कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

जहानाबाद: मांझी बस्ती में पानी के लिए सुअरों- मुर्गियों और बच्चों के बीच है त्रिकोणीय मुकाबला

"शौचालय के लिए 12,000 रुपया मिलता है. हमरा गांव के बहुत लोग को मिला, लेकिन मात्र 6000 रुपैया. बाकी का रुपैया दलाल ले लिया."

बिहार के जहानाबाद में त्रिकोणीय मुकाबला है. लेकिन यह किसी एनडीए, महागठबंधन या फिर निर्दलीय उम्मीदवार के बीच नहीं बल्कि यह मुकाबला बभना के नालियों में पड़े सुअरों और उसके आसपास भटक रहे मुर्गियों के साथ-साथ मुसहर जाति के बच्चों के बीच चल रहा है. किसके पास पीने के लिए पानी आसानी से मिल सकता है. सुअर नाली के गंदे पानी पी रहे हैं. मुर्गियां भी उन्हीं में से पीकर अपना काम चला रही हैं, पर राजमती देवी की 3 साल की बेटी ऐसा नहीं कर सकती. वह घर से बाहर और फिर घर का चक्कर लगाती है. 4 बजने का इंतजार करती है. फिर पास के टोले में जब सप्लाई का पानी कोई लाता है तो उससे अपना प्यास बूझाती है.

जहानाबाद बिहार के नक्सल प्रभावित जिलों में से एक है. गया जिले से अलग होकर 1986 में यह नया जिला बना. जहानाबाद जिला मुख्यालय से करीब 4 किलोमीटर पश्चिम में एक गांव है बभना. बभना शब्द बाभन यानी ब्राह्मण से बना है. लेकिन गांव के किनारे-किनारे मांझी जाति के लोगों की बस्ती है. मांझी परिवारों के करीब 600 घर बभना में है. गांव के बीच में ब्राह्मण, भूमिहार, पासी जैसी जातियों के लोग हैं. मांझी जाति को छोड़ बाकी सभी जातियों के पास पक्का मकान है.

बभना गांव

 

यहां के लोगों के पास जीने की बुनियादी सुविधाएं जैसे पानी, घर, शौचालय जैसी जरूरतें अगले कुछ सालों में पूरा हो पाएंगी, ऐसा बिल्कुल नहीं लगता. बाहर या भीतर कहीं से भी देखें तो बभना की मांझी बस्ती 1990 के आसपास का भारत लगेगी. पूरे गांव में एक चापाकल है, जो सालों से ख़राब पड़ा है. पानी के लिए दूसरे वार्ड में जाना पड़ता है.

बभना के वार्ड नंबर 1 की राजमती बताती हैं, “घर दुआर हईये न है, का करेंगे बिजली लेके. ना शौचालय है ना पीने वाला पानी. दिन में तीन बार पानी आता है, सप्लाई वाला ऊ भी पास वाला टोला में. उहां से जाके लावे पड़ता है.” बच्चों की पढ़ाई के बारे में पूछने पर राजमती बताती हैं कि पहले आंगनबाड़ी में बच्ची को भेजती थी, लेकिन उसकी मास्टर हमलोग के बच्चा को मारती है और गरियाती (गाली देती है), खाली अपन जात के बच्चा को पढ़ाती है. मांझी को देखे नहीं चाहता है सब.

इसी टोले के एक डिब्बानुमा घर के आगे 40-45 साल का अधेड़ अचेत पड़ा है. जगाने पर नाम विजय मांझी बताता है. इनके परिवार में 7 लोग हैं और सबके रहने के लिए बस दो कमरा. कमरे का क्षेत्रफल 7X7 से ज्यादा की नहीं रही होगी. विजय मांझी बताते हैं कि हमलोग को कुछो फायदा नहीं हुआ. ना शौचालय बनाने के लिए जगह है ना गैस-सिलिंडर की जरूरत. विजय मांझी ट्रक पर खलासी का काम करते हैं. इनकी शिकायत है कि हर बार कोई आता है, लिख-पढ़कर ले जाता है, लेकिन कुछ भी नहीं मिलता. इनका कहना है कि वोट का सीजन है, कुछ पैसा मिल जाता तो वोट दे देते.

