कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

महात्मा गांधी की ताबीज़ और बिहार के एक प्रवासी मजदूर की मॉब लिंचिंग

हमने धन और नफ़रत के नशे के कारण गांधी जी के वो ताबीज़ खो दिए हैं. मैं सोचता हूं कि वो ताबीज़ फिर से वापस पाने में हमारी कितनी पीढ़ियां गुजर जाएंगी?

अपनी हत्या से कुछ महीने पहले महात्मा गांधी हम भारतीयों के लिए एक ताबीज़ छोड़ गए. उन्होंने कहा, “जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्‍वार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो. उस सबसे कमजोर या निरीह आदमी को याद करो जिसे तुमने अपने पूरे जीवन में देखा हो और देखो कि जो क़दम तुम उठाने जा रहे हो क्या उससे उस ग़रीब आदमी का कुछ भला हो सकता है?”

आगे गांधीजी ने इन बातों को और विस्तार से समझाया: “क्या उस ग़रीब आदमी को इससे कुछ फ़ायदा होगा? क्या तुम्हारे इस क़दम से वह आदमी आत्मनिर्भर हो सकेगा? दूसरे शब्दों में कहें तो क्या तुम्हारा फ़ैसला भूख से मर रहे करोड़ों लोगों के लिए स्वराज ला सकेगा?

गांधीजी कहते हैं कि तब तुम पाओगे कि तुम्हारी सारी शंकाएं और स्वार्थ पिघल कर खत्म हो गए हैं.

गांधीजी का यह सतरंगी ज्ञान और मानवता से ओत-प्रोत नैतिक बातें कालजयी हैं. इसके बावजूद गांधीजी को इस सबक में “सबसे कमज़ोर आदमी” की जगह “सबसे कमजोर औरत” का इस्तेमाल करना चाहिए था, क्योंकि सच्चाई यह है कि हमारे समाज की सबसे पीड़ित या कमजोर इकाई औरतें या लड़कियां हैं. आज गांधीजी की बातें इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि आज के भारत में कुछ लोगों के पास अकूत संपत्ति है तो कुछ लोग गरीबी और भुखमरी की विकट स्थिति को झेलने पर मजबूर हैं. इसके साथ-साथ देश के करोड़ों लोग लगातार फैलते नफ़रत के माहौल में जी रहे हैं.

इसलिए यह जरूरी था कि जब पूरा देश गांधी जयंती का 150वां साल मना रहा हो, हम एक ऐसी महिला से मिलें जो गांधीजी द्वारा दिए गए मानकों को पूरा करती हो. 2 अक्टूबर 2019 को हमने अपने जीवन की सबसे ग़रीब और निरीह महिला से मुलाकात की. यह महिला थीं रुधि देवी. रुधि विधवा हैं और उसके पास ना अपना घर है ना जमीन. पटना से करीब 1 घंटे की दूरी तय करके हम रुधि देवी के गांव मिसरपुरा पहुंचे. यह गांव फुलवारी शरीफ के नौबतपुर इलाके में है. हमें जानकारी मिली थी कि बीते 10 अगस्त को रुधि देवी के पति कृष्णा मांझी की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई है.

रुधि के छ: बच्चे बड़ी-बड़ी आंखें लिए हमारे सामने खड़े थे. इन बच्चों के शरीर के सांवलेपन ने इनके कुपोषण को ढक दिया था. रुधि के सिर पर उनके बीमार ससुर के देखरेख की जिम्मेदारी भी थी.

रुधि देवी के पास घर के नाम पर मिट्टी की बनी एक झोपड़ी मात्र थी. इस झोपड़ी के छत पर प्लास्टिक लपेटा हुआ था. लेकिन, रुधि देवी को सबसे निरीह साबित करने वाली बात यह थी कि उनकी झोपड़ी जिस जमीन पर थी उसका मालिक भी कोई और था. यह ज़मीन गांव के एक भूमिहार की है. इस छोटी सी ज़मीन के बदले रुधि देवी उक्त भूमिहार के यहां बंधुआ मजदूर के तौर पर काम करती हैं.

रुधि को जमीन मालिक के घर का सारा काम करना पड़ता है, जिसके बदले कोई मजदूरी नहीं मिलती. मेहनताने के नाम पर बस खाने के लिए कुछ अन्न दे दिया जाता है. मालिक के यहां काम करने के बाद जो कुछ थोड़ा समय मिल पाता है, रुधि देवी उस खाली समय में दूसरों के खेतों में काम करती हैं. इस तरह के काम की कोई गारंटी नहीं होती और गांव में इसके एवज में मेहनताना भी उचित दर पर नहीं मिलता.

