कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

‘मैंने घरवालों से कहा कि पत्रकार बनना है, फिर जो जबाव मिला वह नया नहीं था’- महिला दिवस पर जानिए एक महिला का अनुभव

भारत में कितनी ही महिलाएं ऐसी हैं, जिन्हें महिला दिवस के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है.

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है. इतिहास में पीछे मुड़कर देखें तो पता चलता है कि समान अधिकारों की यह लड़ाई आम महिलाओं द्वारा ही शुरू की गई थी. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को स्त्री क्षमता, सामाजिक, राजनैतिक तरक्की की सराहना और उनके अधिकार प्राप्त करने के प्रयासों  के रूप में देखा जा सकता है.

आज महिलाएं सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं. एक समय था जब महिलाओं को केवल घर की रसोईयों और कामकाज तक सीमित रखा जाता था. उन्हें शिक्षा, रोज़गार के वह अवसर नहीं मिलते थे जो पुरूषों के पास मौजूद थे. फिर भी महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए लड़ाई जारी रखी. मां, बहन, बेटी और पत्नी के रिश्ते निभाने हो या घर संभालना नारी हर कार्य को निभाती हैं.

भारत में आज महिलाएं हर क्षेत्र में सफल हैं,आगे हैं. भारत की प्रथम प्रधानमंत्री (इंदिरा गांधी) व 12वीं राष्ट्रपति (प्रतिभा पटिल) भी महिला रही हैं. लड़कियों की शिक्षा के लिए अगर सावित्री बाई फुले ने संघर्ष न किया होता तो स्त्री शिक्षा आज इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती. मुझे गर्व है कि मैं एक नारी हूं. लेकिन इन सब के बीच एक सवाल भी खड़ा होता है कि आखिर हमें क्यों महिला दिवस मनाने की जरूरत पड़ती है. जबकि पुरुष दिवस तो कभी नहीं मनाया जाता है.

राजनीति, खेल, मनोरंजन, लेखिका, अभिनेत्री हो या चाहे एक पत्रकार हर जगह महिलाएं अपनी भूमिका निभा रही है. हां, पत्रकारिता से मुझे याद है कि जब मैंने पहली बार इस विषय में बात की थी तो घर वालों के चेहरे का मिजाज बदल गया था. उन्होंने कहा-यह तो लड़कों के काम करने का फील्ड है तुम कैसे कर पाओगी. इसमें काफी खतरे मोल लेने पड़ते हैं.

उन शब्दों ने मुझे और मेरी सोच को कहीं भी चोट नहीं पहुंचाई. क्योंकि मैं जानती थी कि ये समाज हमेशा से हर काम को पुरुष और महिलाओं के बीच बांटता आया है. पहले ये केवल घरों के कामकाज तक सीमित था, लेकिन अब करियर को लेकर भी स्त्री और पुरूष को बांट दिया जाता है. हालांकि फिर भी महिलाएं हर करियर में अपनी दावेदारी पेश करने से पीछे नहीं हट रही हैं.

महिला दिवस का मतलब नारी शक्ति को पहचान देना होता है. लेकिन, भारत में कितनी ही महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें महिला दिवस के बारे में कोई जानकारी नहीं है. छोटे शहरों और गांव कस्बों की बात न भी करें तो दिल्ली जैसे बड़े शहर में ही सड़क पर चलती मध्यमवर्गीय 4 महिलाओं में से शायद किसी 1 महिला को  इस दिन  के बारे में जानकारी होगी. और वो भी उनके बच्चों द्वारा बताया गया होगा.

क्योंकि एक मध्यमवर्गीय महिला आज भी काम, घर और बच्चों तक ही सीमित रह जाती है. एक आम महिला आज भी महिला दिवस को रोज की तरह आम दिन समझती है.

महिलाओं ने अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए लंबा संघर्ष किया है और आज भी कर रही हैं. लेकिन, आज भी इस आधुनिक भारत में महिलाएं रात में अकेले बाहर जाने से डरती हैं, दहेज के लिए प्रताड़ना झेलती हैं, बलात्कार जैसी घटनाओं को आए दिन अंजाम दिया जा रहा है, पढ़ें-लिखे समाज के सभ्य लोग एक स्त्री को उसकी शारीरिक बनावट और ताकत से आंकते हैं.

देश में महिला स्वतंत्रता और स्त्री सुरक्षा अभी भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. बड़े शहरों में महिलाएं स्वतंत्र तो हैं, लेकिन उनके भीतर कहीं न कहीं एक डर का भाव भी व्याप्त है. छोटे शहरों में महिलाओं के पास स्वतंत्रता के अवसर कम हैं, वहीं गांव और कस्बों में तो आज भी बेटी के पैदा होने पर घर वाले दहेज के लिए पैसे जुटाना शुरू कर देते हैं.

आज महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर आगे बढ़ रही हैं. बेटियों को बेटों के समान ही दर्जा दिया जाता है. लेकिन, यह सोच केवल कुछ वर्गों तक ही सीमित है. आज भी समाज लड़कियों को उनके पहनावे, रहन-सहन से आंकता है.

लेकिन महिलाएं इतनी शक्ति रखती हैं कि इन सब सामाजिक कठिनाइओं से लड़कर अपनी राह खुद बना सकती हैं. अपने लिए संघर्ष कर रास्ता बनाना और कामयाबी व अधिकारों को प्राप्त करना ही महिला दिवस है, जिसे हर साल 8 मार्च को इसी तरह मनाया जाएगा.

जरूरत है कि भारत के हर गांव-कस्बे की महिलाएं इस दिन से खुद को जोड़ सके, और ये तभी मुमकिन है जब देश की हर महिला खुद को सशक्त और अपने अधिकारों के लिए लड़ने का हौसला रखेंगी.

You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+