कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

महात्मा गांधी को मुख़्तलिफ़ निगाहों से देखती सात औरतें

बेशक गांधी की शारीरिक बनावट साधारण रही हो मगर महादेवी वर्मा की यह रचना सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे गांधी के पास असाधारण शक्तियां थीं।

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां रंगमंच पर कंटेंट की जगह रंगबिरंगी लाइटें, भारी भरकम सेट और दूसरी कम जरूरी चीजों पर ज्यादा ध्यान रहता है। रंगमंच से अच्छा कंटेंट कब का बेदखल हो चुका है। रंगमंच की इस मशीनी चकाचौंध से सब कुछ हमारी अपेक्षाओं के विपरीत ही दिखाई पड़ता है। कलाकारों की आवाज़ों से ज्यादा मशीनों से निकली हुई आवाज़ें दर्शकों के कानों तक पहुंच रही होती है।

इसी मशीनी रंगमंच के दौर से बगावत कर छह महिला कलाकार 8 अक्टूबर को दिल्ली के जवाहर भवन में नए तरह की प्रस्तुति देकर गांधी को औरतों के नज़रिए से देखती हैं। उनकी प्रस्तुति का नाम है “हर क़तरा तूफ़ान, जिसमें चमचमाती लाइटों और ऊंची आवाज़ की कृत्रिम ध्वनियों के बग़ैर छह औरतें स्टेज़ पर खड़ी हैं। महिलाएं अपनी प्रस्तुति की शुरुआत से पहले गांधी को मिले प्यार और नफ़रत के बारे में बताने के साथ-साथ अपनी प्रस्तुति की विषयवस्तु का ज़िक्र भी करती हैं। जिसमें ये छह औरतें गांधी के समकालीन इतिहास के पिटारे से उन सात औरतों की आवाज़ें लेकर आई हैं, जो मुख़्तलिफ़ निगाह से गांधी को देख रही हैं। इनमें सरोजिनी नायडू, महादेवी वर्मा, इस्मत चुग़तई, ताज साहिबा लाहौरी हैं तो ऐनी मेरी पीटरसन, एलेन होरुप और इमा टार्लो भी।

प्रस्तुति की शुरुआत महादेवी वर्मा द्वारा लिखे गए ‘पुण्य स्मरण’ से होती है। हॉल में बैठे लोग बड़े विचलित थे, मगर जैसे ही स्टेज से इसे पढ़ा जाता है लोग एकदम उस खूबसूरत आवाज़ के साथ चिपक जाते हैं। ऐसा मालूम हो रहा था जैसे महादेवी वर्मा खुद ज़िंदा होकर लोगों को गांधी का किस्सा कह रही हों। बेशक गांधी की शारीरिक बनावट साधारण रही हो मगर महादेवी वर्मा की यह रचना सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे गांधी के पास असाधारण शक्तियां रही हों। महादेवी वर्मा का संस्मरण खत्म होने के बाद नृतत्त्वशास्त्री इमा टार्लो के लेख के अनूदित अंश को पढ़ा गया जिसमें गांधी की वेशभूषा के सफ़र का जिक्र है। इसे सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे गांधी खुद सूत कातते हुए हिंदुस्तान के लोगों को बराबरी और उनकी महानता का पाठ पढ़ा रहे हों।

सरोजिनी नायडू के पत्र से गांधी और सरोजिनी के रिश्तों के साथ साथ गांधी के अवाम के साथ रिश्ते के बारे में भी पता लगा। इस प्रस्तुति से पता चला कि डेनिश शिक्षाशास्त्री ऐनी मेरी पीटरसन को गाँधी में महान शिक्षाविद् और आध्यात्मिक नेता दिखाई देते थे जबकि डेनमार्क की ही पत्रकार एलेन होरुप को गांधी में शांति का मसीहा। ताज साहिबा लाहौरी ने गांधी के चरखा को “समय की व्हील” के रूप में देखा और औरतों को चरखा चलाकर आज़ादी की मुहिम में शामिल होने को कहा और चरखे से, औरतों की अपनी मेहनत के बल पर मुल्क में कपड़ों की कमी को भी दूर करने की बात कही। इस्मत चुग़ताई की रचना ने गांधी की मृत्यु के बाद बाद कठिन रास्तों पर चल रहे भारत के ऊपर एक नज़र पेश की।

इस्मत की रचना ‘कच्चे धागे’ इस प्रस्तुति का आखिरी हिस्सा था। यह सिलसिला जैसे ही खत्म होता है गांधी में खोए हुए दर्शक बाहर आते हैं और तालियां बजनी शुरू होती हैं। ऐसा लग रहा था जैसे इन्हें गांधी का कोई दूसरा जन्म या रूप जानने को मिला हो। गांधी को इस नए रूप में उतारने का श्रेय ‘हर कतरा तूफ़ान’ के डायरेक्टर विनोद कुमार और स्क्रिप्ट तैयार करनेवाली पूर्वा भारद्वाज को जाता है। मंच पर प्रस्तुति को जीवंत करने का श्रेय अलका रंजन, श्वेता त्रिपाठी, रिज़वाना फ़ातिमा, पूर्वा भारद्वाज, रश्मि सिन्हा और वंदना राग को जाता है। काफी देर तक बजी दर्शकों की तालियां इस बात का सबूत थीं कि गांधी को औरतों के नज़रिए से देखने का यह सिलसिला मुक्कमल हुआ है। तालियां बजनी बंद हुईं तो एक बुजुर्ग बोल उठते हैं, “लेख और पत्र पढ़ने का यह सिलसिला थमना नहीं चाहिए। इसे और लोगों तक पहुंचाया जाए।”

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