विजय मांझी और उसका घर

 

विजय मांझी की शादीशुदा बहन नीलम देवी पास ही में खैनी रगड़ रही थीं. यह पूछने पर कि घर में शौचालय-वौचालय बना है कि नहीं? तमतमाते हुए नीलम बोलीं- भाग जो इहां से, (यहां से हट जाओ.) भोट के कवनो बात हमरा इहां मत बतियो, गारी दे देब (मुझसे वोट की कोई बात मत करो, गाली दे दूंगी.)

इस बस्ती के लोगों के चेहरे पर अफसोस नहीं है. या तो यहां के लोग नशे में हैं या फिर वो बात नहीं करना चाहते. उनके लिए यह रोज का काम है कि मीडिया वाला या कोई नेता आता है और सबकुछ पूछ कर जाता है, लेकिन मिलता कुछ नहीं है.

45-50 साल की संजोगना देवी के पति मिट्टी ढोने वाले मजदूर का काम करते हैं. बच्चे भी मजदूरी करने में लगे हैं. वो बताती हैं कि बच्चा सब मजदूरी के लिए जाता है, लेकिन हमेशा काम नहीं मिलता. कभी 200 तो कभी 250 रुपया कमा कर लाता है. संजोगना कहती हैं, “हमरा सरकार से कोई लाभ नहीं हुआ. ना शौचालय है ना कुछ है. थोड़ी दूर पर गांव के सरेह (खेतों) में यहां का सबलोग शौचालय जाता है.” संजोगना देवी बताती हैं, “शौचालय के लिए 12,000 रुपया मिलता है. हमरा गांव के बहुत लोग को मिला, लेकिन मात्र 6000 रुपैया. बाकी का रूपैया दलाल ले लिया. हम शौचालय का पैसा नहीं लिए कि 12,000 के जगह 6,000 कौन ले? सरकार के रेकड़ (रिकॉर्ड) में भी आ जाएगा कि पैसा दे दिए लेकिन हमको तो कुछ नहीं मिलेगा.”

संजोगनी देवी

 

बभना वार्ड नंबर 1 के वार्ड सदस्य उदय पासवान बताते हैं कि बभना में 700 से 800 मांझी जाति के लोगों का घर है. इनके पास अपनी ज़मीन नहीं है. सड़क के किनारे ये लोग गरमज़रुआ (सरकारी ज़मीन) पर घर बनाकर सालों से रह रहे हैं. उदय पासवान ने बताया कि शराबबंदी के बाद यहां के लोगों को काफ़ी नुक़सान हुआ है. लगभग हर परिवार से कोई ना कोई जेल जा चुका है. इनका मेन बिजनेस था ताड़ी बेचने का, जिस पर रोक लग गई. अब ये लोग छिप-छिपाकर बेचते हैं, और पकड़े जाने पर जेल जाते हैं.”

22-23 साल के उपेन्द्र मांझी बताते हैं कि मार्च में काको जेल से छूट कर आया हूं. ताड़ी बेचने का काम करता था, इसलिए पुलिस ले गई. बाप-दादा यही करते-करते मर गए लेकिन हमारे जमाने में सरकार ने शराबबंदी कर दी. उपेन्द्र मांझी को जेल जाने का कोई अफसोस नहीं है. वो कहते हैं कि पेट चलाने के लिए जो कुछ भी बन पड़ता है वो करेंगे. वो कहते हैं कि आगे भी ताड़ी बेचेंगे, “जब काम ना मिली तब ताड़ी भी ना बेचें?”

उपेन्द्र मांझी की बहन सीता देवी कहती हैं कि हमें पूछने वाला कौन है. ना कोई सुविधा है ना कुछ. उनका कहना है, “जो हमारी विरादरी का नेता है, वो भी अब हम सबको नहीं पूछता. सब आगे बढ़ गया तो आसमान में चलने लगा.”

