस दो से ढाई किलो चावल या गेहूं मिल पाता है. फ़सल के अपने मौसम होते हैं, कई बार तो इन्हें यह भी नहीं मिलता. फिर पास के ईंट भट्टों पर काम करना पड़ता है.

नारायण मांझी की पत्नी दमयंती कहती हैं, “कैसे काम चलेगा. सेर भर अनाज मिलता है, उसमें से भी नून है..तेल है..कपड़ा है..दुनिया संसार सबकुछ सेर भर में ही करना है. जो कुछ भी मिलता है उसमें से बेचकर थोड़ा पैसा मिलता है. फिर दवा-दारू चलता है.”

मिनाक्षी देवी जो मांझी टोले के सबसे उम्रदराज महिला मालूम पड़ती हैं. यह पूछने पर कि ‘इतने सालों में आप क्या देखीं..कुछ बदलाव दिखा?’ कहती हैं, “देखा न, बहुत अकाल देखी. क्या बदलेगा..अभी वहीं स्थिति है. इतना सा तो ज़मीन है इसमें क्या बदलेगा हमारा.”

“देखा न, बहुत अकाल देखी. क्या बदलेगा..अभी वहीं स्थिति है. इतना सा तो ज़मीन है इसमें क्या बदलेगा हमारा.”

 

गांव में यादवों की ज़मीन ज़्यादा हैं. उनके खेतों में ही मांझी परिवार खेतिहर मज़दूर के रूप में काम करते हैं. कई बार इन्हें जातीय दुर्व्यवहार का भी शिकार होना पड़ता है.

बिहार प्रान्तीय खेतिहर मज़दूर यूनियन के नेता कारु पासवान बताते हैं, “आप खुद उन मज़दूरों से पूछ लीजिए. बिहार में सबसे ज़्यादा मज़दूर गया ज़िले के अंदर हैं. इस समय जो लड़ाई शुरू हुई है वो यादवों के साथ है. जाति के नाम पर दलितों को परेशान किया जाता है.”

खेतिहर मज़दूरी के अलावे ज़्यादातर लोग राज मिस्त्री या मजूरी का काम करते हैं. सरयू मांझी बताते हैं, “इसका भी कोई ठीक नहीं है. मिला तो ठीक है नहीं तो ऐसे ही कई दिन बैठना पड़ता है. फिर एक-दो जानवर है तो उसे चराने निकल जाते हैं.”

सरयू आगे कहते हैं कि “मजूरी का भी ठीक रेट नहीं है. यदि आप गांव में काम करते हैं दो सौ रुपए ही मिलते हैं. यदि शहर की ओर जाकर काम करेंगे तो ढाई सौ रुपए मिल जाएंगे.”

बिहार प्रान्तीय खेतिहर मज़दूर, वेलाडीह(गया) का ऑफ़िस

 

रहने का जगह ही नहीं फिर शौचालय कहां बना लूं

गांव के इस दलित बस्ती में कुछ घरों में ही शौचालय बने हैं. कई घरों में शौचालय बनाने के लिए जमीन ही नहीं है. गांव के लोग बताते हैं कि जिनके पास जमीन थी उनको पैसा मिला और टंकी बैठ गया. लेकिन जिनके पास रहने का ही साधन नहीं..वो अलग से टंकी कहां बैठा लें. रोड पर तो बना नहीं सकते.

रेशमा देवी बताती हैं, “हमलोग तीन गोतिया(पट्टीदार) हैं, लेकिन रहने के लिए बस एक कमरा वाला घर है. और जगह ही नहीं कि घर बना सके. अब बताइए अलग से बाथरूम कहां बनेगा. जगह ही नहीं कि शौचालय बनेगा. आदमी के लिए आगे घर तो बन जाए.”

रेशमा देवी, घर में सरकारी शौचालय बनवाने के लिए जमीन ही नहीं है

 

शौचालय योजना की तरह ही प्रधानमंत्री आवास योजना भी यहां पूरी तरह फ़ेल है. छोटी सी ज़मीन पर लोग खपरैल या झोपड़ीनुमा घर बनाए हुए हैं. लोगों की मांग है कि सरकार उन्हें सबसे पहले ज़मीन उपलब्ध करवाए, उसके बाद ही इस प्रकार की योजना चलाए.

ज़मीन को लेकर गांव वालों ने कई बार आंदोलन भी किया है. प्रशासन हर बार भूमिहीनों को सरकारी ज़मीन देने का वादा कर टालता रहा है.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) से जुड़े पारसनाथ सिंह, जो गया ज़िले के कई अंचलों में पार्टी का काम देखते हैं. बताते हैं, “गया में खूनी संघर्ष भी जमीन के लिए हुआ था. यह समस्या आज तक बनी हुई है. आप बोधगया, परैया, गुरुआ के तरफ़ खासकर यह समस्या देखेंगे. इन क्षेत्रों में बिहार सरकार की हज़ारों एकड़ ज़मीनें हैं. लेकिन इन ज़मीनों पर उस क्षेत्र की दबंग जातियों का कब्जा है. यह बात सरकार को भी मालूम है. लेकिन सरकार इस पर कोई कार्रवाई नहीं करती.”

और योजनाओं का भी है ख़स्ता हाल

गया लोकसभा सीट के चुनावी इतिहास को देखें तो यहां भाजपा लंबे समय तक सत्ता में बनी रही है. 1998 और 1999 का चुनाव यहां से बीजेपी ने जीता. 2004 में आरजेडी के राजेश कुमार मांझी सांसद चुन गए. इसके बाद फिर 2009 और 2014 के चुनाव में बीजेपी के हरि मांझी इस सीट से संसद पहुंचे.

दस सालों तक सांसद रहे हरि मांझी अपने क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं पहुंचा पाए हैं. हालांकि पार्टी का घोषणापत्र जारी करते हुए अध्यक्ष अमित शाह का कहना था कि पांच सालों के दौरान करोड़ों गरीब लोगों के जीवन स्तर को उठाने का काम किया गया है. बुनियादी ज़रूरतों को पूरा किया गया है.

मांझी टोले की स्थिति

 

जिकटिया गांव के लोगों को किरोसिन तेल तो मिल जाता है लेकिन खाने के लिए राशन नहीं मिलता. पारो मांझी बताती हैं, “किरोसिन तेल समय से मिल जाता है लेकिन राशन…..उतना समय से नहीं मिलता. कभी मिला तो कभी नहीं.”

वृद्धा पेंशन को लेकर भी यही हाल है. किसी का बना है तो किसी का नहीं बना. पारो मांझी मोदी सरकार के कार्यकाल को लेकर बोलती हैं कि “का बदलतई, दुखवा तो हई ही..न एक धुर जमीन हई..न खेती हई न बाड़ी हई…न रहे का ठिकाना…और का दुखवा कहियो.”

न्यूज़सेन्ट्रल की टीम जब हरि मांझी से सम्पर्क करती है, तो उनका पीए आगे तो समस्या के बारे में पूछता है, फिर सांसद जी के नहीं उपलब्ध होने की बात कह फ़ोन काट देता है.

बता दें कि नवंबर, 2016 में नीतीश सरकार ने गांव में बुनियादी सुविधाओं की पहुंच के लिए सात निश्चय योजना का शुरुआत की थी. लेकिन इतने सालों बाद भी जिकटिया जैसे गांव में इन योजनाओं को लागू करने के लिए ज़मीन भी तैयार नहीं हो पाई. यह एक सवाल है कि जब रहने को घर नहीं तो फिर बिजली-पानी क्या करें?

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