परिवार की छोटी-मोटी कमाई का एकमात्र साधन रुधि देवी के पति कृष्णा मांझी थे. काम की तलाश में कृष्णा मांझी ज्यादातर समय दूसरे राज्य में ही रहा करते. एक बार घर से दूर जाने के बाद उनके परिवार को उनकी कोई ख़बर नहीं रहती थी. परिवार को यह भी नहीं मालूम होता था कि अब वे वापस कब आएंगे. परिवार की हालत इतनी दयनीय थी कि सबसे सस्ता मोबाइल फोन भी उनके पास नहीं था.

इस बार कृष्णा मांझी को गए बहुत दिन हो गए थे और पिछले कुछ महीनों से उनकी कोई खोज ख़बर नहीं लग रही थी. परेशान होने के बावजूद भी परिवार के लोग असहाय थे. उनके पास कृष्णा से संपर्क करने का कोई साधन नहीं था. उन्हें यह भी पता नहीं था कि कृष्णा मांझी जिंदा भी हैं या मर चुके हैं.

दुखद समाचार

बीते अगस्त महीने में गांव के कुछ लोग रुधि देवी के घर आए और बताया कि शायद कृष्णा मांझी की हत्या हो गई है. एक लावारिस शव मिला है, जिसके हाथ पर कृष्णा मांझी लिखा है. इस ख़बर को सुनते ही रुधि देवी अपने ससुर के साथ स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र पहुंचीं. वहां कुछ लावारिस शवों के बीच कृष्णा मांझी का शव भी पड़ा हुआ था. भीड़ ने कृष्णा मांझी के साथ ऐसी बर्बरता की थी कि उनका चेहरा भी पहचान में नहीं आ रहा था. लेकिन, हाथ पर “कृष्णा मांझी” लिखे होने के कारण शव को रुधि ने पहचान लिया. पहचान की पुष्टि के लिए कृष्णा मांझी के होठों को हटाकर उसके टूटे हुए दांत रुधि ने देखे. अब साबित हो चुका था कि लाश कृष्णा मांझी की ही है.

शव की शिनाख़्त हो जाने के बाद रुधि देवी के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि उसे अपने घर लाकर अंतिम संस्कार कर सके. दुखद बात यह है कि इस घटना के बाद रुधि के घर किसी भी सरकारी अधिकारी ने मुआयना तक नहीं किया. रुधि खुद से जितना कर सकती थी, किया.

कृष्णा मांझी के साथी मजदूरों के माध्यम से रुधि देवी के परिवार ने इस हादसे को समझने की कोशिश की.  पता चला कि कृष्णा मांझी चेन्नई में थे. यह स्पष्ट नहीं है कि वहां वो किसी निर्माण कार्य की साइट पर काम कर रहे थे या ईंट भट्ठे में. लेकिन, कृष्णा मांझी सेमी-बॉन्डेज श्रमिक के तौर पर काम करते थे. बहुत से देशों में निर्माण कार्य और ईंट भट्ठे में इसी प्रणाली पर मजदूर रखे जाते हैं.

इसमें नियोक्ता अपने मजदूरों से घंटो-घंटों तक कड़ी मेहनत कराते हैं और उनका मेहनताना महीना पूरा होने के बाद ही देते हैं ताकि मजदूर बीच में ही काम छोड़कर ना भागें. इसलिए कृष्णा मांझी इस बार अपने घर पर कोई पैसा नहीं भेज सके थे. काम के तरीके से निराश और परेशान कृष्णा मांझी एक दिन काम छोड़कर भाग निकले. तब उन्होंने अपना मेहनताना भी नहीं लिया था, जिसके कारण उनके हाथ बिल्कुल खाली थे.

यह तय है कि कृष्णा मांझी ने चेन्नई से पटना की यात्रा भूखे पेट और बेटिकट ही तय की होगी. पटना रेलवे स्टेशन से उनके गांव मिसरपुरा जाने का किराया बमुश्किल 20 रुपया है, लेकिन उनके किराए के लिए 20 रुपए भी नहीं थे. पैदल चलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. हाइवे पर लंबी दूरी तय करने की बजाय कृष्णा मांझी ने दूसरे गांवों से गुजरने वाला एक शॉर्टकट रास्ता अपनाया. जब वे मोहम्मदपुर गांव से होकर गुजर रहे थे तभी कुछ लोगों ने बच्चा चोर समझकर उन्हें पकड़ लिया. उनके पास कोई आईडी कार्ड या दस्तावेज भी नहीं था, जिससे वो अपनी पहचान साबित करते. कृष्णा मांझी के गांव के लोगों ने हमें बताया कि वे दिमागी रूप से थोड़ा सुस्त थे. बच्चा चोर समझकर भीड़ कृष्णा मांझी के ऊपर टूट पड़ी. लोगों ने इतनी बेरहमी से मारा कि मौके पर ही उनकी मौत हो गई.

