कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

#MeToo इलीट महिलाओं का आंदोलन है, लेकिन इसमें सबकी भलाई है!

इस आंदोलन में उन देवदासियों की आवाजें नहीं हैं, जिनका धर्म के नाम पर मंदिरों में शोषण होता रहा है और जिसके खिलाफ़ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी कदम उठाए हैं।

ऐसा देश में हमेशा से होता आया है। मिथकीय ग्रंथों में औरतों के साथ जबर्दस्ती या फुसलाकर सेक्स करने के सैकड़ों किस्से हैं। अहिल्या से लेकर सरस्वती और मतस्यगंधा से लेकर शचि तक तमाम घटनाएं मिथकों में वर्णित हैं। लेकिन, समाज ने इन घटनाओं को अंजाम देने वाले पुरुषों को कभी अच्छा नहीं माना। इंद्र की पूजा नहीं होती और ब्रह्मा के पूरे देश में सिर्फ दो मंदिर हैं। चांद के मुंह में कालिख लगी है और ऋषियों की इस बात के लिए आलोचना है कि सुंदर लड़की देखते ही वे तपस्या भंग करने के लिए तैयार रहते थे। बाकी धर्मों के मिथकों में भी ऐसे किस्से बिखरे पड़े होंगे.।

लेकिन ये तो अतीत की बात है। मिथकों की बात है।

अब यह 21वीं सदी है, जहां औरतें बराबर की नागरिक हैं और आदर्श स्थितियों में उन्हें राष्ट्र निर्माण में बराबर का हिस्सेदार होना चाहिए।

भारतीय संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर कहते हैं कि – मैं किसी भी समाज की प्रगति को उस समाज में महिलाओं की प्रगति से जोड़कर देखता हूँ। यानी अगर औरतों ने प्रगति नहीं की है, तो बाबा साहेब के मुताबिक वो समाज पिछड़ा हुआ और पतनशील है।

संयुक्त राष्ट्र यानी यूनाइटेड नेशंस की पहल पर जब दुनिया में मानव विकास का इंडेक्स हर साल बनता है तो उसमें इस बात को काफी महत्व दिया जाता है कि विभिन्न देशों में महिलाओं की क्या स्थिति है, वे कितनी शिक्षित हैं, वर्कफोर्स में उनकी कितनी हिस्सेदारी है, उनका स्वास्थ्य कैसा है, बच्चा पैदा होते समय महिलाओं के मरने की दर क्या है…आदि। यानी अब सारी दुनिया लगभग आम राय से मानती है कि किसी देश की तरक्की उसकी आधी आबादी की तरक्की के बिना मुमकिन नहीं है। जिन देशों में महिलाओं की स्थिति अच्छी है और महिलाओं का सम्मान है, ऐसे देशों को लोग अच्छा देश मानते हैं।

मीटू मूवमेंट क्या है?

“मीटू महिलाओं का अपने शरीर और अपने अस्तित्व पर अपने हक़ को दर्ज़ कराने का सोशल मीडिया पर चला अभियान है, जिसमें वे उन नई-पुरानी घटनाओं को लिख-बता रही हैं, जब कभी किसी पुरुष ने उनकी सहमति के बिना उनके साथ शाब्दिक, या शारीरिक या अन्य किस्म की जबर्दस्ती की और उनके शरीर या उनके अस्तित्व पर उनके अधिकार के सिद्धांत का उल्लंघन किया।”

इस परिभाषा के मुताबिक –

  1. महिलाओं का अपने शरीर पर पूरा हक है, जैसा हक़ पुरुषों को अपनी देह पर है। कानून और संविधान की दृष्टि से देखें तो उन्हें यह हक संविधान की प्रस्तावना के साथ ही मौलिक अधिकारों के अध्याय से मिला है, जिसमें स्वतंत्रता का अधिकार शामिल है।
  2. मीटू मूवमेंट संविधान से मिले इस अधिकार के उल्लंघन के ख़िलाफ़ है। यह उन जबरन किए गए कृत्यों या प्रयासों के बारे में है, जो पुरुषों ने महिलाओं के विरुद्ध किया। सहमति से बनाए गए नैतिक या अनैतिक यौन संबंध या यौन व्यवहार इस आंदोलन के दायरे में नहीं हैं। यहां तक कि पद, प्रमोशन या पोस्टिंग के लालच में या तरक्की की उम्मीद में बनाए गए यौन संबंध भी इस आंदोलन के दायरे में नहीं हैं। ऐसा किया जाना अनैतिक हो सकता है और इस क्रम में अगर पुरुष ने स्त्री के साथ छल किया है तो वह कानूनी तौर पर गलत भी है, लेकिन मीटू उन घटनाओं के बारे में नहीं है।
  3. मीटू का आंदोलन सोशल मीडिया पर चला। बेशक बाद में चैनलों और अखबारों में भी इस बारे में खबरें छपीं या दिखाई गईं। लेकिन, इसकी शुरुआत सोशल मीडिया से ही हुई और इसे वहीं गति मिली।
  4. मीटू आंदोलन इस मामले में विशिष्ट है कि इसमें महिलाओं की एजेंसी यानी खुद अपने बारे में बोलने और फैसला लेने का अधिकार अंडरलाइन हुआ है। मीटू की आवाज महिलाओं ने खुद उठाई है। कई पुरुषों ने बेशक उनका समर्थन किया है, लेकिन इस आंदोलन के केंद्र में महिलाएं हैं।
  5. मीटू में जिन घटनाओं का जिक्र हो रहा है, वो वर्षों और दशकों पुरानी हो सकती हैं। यह महत्वपूर्ण है कि जो बात 1990 या 2000 में नहीं कही जा सकती थीं, वो बात 2018 में कही जा रही है। इनमें से कई घटनाएं ऐसी होंगी जिनके अब कोई सबूत नहीं मिल पाएंगे। इन बातों की सत्यता सबूतों पर नहीं टिकी है। अदालत में इन आरोपों का क्या होगा, किसी को नहीं मालूम। लेकिन, जनभावनाओं का एक हिस्सा अपने आसपास के अनुभवों के आधार पर मान रहा है कि जो बोला जा रहा है, वैसा हुआ होगा। हालांकि इसे अलग तरह से देखने वाले लोग भी हैं, जो मीटू आंदोलन पर ही सवाल उठा रहे हैं।