सीता देवी का इशारा जहानाबाद नगर परिषद की चेयरमैन पूनम देवी की ओर था. पूनम देवी मांझी जाति से ही ताल्लुक रखती हैं और बभना वार्ड नंबर 1 में ही उनका भी घर है. लेकिन, यहां रहने वाले लोगों की शिकायत है कि पूनम देवी ने उनके लिए कोई काम नहीं किया, वोट लेके बड़ा नेता बन गई बस. ना किसी का घर बनाने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना का पैसा मिला ना बिजली-पानी ना शौचालय.

वार्ड नंबर-1 में ही सप्लाई वाले पानी के इंतजार में बैठे सरयु मांझी बताते हैं कि पहले ताड़ी बेचने का काम करते थे, अब मजदूरी करते हैं. कभी-कभार काम मिलता है. वे बताते हैं, “हमारे टोला से पुलिस 25-26 बच्चा को पकड़ कर ले गई, लेकिन कवनो नेता कुछ नहीं किया. सब अपना मतलब से यहां आता है.” यह पूछने पर कि पांच सालों में कुछ बदला? सरयु बताते हैं, “पांच साल का, इंहा तो 25 साल में कुछ नहीं बदला. जो बाप-दादा करते थे, वही हम करते हैं, हमारा बेटा-पोता भी यही करेगा.”

सरयू मांझी और गांव वाले

 

यही पास ही में मछली तल रहे सहदेव मांझी का कहना है कि सरकार हमरा सब के लिए कुछ नहीं किया है. भोट देने से कवनो फायदा नहीं है. बच्चा सब का पढ़ाई करने का भी व्यवस्था नहीं है. उन्होंने बताया, “पासवान जाति के एक आदमी के घर में आंगनबाड़ी केंद्र है, जहां पहले मांझी परिवारों के बच्चे जाया करते थे. फिर वहां की मास्टरनी हमारे बच्चों को मारने लगी. सब अपना-अपना जात को बढ़ाने में लगा है. हमलोग को कोई पूछने वाला नहीं है. अपना जात के नेता भी नहीं हमलोग को नहीं पूछता.

न्यूज़सेंट्रल24X7 ने जहानाबाद नगर परिषद के चेयरमैन पूनम देवी से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनका पूरा परिवार किसी रिश्तेदार के यहां गया था, मुलाकात नहीं हो सकी.

मांझियों की टोली

 

जहानाबाद लोकसभा सीट से 2014 में तब एनडीए में रहे रालोसपा के उम्मीदवार अरुण कुमार ने जीत हासिल की थी. दूसरे नंबर पर राष्ट्रीय जनता दल के सुरेंद्र प्रसाद यादव थे. इस बार एनडीए की तरफ से यहां जदयू के चंद्रेश्वर चंद्रवंशी को उम्मीदवार बनाया गया है. राजद ने अपने पुराने प्रत्याशी सुरेंद्र प्रसाद यादव को ही उम्मीदवार बनाया है. अरुण कुमार ने रालोसपा छोड़कर अपनी नई पार्टी बना, चुनाव लड़ रहे हैं. यहां राजद के पक्ष में अच्छा-खासा माहौल है, पर लोगों का कहना है कि मुकाबला त्रिकोणीय है.

यहां 19 मई को वोट पड़ेंगे और 23 मई को देशभर के साथ जहानाबाद के भी रिजल्ट आएंगे. पर यहां के बभना गांव के लोगों के लिए 19 या 23 मई को कुछ बदलाव होने जा रहा है, इसकी कोई गुंजाईश नहीं दिखती. यहां का मुकाबला आज भी त्रिकोणीय है और कल भी त्रिकोणीय रहने की उम्मीद है- नाली में घूम रहे सुअरों, मुर्गियों और प्यास से तड़पते बच्चों के बीच जंग है कि कौन अपनी प्यास बुझा सकता है. इस मुकाबले में सुअर और मुर्गियां उस बच्चे से आगे निकल जाते हैं, जो नाली की पानी नहीं पी सकती.

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