कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

गांधी जी होते तो CAA विरोधी प्रदर्शनों का साथ देते

जिस तरह से देश की धर्म-निरपेक्षता और भाईचारे बचाने के लिए सभी मजहबों के लोग एकजुट हुए हैं, गांधीजी निश्चित रूप से इस आंदोलन का समर्थन करते.

एक पूरी सदी बीत गई, जब भारत की आत्मा को बचाने की लड़ाई शुरू हुई थी. उस समय अपना पूरा देश दांव पर था, जिसे अंग्रेजों से आज़ाद होने के बाद सभी भारतीयों को मिलकर आगे बढ़ाना था.

उसी समय महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से आए. करीब तीन दशक तक गांधीजी के नेतृत्व में भारत के हिन्दू-मुसलमान और सभी मज़हब के लोगों ने भारत को एक ऐसा समावेशी देश बनाने का सपना देखा, जहां सभी लोगों के धार्मिक पहचान को सम्मान मिलेगा और सबको बराबर का हक दिया जाएगा. आज़ादी के बाद जब बाबा साहेब अंबेडकर के नेतृत्व में देश का संविधान बना, तब संविधान में उन मूल्यों को प्रमुखता से जगह दी गई.

इन सौ सालों में हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समय-समय पर गांधीजी के सपनों के भारत को चुनौती देता रहा. इन संगठनों का कहना था कि भारत सिर्फ हिन्दुओं का देश है, जहां मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बन कर रहना होगा. वंचित जातियों और आदिवासियों के अधिकार भी कम करने के प्रयास इन्होंने किए.

देश के बंटवारे ने महात्मा गांधी सहित लाखों लोगों का जीवन छीन लिया और शायद मानव इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन भी इसी वजह से देश को झेलना पड़ा.

आज भी भारत उसी तरह के युद्ध के सामने खड़ा है. आज देश की सत्ता उन लोगों के हाथों में है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सेवा में गुजारा है. वो मानते हैं कि अब देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने का समय आ गया है.

देश में अल्पसंख्यकों के लिए कट्टरता अचानक से नहीं आई. आज़ादी के बाद से ही इसकी सुगबुगाहट तेज हो गई थी. 1980 के दशक के बाद से देश ने कई दंगे देखे. मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को इसी कालखंड में कम किया गया और आरएसएस के उकसावे में अयोध्या की मसजिद भी तोड़ी गई.

2014 के बाद से भारत के मूल्यों का पतन काफी तेजी से हुआ है. अपने अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के लिए यह पहले से अधिक ख़तरनाक बन गया है. मुसलमानों और उनके साथ खड़े रहने वाले लोगों के ख़िलाफ़ जंग का माहौल बना दिया गया है. बड़े-बड़े नेता अपने भाषणों में सांप्रदायिकता का ज़हर उगलने लगे हैं. इन भाषणों से प्रेरित होकर भीड़ मुसलमानों और दलितों की लिंचिंग कर रही है. गाय के नाम पर लोगों को मारा जा रहा है. लिंचिंग के वीडियो को सोशल मीडिया पर डालकर वाहवाही लूटने की कोशिश हो रही है. मुस्लिम पुरुष और हिन्दू महिला के बीच संबंध को “लव जिहाद” का नाम दे दिया गया है. आए दिन ईसाई नन और पादरियों पर हमले हो रहे हैं. असहमति रखने वाले लोगों को देशद्रोही बताया जा रहा है. खुद प्रधानमंत्री अपने भाषणों में ऐसे लोगों के लिए “अर्बन नक्सल” का इस्तेमाल करते हैं.

अपनी पिछली सरकार की तमाम विफलताओं के बावजूद भी 2019 में भाजपा ने बहुमत हासिल किया. इस पार्टी के लोग समझने लगे कि अब हिन्दू राष्ट्र बनाने का समय आ गया है. इसी कारण इन्होंने कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाया. कोर्ट ने भी अयोध्या में राम मंदिर बनाने का फ़ैसला देकर आरएसएस के पुराने एजेंडे को पूरा किया.

इसी कड़ी में सरकार दिसंबर 2019  में नागरिकता संशोधन क़ानून लेकर आई. इस क़ानून में पहली बार धर्म को नागरिकता का आधार बनाया गया और सिर्फ मुसलमानों को इससे वंचित रखा गया.