सरकारी उदासीनता

मिसरपुरा के लोगों ने हमें बताया कि पुलिस ने कृष्णा मांझी के ऊपर हमला करने वाले 27 लोगों के ऊपर मुक़दमा दर्ज किया है. उनके मुताबिक पुलिस ने इस केस में अभी तक आगे की कोई भी कार्रवाई नहीं की है. किसी भी पुलिस अधिकारी या नेता ने अभी तक पीड़ित परिवार से मुलाकात तक नहीं किया है.

हमसे बात करते समय रुधि देवी गहरे सदमे में थीं. उन्हें इस बात की चिंता थी कि अब परिवार का गुजारा कैसे चलेगा. हमारे देश में कई कानून और सरकारी योजनाएं हैं, जो इस कठिन परिस्थिति में रुधि देवी की सहायता कर सकते हैं. लेकिन, हर परिवार को आवास देने वाली योजना सिर्फ कागजों पर है. इसी तरह बंधुआ मजदूरी रोकने के लिए बना कानून, रोजगार की गारंटी देने वाली योजना, विधवा पेंशन, बच्चों की शिक्षा, सबसे गरीब परिवार को मुफ़्त राशन देने की योजना भी रुधि देवी के मामले में धाराशायी हैं.

एक अंतहीन अंधेरा ही रुधि देवी के जीवन का सबसे बड़ा सच है.

उपसंहार

कारवां-ए-मोहब्बत की टीम में शामिल हम सभी लोगों को रुधि देवी से हुई मुलाकात ने झकझोर दिया था. कारवां के सदस्यों ने आपस में कुछ पैसे इकट्ठा किए और चुपके से रुधि को थमा दिया. रुधि देवी ने पैसा लेने से इनकार नहीं किया. लेकिन, हम जानते हैं कि इस परिवार के लिए यह पैसा महज कुछ हफ़्ते के लिए ही मददगार साबित हो सकता है.

कारवां-ए-मोहब्बत के दो स्वयंसेवकों अनवर-उल-हक और बिहार कैडर के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एमए इब्राहिमी ने तय किया कि जब तक प्रशासन की ओर से रुधि देवी के परिवार को हरसंभव मदद का ठोस आश्वासन नहीं मिलता है, तब तक वे लोग चैन की सांस नहीं लेंगे.

इसके लिए वे लोग सबसे पहले पालीगंज के अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) से मिले. पालीगंज के एसडीओ से कृष्णा मांझी की लिंचिंग और परिवार की मौजूदा स्थिति के बारे में बात की गई. बताया गया कि लिंचिंग के दो महीने बीत जाने के बाद भी किसी सरकारी अधिकारी ने दौरा या पीड़ित परिवार को मदद मुहैया नहीं कराई है. एसडीओ ने कहा कि वह इस मामले में कोई सहायता नहीं कर सकते हैं ,क्योंकि जिस गांव (मोहम्मदपुर) में कृष्णा मांझी की लिंचिंग हुई, वह दानापुर अनुमंडल के अधीन आता है.

इसके बाद कारवां के हमारे साथियों ने दानापुर एसडीओ से मुलाकात की. वहां मौजूद अधिकारी ने भी बड़े धैर्यपूर्वक कारवां के लोगों की बात सुनी और कहा कि वे भी इस मामले में कोई सहायता नहीं कर सकते क्योंकि कृष्णा मांझी का गांव मिसरपुरा दुल्हिन बाजार प्रखंड के अंतर्गत आता है और दुल्हिन बाजार प्रखंड पालीगंज अनुमंडल के अधीन है. इसलिए, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस मामले की जिम्मेदारी पालीगंज के एसडीओ की ही है.