मीटू मिडिल क्लास की इलीट औरतों का आंदोलन है!

इस बात में काफी हद तक सच्चाई है। इसका एक प्रमाण है कि सोशल मीडिया पर मीटू के तहत निजी अनुभव लिखने वाली हर महिला ने अपनी बात इंग्लिश में रखी है। हालांकि, इन महिलाओं की वर्गीय स्थिति का कोई अध्ययन नहीं हुआ है, लेकिन कॉमन सेंस के आधार पर यह कहने का जोखिम उठाया जा सकता है कि ये सभी महिलाएं उच्च शिक्षित, शहरी और इलीट हैं और विभिन्न धर्मों के उच्च वर्ण से इनका ताल्लुक है। किसी गरीब, ग्रामीण, कम पढ़ी-लिखी, दलित या ओबीसी या आदिवासी महिला की आवाज़ मीटू आंदोलन में सुनाई नहीं पड़ी है। ये आंदोलन प्रोफ़ेशनल पोजिशन पर पहुंची महिलाओं का है, जिन्होंने मुख्य रूप से वर्क प्लेस पर या इसी सिलसिले में हुए यौन उत्पीड़न को झेला है। फिल्मों से लेकर मीडिया और यूनिवर्सिटीज से लेकर लॉ फर्म तक में मीटू की बातें सामने आ रही हैं। ये सारी बातें वे महिलाएं कह रही हैं जो प्रोफेशनल जिंदगी में हैं या थीं।

इस आंदोलन में वे करोड़ों महिलाएं नहीं है, जिनके साथ हर दिन अमानवीय किस्म के अत्याचार होते हैं। इस आंदोलन में वे दलित महिलाएं नहीं हैं, जिनके शरीर पर उनके अधिकार को समाज का एक हिस्सा अब भी मान्यता देने को तैयार नहीं है और जिनके खिलाफ़ सबसे बुरे किस्म के अत्याचार हो रहे हैं। इस आंदोलन में वे आदिवासी महिलाएं नहीं हैं, जिनके खिलाफ गांव के साहूकार से लेकर ठेकेदार और सुरक्षाकर्मी तक जघन्य अपराध करते हैं। इस आंदोलन में वे कृषक और कारीगर तथा घुमंतू जातियों की महिलाएं भी नहीं हैं, जिनके लिए यौन अपराध को झेलना एक आम बात है। इस आंदोलन में उन देवदासियों की आवाजें नहीं हैं, जिनका धर्म के नाम पर मंदिरों में शोषण होता रहा है और जिसके खिलाफ़ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी कदम उठाए हैं।

जाहिर है कि देश की ज्यादातर महिलाओं के जीवन में मीटू जैसा कोई आंदोलन नहीं हो रहा है।

तो फिर इस आंदोलन का क्या करें? 

ये आंदोलन बेशक इलीट महिलाओं ने शुरू किया है, लेकिन इसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा। अगर वर्क प्लेस में महिलाओं के अधिकारों को लेकर चेतना बढ़ती है और पुरुषों में भी यह समझदारी या डर पैदा होता है कि महिलाओं के साथ वे “जो मन में आए” वह नहीं कर सकते हैं, तो यह न सिर्फ महिलाओं के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए अच्छी बात होगी।

भारत में वर्क प्लेस में महिलाओं की हिस्सेदारी बेहद कम 28% है। इस मामले में जिन 131 देशों में सर्वे होता है, उनमें भारत का स्थान 121वां है। भारत में उत्पादक कामकाज में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाए बिना देश का समुचित विकास संभव नहीं है। जिन वजहों से भारत में वर्कफोर्स में महिलाओं की भागेदारी कम है, उनमें से एक वजह यह भी है कि काम की जगहें महिलाओं के अनुकूल नहीं हैं। मीटू आंदोलन से यह पता चल रहा है कि महिलाएं प्रोफ़ेशनल लाइफ में आने से हिचकती क्यों हैं। हालांकि, महिलाओं की उत्पादक कामों में हिस्सदारी कम होने की ये एकमात्र वजह नहीं है, लेकिन यह एक अहम वजह जरूर है। अगर महिलाओं को कामकाज के दौरान यौन उत्पीड़न से बचाया जा सके, तो ऐसी कई महिलाएं कामकाज़ी बनना चाहेंगी, जो अन्यथा गृहिणी बन कर जीवन बिता देंगी।

मीटू का आंदोलन कुल मिलाकर न सिर्फ महिला हित में है, बल्कि यह देशहित में है। ये बेशक इलीट का आंदोलन है, लेकिन इसका लाभ हर तबके की महिलाओं को होगा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इंडिया टुडे ग्रुप के मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं।

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