अपने ऊपर होने वाले तमाम हमलों और गतिरोधों के बावजूद भारत का संविधान अभी तक बचता आ रहा था. मई 2019 में नरेन्द्र मोदी सरकार की वापसी के बाद संविधान पर होने वाले हमले और तेज हो गए हैं.

नागरिकता संशोधन क़ानून लागू होने के बाद भारत का संवैधानिक ढांचा ध्वस्त हो जाएगा. हमें इस बात पर जरा भी संदेह नहीं होना चाहिए. इस क़ानून संविधान की आत्मा को मटियामेट करेगा और उस मलबे से जो एक नया भारत बनेगा वह बहुसंख्यकवाद, बाहुबल और अल्पसंख्यकों के लिए अमानवीयता पर आधारित होगा.

इस क़ानून में इस बहस पर जोर है कि असली भारतीय कौन हैं और किन शर्तों पर? नागरिकता किसी भी अधिकार की सबसे बुनियादी शर्त है. इस देश में किसके पास अधिकार होने चाहिए और किसके अधिकारों पर रोक लगाए जाने की जरूरत है, यह तय कैसे होगा? 

इन सवालों के जवाब हमारे संविधान के भीतर मौजूद है. संविधान का केंद्रीय आधार था कि भारत की नागरिकता कभी भी किसी की धार्मिक पहचान से तय नहीं होगी. भारत पर जितना अधिकार यहां के हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों और जैनों का है उतना ही अधिकार मुसलमानों, ईसाईयों और पारसियों का भी है. 

अधिकार और धर्म के नाम पर राजनीति के सवाल ने देश का बंटवारा किया. मुस्लिम लीग धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकता की वकालत करती थी, जिसकी वजह से भारत दो भागों में बंटा. वी डी सावरकर भी धर्म के आधार पर दो राष्ट्र के सिद्धांत को समर्थन देते थे. लेकिन, संविधान सभा ने हमेशा उस विचार को ख़ारिज़ किया, जो बताने की कोशिश करता था कि भारत पर सिर्फ यहां के हिन्दुओं का अधिकार है. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ” हम उन सभी लोगों को भारतीय मानते हैं जो खुद को भारत का नागरिक कहते हैं.”

नागरिकता संशोधन क़ानून लाकर भाजपा सरकार ने बंटवारे के पुराने जख़्म, डर, चिंता और नफ़रतों को फिर से ताजा कर दिया है. यह क़ानून धार्मिक आधार पर नागरिकता देकर दो राष्ट्र के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है.

सरकार की दलील है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में उत्पीड़न के शिकार धार्मिक अल्पसंख्यकों को शरण देने के लिए यह क़ानून लाया गया है. अगर सरकार की मंशा सच में यही है तो पाकिस्तान के अहमदिया समुदाय के लोग भी कम पीड़ित नहीं हैं. उन्हें तो मसजिद में नमाज़ पढ़ने पर जान से मार दिया जाता है. म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहिंग्या भी तो शोषण झेल रहे हैं और चीन के उईगर मुसलमानों पर भी अत्याचार हो रहे हैं. इस आधार पर तो इन सभी अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जानी चाहिए.

1987 से पहले उन सभी लोगों को भारत का नागरिक माना जाता था, जिनका जन्म भारत में हुआ हो. इसके बाद बांग्लादेश से हो रहे अवैध घुसपैठ के नाम पर आंदोलन तेज हुए. तब भारत ने नागरिकता संबंधी नियम में एक बदलाव किए. नए नियम में कहा गया कि नागरिकता के लिए शर्त होगी कि आवेदक के माता-पिता में से कम से कम कोई एक भारत का नागरिक हो. 2003 में एक और संशोधन हुआ. इस संशोधन के मुताबिक मां-बाप में से कोई एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा भारत में अवैध तरीके से नहीं रह रहा हो.

