कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

मालेगांव बलास्ट: मुसलमान आदमी। कई सालों की कै़द। अंतहीन टॉर्चर। फिर बेगुनाह पाए जाना। उनकी कहानी। उनकी ज़ुबानी। (देखें विडियो)

कारवां-ए-मोहब्बत ने बलास्ट के आरोप में बंदी रहे मुसलमानों की दिल दहला देने वाली कहानी पेश की है.

भाजपा की ओर से भोपाल संसदीय सीट से साध्वी प्रज्ञा को उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद मालेगांव बम विस्फोट कांड एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया है. दरअसल, साध्वी प्रज्ञा 2008 में हुए मालेगांव धमाकों की आरोपी हैं और फिलहाल जमानत पर बाहर हैं.

मालेगांव बम विस्फोट में अब तक हुए जांच और कार्रवाइयों पर नज़र डालें तो इसमें निर्दोष व्यक्ति ही प्रताड़ित हुए हैं. इस बम कांड का असल मुजरिम कौन है और उसे कब सज़ा मिलेगी, यह सवाल गायब है.

इसी सवाल को लेकर कारवां-ए-मोहब्बत ने एक डॉक्यूमेंट्री रिलीज किया है. डॉक्यूमेंट्री में मालेगांव विस्फोट को लेकर एटीएस द्वारा गिरफ़्तार किए गए नौ बेगुनाहो की कहानियों को फ़िल्माया गया है. जिन्हें आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का झूठा आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया था.

दरअसल, 8 सितम्बर,2006 में मालेगांव में लगातार तीन बम बलास्ट किए गए थे. इसमें 40 लोग मारे गए, जिसमें से अधिकतर मुस्लिम थे. एटीएस ने मामले को लेकर नौ मुस्लिम लोगों को हिरासत में लिया. पांच सालों तक इन्हें जेल में रखा गया और तमाम तरह की यात्नाएँ दी गईं. फिर सबूतों के अभाव में इन्हें छोड़ दिया गया.

डॉक्यूमेंट्री बताती है कि यह कहानी- TERROR INNOCENTS की है. नूरुल हुदा बताते हैं कि एटीएस जुल्म कबूल करवाने के लिए जेल में बहुत यात्नाएं देती थी.

“48 दिनों तक उन्होंने जिस्म के पूरे कपड़े निकालकर, हमें उलटा लिटाकर पीछे और तलवे पर डंडे से पीटा ताकि मैं उनके बनाए गए समझौते पर दस्तख्त कर दे. हम उनकी प्लान को मान लें.”

नूरुल आगे बताते हैं कि जेल का अनुभव बहुत खौफनाक है. जेल के अफसर भी एटीएस और सीबीआई के कहने पर जुल्म किया करते थे. मानसिक उत्पीड़न किया जाता था. इसके लिए ग़ैर मुस्लिम कैदियों को काम पर लगाया जाता था. हमें धमकी भी दी जाती थी.”

नुरुल 2006 में गिरफ्तार हुए और फिर साढ़े पांच सालों तक बिना कोई गुनाह के ही जेल में रहें.

रईस अहमद रजाब अली,जो 2006 में बैटरी मैकेनिक का काम करते थे. कहते हैं, “बम बलास्ट केस में मुझे बेगुनाह फंसाया गया. मैं पार्टनरशिप पर बैटरी का कारखाना खोला था. बैटरी के साथ हमलोग प्लेट भी बनाते थे. एसपी उस दिन रात में आए थे. मैं अकेला था. उन्होंने बैटरी प्लेट को बम से जुड़ा बता दिया. बैटरी में यूज होने वाले मसाले को आरडीएक्स बता दिया. इस प्रकार मीडिया के सामने हमें आतंकवादी करार दिया गया.”

नूरुल बताते हैं कि” पुलिस अफ़सर ने ईद के दिन ही मुझे तो दो घंटे तक लगातार पीटा और  सभी से कहा कि देखो मैं मिल जुलकर ईद मना रहा हूं. ऐसे तो कोई जानवर को भी नहीं मारता.”

अहमद रजाब अली कहते हैं कि हमें लगता था कि हम किसी कट्टर हिंदूओं के बीच में है. कभी लगा ही नहीं कि हम एटीएस के बीज में है. वो लोग हमेशा यही कहते थे कि यहां क्यों रहते हो पाकिस्तान क्यों नहीं जाते. बस दिन भर मारते थे.

डॉ सलमान बताते हैं कि यह निर्दोष पर अटैक नहीं था बल्कि पूरे देश पर अटैक था. एटीएस ही एंटी नेशनल इलिमेंट्स है. बिना कोर्ट के आदेश के ही नार्को टेस्ट किया जाता है. यह गैर कानूनी था.”

एटीएस के जांच पर सवाल उठने के बाद जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा गया. 2008 में और दो बम धमाकों में एटीएस की जांच में ‘अभिनव भारत’ संस्था का नाम सामने आया. जिसमें स्वामी असीमानंद, कर्नल पुरोहित सहित साध्वी प्रज्ञा को गिरफ्तार किया गया. आज साध्वी प्रज्ञा जमानत लेकर बीजेपी के तरफ़ से लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं.

अली कहते हैं, “आज भी सरकार हमें अपना होने नहीं दिया है. स्वामी असीमानंद और अन्य आरोपी छुट्टी पर हैं. लेकिन उसे लेकर कोई अपील नहीं करता. लेकिन हम निर्दोष हैं. अदालत ने हमें छुट्टी दे दी..लेकिन सरकार आज भी हमारे बरी के ख़िलाफ़ अपील करती है.”

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