कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

ग्राउंड रिपोर्ट: 12 घंटे काम के बदले 120 रुपए का मानदेय और अधिकारियों द्वारा जलालत झेल रही बिहार की “ममता” कार्यकर्ता

अधिकतर ममता कार्यकर्ता पिछड़ी जातियों से ताल्लुक़ रखती हैं. वाजिब वेतन तो दूर, अस्पताल प्रशासन डरा-धमका कर इनसे झाड़ू-पोंछे का काम भी लेता है.

बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले का मुख्यालय है मोतिहारी. मोतिहारी से करीब 15 किलोमीटर दूर नेपाल सीमा के पास एक रेलवे स्टेशन है सगौली. रजिया देवी इसी सगौली स्टेशन से हर दिन 1 बजे ट्रेन पकड़ती हैं और मोतिहारी सदर अस्पताल में 2 बजे से रात के 10 बजे तक “ममता” के तौर पर  ड्यूटी करती हैं. रात 10 बजे निकलने के बाद वो फिर ट्रेन पकड़ती हैं और 11 बजे तक घर पहुंचती हैं.

रजिया देवी का कहना है, “मैं 12 साल से नौकरी कर रही हूं. लेकिन, आज तक हमलोगों का ना परिचय पत्र मिला है ना हमारा कोई पोशाक है. पोशाक की मांग करने पर अधिकारी लोग नौकरी से निकाल देने की धमकी देते हैं.”

रजिया देवी महदलित रविदास समाज से आती हैं. उनके पति चप्पल-जूते की सिलाई और मरम्मत करने का काम करते हैं. रजिया की शिकायत है कि पिछले तीन महीने से उनके मानदेय का भुगतान नहीं हुआ है. वे कहती हैं, “2007 से ही काम कर रही हूं. पहले एक बच्चे की देखभाल करने के लिए 55 रुपए मिलते थे. अब यह पैसा बढ़कर 300 रुपया हो गया है. लेकिन इसमें भी गड़बड़ी की जाती है. हमें मुश्किल से 3500-4000 रुपया महीने का मिल पाता है.”

रोज़ 12 घंटे काम करने के बदले में महीने के 4,000 रुपए — यह कहाँ का न्याय है?

कौन हैं ममता कार्यकर्ता?

ममता को राज्य सरकार द्वारा स्वैच्छिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता का दर्जा दिया गया है. बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और ओडिशा में अलग-अलग राज्यों में इनके नाम अलग-अलग हैं. मसलन उत्तर प्रदेश में इन्हें यशोदा के नाम से जाना जाता है.

ममता का काम प्रसव के समय मां और बच्चे की देखभाल करना, जरूरी सुझाव देना, तथा जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता फैलाने का है.

पूर्वी चम्पारण जिला सदर अस्पताल में कुल 42 ममता काम करती हैं. पूरे बिहार में करीब 6,000 कार्यकर्ता हैं.

इन्हें डिलिवरी के आधार पर मानदेय राशि दी जाती है. एक गर्भवती महिला की डिलिवरी कराने पर 300 रुपए मिलते हैं. महीने में एक ममता को लगभग 3,000 से 4,000 रुपए ही मिल पाते हैं. 2016 तक तो प्रत्येक डिलिवरी के लिए 100 रुपए ही मिलते थे.

स्वास्थ्य विभाग में ममता और आशा कार्यकर्ताओं को उनके काम के आधार पर ही प्रोत्साहन राशि दी जाती है. इन दोनों विभागों की महिलाओं की शिकायत रही है कि जितना काम वे करती हैं, उसके अनुसार वाजिब मेहनताना नहीं मिलता.

महीनों से नहीं मिल रहा मानदेय, हेरफेर का शिकार

9 साल से कार्यरत रम्भा देवी बताती हैं, “हमारे पैसे का हिसाब में गोलमाल किया जाता है. असल में देखा जाए तो हमें 9,000 रुपया मिलना चाहिए, लेकिन अस्पताल के क्लर्क बच्चों की संख्या इधर-उधर कर देते हैं, जिससे हमें 3,000-4,000 रुपया ही हर महीने मिल पाता है.”

रामपती देवी बताती हैं, “4 महीना से हमारा वेतन नहीं मिला है. पहले हॉस्पिटल के सर ने सेंट्रल बैंक (ऑफ इंडिया) राजाबाजार में एक खाता खुलवाया. अब कह रहे हैं कि जबतक दूसरे बैंक में खाता नहीं खुलवाओगी तब तक मानदेय वाला पैसा नहीं भेजा जाएगा.” हमारे पति मजदूरी करते हैं और हम शहर में किराए पर रूम लेकर रह रहे हैं, पैसा ना मिलने के कारण हमारे लिए गुजारा करना मुश्किल हो गया है.”

रम्भा देवी बताती हैं कि वेतन में हेराफेरी की शिकायत करने पर अस्पताल के अधिकारी गालियां देते हैं और नौकरी से निकाल देने की धमकी दी जाती है.