इस संशोधन के बाद घुसपैठियों को पहचानने के लिए नेशनल रजिस्टर फॉर इंडियन सिटिजन्स तैयार करने की पहल शुरू हुई. नियम बनाए गए कि पहले नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर तैयार किया जाएगा और फिर सरकार इस रजिस्टर से “संदिग्ध” लोगों की पहचान करेगी. और तो और यहां आम लोगों को भी छूट दी गई कि वे “संदिग्ध” लोगों की पहचान करें. हम सबको पता है कि ऐसी छूट मिलने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लाखों कार्यकर्ता किसको “संदिग्ध” बताने में जुट जाएंगे.

नागरिकता संशोधन क़ानून राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी का अगुआ है. इसे लाकर सरकार यह बताना चाहती है कि ग़ैर-मुस्लिम किसी भी समुदाय के लोगों को दस्तावेज़ ना होने पर भी शरणार्थी माना जाएगा और भारत की नागरिकता दी जाएगी. इसका मतलब है कि नागरिकता संशोधन क़ानून के बाद एनआरसी लागू करके सरकार मुसलमानों के ऊपर नागरिकता साबित करने का दबाव डालना चाहती है. हिन्दुस्तान में बहुत सारे लोग होंगे जिनके लिए नागरिकता संबंधी दस्तावेज़ जमा कराना असंभव है, लेकिन सिर्फ मुसलमानों को ही डिटेंशन सेंटरों में रखा जाएगा और उनके अधिकारों को छीन लिया जाएगा.

समानता और धर्म निरपेक्षता की बिनाह पर बने इस देश में अगर किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकता से महरूम किया जा रहा है तो समझना चाहिए कि एक धर्म-निरपेक्ष देश के रूप में भारत का ख़ात्मा हो रहा है. 

लेकिन, इन सबके बावजूद भी सरकार की इन ज्यादतियों के ख़िलाफ़ जो स्वत: स्फूर्त आंदोलन देश में शुरू हुआ है, वह उम्मीद बढ़ाने वाला है. भारतीय गणतंत्र के इतिहास में नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ सभी धर्म के लोगों की एकजुटता याद रखी जाएगी. काफी लंबे समय से देश ने धर्म-निरपेक्षता और बंधुता को बचाने के लिए इस तरह की लड़ाई नहीं देखी थी. घृणा और नफ़रत की राजनीति से प्रेरित पुलिस जिन लोगों के साथ बर्बरता दिखा रही है, उनके समर्थन में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, उन्हें उम्मीद दिखा रहे हैं और भारत की धर्म निरपेक्षता के लिए आश्वस्त कर रहे हैं.

मौजूदा सरकार इस प्रदर्शन को सांप्रदायिक रंग देने की पूरी कोशिश कर रही है. लोगों के भीतर इन प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ ग़लत सूचनाएं पहुंचाई जा रही हैं. पुलिस के प्रयोग से इन प्रदर्शनों को दबाया जा रहा है. लेकिन, इस समय सरकार का कोई भी हथकंडा काम नहीं आ रहा. पुलिस ने मुस्लिम छात्रों की बहुलता वाले जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पर ज्यादती की तो बड़ी संख्या में लोगों ने इन छात्रों का साथ दिया. कंपकपाती ठंड में इन छात्रों के समर्थन में लोग दिल्ली के सड़कों पर उतरे और छात्रों के नहीं रिहा किए जाने तक पुलिस मुख्यालय और विभिन्न थानों पर डटे रहे. देश के 50 से अधिक विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों ने जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों का साथ दिया. कई वकील भी छात्रों की मदद करने के लिए पुलिस थाने के बाहर रात भर खड़े रहे.

प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनकारियों पर तंज कसे. उन्होंने कहा कि प्रदर्शन करने वाले लोगों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है. प्रधानमंत्री का इशारा सीधे तौर पर मुसलमानों की ओर था. इसके बाद अलग-अलग धर्म के लोगों ने प्रधानमंत्री के इस बयान का भी जवाब दिया. प्रदर्शनों में पुरुष टोपी लगाकर और महिलाएं हिज़ाब लगा कर गईं. हाथों में तिरंगा लहराते हुए इन्होंने देश के मुस्लिम भाई-बहनों के साथ कदम से कदम मिलाया. युवाओं ने प्लेकार्ड्स पर मजाकिया स्लोगन और गाने लिखे. सरकार की नफ़रत भरी नीति का जवाब छात्रों ने प्रेम और अहिंसा के साथ दिया. यही हमारे देश की पहचान है.