अधिकारियों की इस टाल-मटोल के बाद कारवां के टीम ने पटना के जिला कल्याण पदाधिकारी और दुल्हिन बाजार के प्रखंड कल्याण पदाधिकारी से फोन पर बात की. हैरानी की बात है कि हमारी टीम के लोगों ने जितने भी अधिकारियों से बात की, किसी को भी इस घटना के बारे में जानकारी नहीं थी. जबकि कृष्णा मांझी की लिंचिंग वाली ख़बर स्थानीय अख़बारों में छपी थी और कई दिनों तक आसपास के इलाके में चर्चा का विषय भी बनी थी.

न्यूनतम मांग

आखिरकार दुल्हिन बाजार प्रखंड के कल्याण पदाधिकारी दीपक कुमार ने कहा कि वे कारवां के सदस्यों के साथ मिसरपुरा गांव जाकर कृष्णा मांझी के परिवार से मिलेंगे. शाम में कारवां की टीम और पंचायत के प्रतिनिधियों के साथ दीपक कुमार ने रुधि देवी से मुलाकात की. हमारे साथियों ने दीपक कुमार के सामने कुछ न्यूनतम मांगें रखीं, जो परिवार को तत्काल मुहैया कराया जाना था. ये मांगें थीं- (1) कबीर अंत्येष्टि योजना के तहत पीड़ित परिवार को 3000 रुपए की राशि. (2) अंत्योदय अन्न योजना के तहत रुधि देवी के परिवार को हर महीने मुफ़्त राशन (3) विधवा पेंशन (4) सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार लिंचिंग में मारे गए व्यक्ति के परिवार को दिया जाने वाला मुआवज़ा (5) कृष्णा मांझी के बच्चों को पास के आवासीय विद्यालय में पढ़ाई करने की सुविधा (6) इंदिरा आवास योजना के तहत रुधि देवी के नाम पर घर तथा (7) कृष्णा मांझी की लिंचिंग से जुड़े दस्तावेज़ रुधि देवी को तत्काल दिए जाएं जिससे वे न्यायालय में अपील कर सकें. यह मूलभूत जरूरत की लिस्ट थी.

हम इसके लिए संकल्पित हैं कि रुधि देवी और उनके परिवार को सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए सरकार की तरफ़ से कम से कम उपरोक्त सुविधाएं मुहैया कराई जाएं. लेकिन, हमारी पीड़ा बहुत गहरी है. हमें इस बात से गहरा दुख पहुंचा है कि जिन सरकारी अधिकारियों को ऐसे परिवारों की मदद के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, उन्होंने इस मामले में कोई क़दम नहीं उठाए. ना किसी राजनीतिक दल ने इस पीड़ित परिवार से मिलना जरूरी समझा और ना ही सहायता की पेशकश की. यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि अधिकारियों-नेताओं की नज़र में रुधि देवी, उनके पति कृष्णा मांझी और इस पूरे परिवार के जान की कीमत कितनी कम है.

रुधि देवी से हमारी मुलाकात के अगले दिन गांधी जयंती थी. गांधी जी की 150वीं जयंती के मौके पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए कारवां-ए-मोहब्बत की टीम अहमदाबाद में थी. यहां साबरमती आश्रम तक जाने वाली सभी सड़कें पूरी तरह से ठप थी क्योंकि शाम में प्रधानमंत्री मोदी का दौरा था. अहमदाबाद की सड़कें प्रधानमंत्री की तस्वीरों वाले पोस्टरों से पटी हुई थीं. किन्हीं पोस्टरों पर बापू के सामने देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी का हंसता हुआ चेहरा था तो किसी तस्वीर में मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को साथ में टहलते हुए दिखाया गया था.

लेकिन, इस दिन मेरी आंखों के सामने बार-बार रुधि देवी और उनके बच्चों का चेहरा ही तैर रहा था. वही निरीह और जरूरतमंद चेहरा, जिसे असमंजस और संशय की स्थिति में याद करने के लिए गांधी जी ने कहा था.

मैं उस ताबीज़ के बारे में भी सोच रहा था, जिसे महात्मा गांधी ने अपने जीवन के आख़िरी महीनों में हमें दिए थे. यह स्पष्ट है कि हमने अपने पैसों और नफ़रत के नशे के कारण गांधी जी के वो ताबीज़ खो दिए हैं. मैं सोचता हूं कि गांधी जी के वो ताबीज़ फिर से वापस पाने में हमारी कितनी पीढ़ियां गुजर जाएंगी?

लेखक जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. यह लेख स्क्रॉल डॉट इन के लिए अंग्रेजी में लिखा गया था, जिसका अनुवाद अभिनव प्रकाश ने किया है.

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