इस मुद्दे पर जानकारी के लिए सदर अस्पताल मोतिहारी के सिविल सर्जन डॉ. बी. के सिंह से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया ना ही अपने कार्यालय में मिले.

धमकियां देकर झाड़ूपोंछा और दाई का काम करवाया जाता है

पूर्वी चंपारण जिला ममता संघ की अध्यक्ष प्रभावती, जो 2009 से ममता के तौर पर काम कर रही हैं, बताती हैं, “ममता के काम में पिछड़ी जाति के औरतों की बहाली की गई है. अस्पताल के दूसरे कर्मचारी-अधिकारी हमारे लिए गालियों का इस्तेमाल करते हैं. हमारा काम धातृ महिला (जिस महिला ने नवजात को जन्म दिया हो) और नवजात की देखरेख करना और स्वास्थ्य के लिए उन्हें जागरूक करना है. लेकिन, अस्पताल की नर्स रत्ना घोष हमसे दाई का काम कराती हैं. औरतों का पैड बदलने का काम सरकारी दाई का होता है, लेकिन ये लोग धमकी देकर ये सारे काम हमसे करवाते हैं.”

अस्पताल में नाइट शिफ़्ट पर तैनात ममता कार्यकर्ता विभा देवी* बताती हैं, “हमसे ऑपरेशन थियेटर में काम कराया जाता है. हफ़्ते में एक रात आईसीयू में हमारी ड्यूटी लगाई जाती है. हमसे अधिकारी लोग पानी मंगवाते हैं. झाड़ू लगाने का दबाव बनाते हैं. और इन सब कामों के लिए कोई अलग पैसा नहीं मिलता है. हमारा शोषण हो रहा है. हम नौकरी खोने के डर से अपनी आवाज़ भी नहीं उठा सकते. हमारे लिए कुछ कीजिए सर.”

12 घंटे की नाइट शिफ़्ट लेकिन आराम करने के लिए एक कमरा भी नहीं 

प्रभावती देवी सदर अस्पताल में रात की ड्यूटी करती हैं. रात के 8 बजे से लेकर सुबह 8 बजे तक उन्हें अस्पताल में मरीजों के पास ही रहना पड़ता है. उनका कहना है कि रात में एक घंटे सुस्ताने के लिए एक छोटा सा रूम भी नहीं है. इन्हीं मरीज लोगों के बेड पर बैठकर उन्हें रात गुजारना पड़ता है. अस्पताल प्रशासन सुरक्षा और जरूरतों को लेकर बिल्कुल भी गंभीर नहीं है.

प्रभावती देवी

प्रभावती देवी का कहना है कि कम से कम एक कमरा तो होना ही चाहिए, जहां हमलोग एक घंटे आराम कर सके. रात की ड्यूटी करने वाली सभी ममता कार्यकर्ताओं की यही शिकायत है. बिहार के जिला मुख्यालयों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में नाइट शिफ़्ट की नौकरी करना खुद में एक बड़ा चैलेंज है. ऐसे में इन बेसिक सुविधाओं का अभाव होना चिंताजनक स्थिति दर्शाती है.

बिहार चिकित्सा जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के महामंत्री विश्वनाथ सिंह बताते हैं कि ममता कार्यकर्ताओं के पास ना परिचय पत्र है, ना उन्हें कोई पोशाक मिला है. इसके कारण कई बार बच्चा चोरी होने के बाद ममता पर आरोप लगता है और उनके साथ बदतमीज़ी की ख़बर भी सामने आती हैं.

प्रशासन की बेरुख़ी

बताते हैं कि ममता कार्यकर्ताओं की फंडिंग बिहार सरकार द्वारा की जाती है. शुरुआती दौर में अनुमंडल अस्पताल और सदर अस्पताल में ही ममता का चयन हुआ था और उसकी फंडिंग एक संस्था के द्वारा किया जाता था. उसके बाद प्रखंड स्तर के स्वास्थ्य केंद्र पर उनकी बहाली की गई. अब बिहार सरकार उनकी फंडिंग कर रही है. अभी तात्कालिक समस्या है कि कई महीनों से उनका मानदेय नहीं मिला है.

विश्वनाथ सिंह बताते हैं कि ममता कार्यकर्ता के तौर पर अनुसूचित जाति की महिलाओं की ही बहाली की जाती है. उनका कहना है, “एएनएम का काम प्रसव के बाद बच्चे की देखभाल करना है और ममता का काम प्रसव के समय बच्चे की देखभाल करना है. इसलिए हमारी मांग रही है कि ममता कार्यकर्ता को कम से कम 18,000 रुपए मासिक का भुगतान किया जाए.”

बता दें कि अपनी सभी समस्याओं को लेकर ममता कार्यकर्ता लगातार प्रदर्शन करती रही हैं. इसी साल के आरंभ में कई दिनों तक राजधानी पटना में इन्होंने अपना प्रदर्शन किया. लेकिन, इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई. बिहार की लगभग 6000 ममता बस अपनी नौकरी बचाने के लिए अधिकारियों का अपमान और सामाजिक जलालत झेलने को मजबूर हो रही हैं.

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