हाल के कुछ सालों में यह पहली बार है जब मेरे भीतर का आशावाद बढ़ा है. मेरा अपना राजनीतिक मत प्रेम और भाईचारे को मानता है. मैं यह मानता रहा हूँ कि नफ़रत और सांप्रदायिकता पर प्रेम और धर्म निरपेक्षता की जीत होगी. लेकिन, कारवां-ए-मोहब्बत की अपनी यात्राओं के दौरान हमने पाया कि देश के युवा सांप्रदायिक घृणा से इतने भर गए हैं कि दिनदहाड़े मुसलमानों-दलितों को मारा-जलाया जाता है और भीड़ में शामिल लोग इस वारदात का वीडियो बनाते हैं. ये लोग बाद में इसे सोशल मीडिया पर डालकर अपनी बहादुरी दिखाने की कोशिश करते हैं. भीड़ से कोई भी शख़्स लिंचिंग के शिकार लोगों को बचाने नहीं आता  है. पुलिस भी इस हत्यारी भीड़ का मनोबल बढ़ाती है और पीड़ितों पर ही मुक़दमे लाद देती है. भाजपा ने मुसलमानों को अलग-थलग करके बाकी सभी कौमों का ध्रुवीकरण कर दिया है. मुझे इस बात की चिंता रही थी कि भारत एक ऐसे अंधेरे की चपेट में चला गया है जहां से उसका आना संभव नहीं है. लेकिन, हालिया प्रदर्शनों में जिस तरह हिन्दू और मुसलमानों की एकता देखने को मिली है, वह उत्साहित करने वाली है. मुझे विश्वास है कि देश के करोड़ों लोगों के भीतर फिर से उम्मीद जगी है.

आज से 100 साल पहले महात्मा गांधी ने भी इसी भावना के साथ एक लड़ाई शुरू की थी. दक्षिण अफ्रीका से आने के बाद गांधीजी भारत के आज़ादी की लड़ाई के अगुआ बने. उन्होंने एक ऐसे देश की कल्पना की, जहां नागरिकों के धर्म या पहचान के आधार पर उनसे भेदभाव नहीं की जाएगी. भारत को लेकर  हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि कुछ और थी. ये लोग इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते थे, जहां धार्मिक अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाएगा. मुस्लिम लीग का भी मानना था कि मुसलमानों को जब तक अलग देश नहीं मिल जाता तब तक उनका विकास नहीं होगा. आज जो लोग सत्ता में हैं, ऐसा लगता है कि उनका भरोसा गांधीजी से ज्यादा जिन्ना में है. वे गांधीजी को ग़लत और सावरकर-जिन्ना को सही साबित करना चाहते हैं.

सरकार के समर्थक मानते हैं कि देश के बंटवारे का काम अधूरा रह गया है, जिसे नए नागरिकता क़ानून और एनपीआर के जरिए पूरा किया जाएगा. हिन्दुत्व वादी संगठनों का मानना है कि बंटवारे का असल उद्देश्य तब पूरा होगा जब भारत के मुसलमानों को पाकिस्तान या बांग्लादेश भेज दिया जाएगा और वहां रह रहे हिन्दुओं को भारत लाया जाएगा. उनका मानना है कि मुस्लिम बहुल देशों और यहां तक कि कश्मीर में भी हिन्दू सुरक्षित नहीं हैं. वे भारत के मुसलमानों को हिंसक, बर्बर और देश के लिए ख़तरा मानते हैं. उन्हें मुसलमानों के साथ हो रही ज्यादती दिखाई नहीं देती.

जैसा कि मैंने पहले ही लिखा है, 2019 के चुनाव के बाद से देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की पहल शुरू की जा चुकी है. ऐसा लगता है कि लगभग सभी पार्टियों, सिविल सेवा के लोगों, न्यायपालिका, विश्वविद्यालयों और मीडिया ने भी इस मंशा को स्वीकार कर लिया है. देश के धर्म निरपेक्ष संविधान को तो नहीं बदला गया है पर वास्तव में इसकी आत्मा ख़त्म कर दी गई है.

