कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

किताब में पढ़ाई गई बात सच है तो यह चुनावी परिणाम गांधी, नेहरू और भगत को तमाचा है

"देश ने दिखा दिया कि मेरा देश कल्पना का देश था. मैं यहां रुआंसा बैठा हूँ, किसको बताऊं कि हमारे साथ धोखा हुआ है, हमसे झूठ बोला गया है."

कल मैं थोड़ा देर से उठा था. कुछ दिन पहले एग्जिट पोल देख के एक मायूसी सी आ गई थी मुझमे. फिर कुछ दिन खुद को ढांढस बंधाया, सोचा, ये तो ज़्यादातर गलत होते हैं, ऐसा कैसे हो सकता है. मन फिर भी शांत नहीं हुआ तो सोचा मान लो जीत भी जाते हैं तो इतने से तो जीत ही नहीं सकते, इनको धक्का लगेगा और लड़ाई जारी रहेगी. यह सब सोचने के बावजूद भी मैं पहले से थोड़ा चुप हो गया था. जहाँ कुछ दिन पहले तक जोश से लोगों से पक्ष विपक्ष पे बहस किया करता था, अब इन बातों पर मैंने बात करना कम कर दिया था. इस सब के बावजूद भी अन्दर एक आशा थी.
यह आशा क्या थी? यह आशा थी कि ये जो मेरा देश है, यह संगम का देश है, गंगा जमुनी तहज़ीब का देश है, ग़ालिब का देश है, कबीर का देश है, यह देश मेरा प्यार का देश है, यह गाँधी का देश है, यह नेहरू का देश है. कमियां हैं पर कहाँ नहीं होती. कमियों के बावजूद यह एक अलग देश है.
पर यह कल क्या हुआ! यह वो कौन लोग थे जिन्होंने ये किया, मुझे तो कम दिखते हैं, आप जानते हैं क्या?

मैं तो कुछ और ही समझता था, पर शायद मेरी समझ में कमी थी. कल मुझे चोट लगी, कल जो कहते थे की यह देश हमारा है, उनका नहीं, कल वह सही साबित हुए. कल देश ने दिखा दिया की मैं कितना गलत था.

कल देश ने दिखा दिया कि मेरा देश कल्पना का देश था. मैं यहाँ रुआंसा बैठा हूँ, किसको बताऊँ कि हमारे साथ धोखा हुआ है, हमसे झूठ बोला गया है.

हम तो बेवक़ूफ़ थे, बच्चे थे, कि दूरदर्शन पे दिखाई हुए भाईचारे और NCERT में पढ़ाई गयी इतिहास और आज़ादी कि बातों को सच मान बैठे. हमें बड़ा हो जाना चाहिए था. कल मुझे तमाचा पड़ा है, पर अगर वो पढ़ाई और बताई गई बातें सच हैं तो कल भगत को, नेहरु को, सरदार को, शास्त्री को, आजाद को, गाँधी को, सबको तमाचा पड़ा है.

कल पहली बार सच देखा है. शुक्रिया. जल्दी नहीं भूलेंगे.

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