लेकिन, इस स्याह रात में भी मुझे उम्मीद की किरण दिखाई देती है. पिछले कुछ हफ़्तों से मैं देशभर के कई प्रदर्शनों में बोलता रहा हूँ. नफ़रत के ख़िलाफ़ जिस तरह देश के युवा एकजुट हुए हैं, वह दिल को भरने वाला है. ऐसा लगता है कि ये सभी युवा आज़ादी की दूसरी लड़ाई लड़ रहे हैं.

इन सभी प्रदर्शनों में देखा जा सकता है कि मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम समुदाय के लोग एक साथ तिरंगा लहराते हुए खड़े हैं और आज़ादी के नारे लगा रहे हैं. देश के मुसलमानों को लगा है कि वे अकेले नही्ं हैं और लाखों लोग देश में अभी भी हैं जो इन विभाजनकारी नीतियों के ख़िलाफ़ हैं. यह देश अब भी गांधी और आंबेडकर का ही है. देशभर के प्रदर्शनों में तीन चीजों को आदर्श रखा गया है- तिरंगा, राष्ट्रगान और संविधान की प्रस्तावना. इन सभी प्रतीकों से भारत फिर से अपने मोहब्बत की पहचान को पा रहा है. इनके द्वारा बताया जा रहा है कि हमें किसी से भी नफ़रत नहीं करनी है और असली मानवता प्रेम पर ही टिकी हुई है.

इन प्रदर्शनों में लगे पोस्टरों पर भाईचारे का संदेश काफी रचनात्मक तरीके से लिखा होता है. एक पोस्टर पर लिखा था- “तुम तोड़ोगे हम जोड़ेंगे.” कपड़े से पहचानने वाले प्रधानमंत्री के बयान के विरोध में केरल में कैरोल गाने वाली महिलाओं ने हिजाब डालकर कैरोल गाया. जबलपुर से दिल्ली आए एक शख़्स ने बॉक्सर पैंट पहन कर प्रदर्शन किया और प्रधानमंत्री से कहा कि उसे कपड़ों से पहचानें. जामिया में छात्रों ने क्रिसमस के दिन सैंटा टोपी पहनकर प्रदर्शन किया. लोगों ने पोस्टरों के साथ-साथ अपने हाथों पर भी “नो टू सीएए एनआरसी एनपीआर” गुदवाया है. टिंडर जैसी डेटिंग साइट का इस्तेमाल भी प्रदर्शनों के बारे में सूचना देने के लिए किया जा रहा है.

इन प्रदर्शनों में फासीवादी विरोधी पोस्टर भी दिख रहे हैं. साथ ही नाजी जर्मनी बनते भारत को लेकर चिंता जताई जा रही है. लेकिन, हमें यहां ध्यान रखना होगा कि भारत में बहुत कुछ है जो नाजी जर्मनी में संभव नहीं हो पाया. जर्मनी में कहीं भी ग़ैर-यहूदी लोग यहूदियों के समर्थन में सामने नहीं आए. आज जिस तरह से भारत के कई राज्यों ने एनआरसी लागू करने से इनकार कर दिया है, वह भी नाजी जर्मनी में नहीं देखा गया था. 

नागरिकता संशोधन क़ानून और विश्वविद्यालयों पर हमले के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों का अंजाम चाहे जो हो, लेकिन एक बात अब साफ हो गई है कि हिन्दू राष्ट्र के विचार को निर्विरोध तरीके से नहीं थोपा जा सकता. अलग-अलग समुदाय यहां तक कि हिन्दू भी विभाजनकारी हिन्दुत्व की विचारधारा के ख़िलाफ़ खड़े हुए है. भारत के आज़ादी की लड़ाई जिस धर्म निरपेक्षता और भाईचारे की बुनियाद पर लड़ी गई, उसे बचाने के लिए आज भी करोड़ों लोग सामने हैं. 

महात्मा गांधी को निश्चित तौर पर यही विचार और भारत स्वीकार होता.

(हर्ष मंदर पूर्व आइएएस अधिकारी और जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में द इंडिया फोरम में प्रकाशित है. इसका हिन्दी अनुवाद कारवां मीडिया टीम के अभिनव प्रकाश ने किया है.)

 

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