कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

Exclusive : “एक घंटे का समय दीजिए, सभी मुसलमानों को ख़त्म कर देंगे..”, सीतामढ़ी में जब भीड़ ने ज़ैनुल अंसारी को ज़िंदा जला दिया- Ground Report

20 अक्टूबर को बिहार के सीतामढ़ी में दुर्गा पूजा यात्रा के दौरान भीड़ ने 80 वर्षीय अंसारी की हत्या कर दी थी.

तारीख़ 4 नवम्बर. रविवार का दिन. सुबह के 9 बजे हैं. सीतामढ़ी के गौशाला चौक पर अभी-अभी दुकानें खुलनी शुरू ही हुई हैं. सड़क के किनारे मिष्ठान भंडार में पूड़ी बेल रहा आदमी पूछने पर बताता है कि बीते 20 अक्टूबर को भयानक दंगा हुआ था. हज़ारों लोगों की भीड़ थी, जिन्हें पुलिस रोकने की कोशिश करती रही. इस घटना के बारे में और जानकारी मांगने पर यह आदमी सिहर उठता है, और अपना नाम भी नहीं बता पाता.

सीतामढ़ी जंक्शन से तक़रीबन चार किलोमीटर दूर गौशाला चौक है. यह इस इलाक़े का मुख़्य बाज़ार भी है, इसके उत्तर में मुरलिया चक नाम का मुहल्ला है, जहां मुसलमानों की घनी आबादी है. उत्तर की ओर बढ़ने पर जैसे-जैसे मुहल्ले में अंदर आते हैं, मुस्लिम बस्ती शुरू हो जाती है. इन बस्तियों में एक अजीब-सी शांति पसरी हुई है. एकाध घर के बाहर कुछ बच्चे लहठी बना रहे हैं. दंगों के बारे में कोई कुछ नहीं बताता. मुहल्ले के वार्ड 3 के पार्षद के घर पर भी ताला लटका हुआ है. पास के एक दवा दुकानदार जो दंगे की जानकारी देने से मना करता है, ज़्यादा पूछने पर बताता है कि इस मुहल्ले में एक मदरसा है, आप वहां जाइए.

घटित दंगे की जगह से चार सौ मीटर उत्तर में बायीं तरफ़ दारूल उल उलेमा मदरसा है. इसे इस मुहल्ले का केंद्र कहा जाता है. यहां के कई कमरों में करीब तीन सौ बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं. मदरसे में कई स्थानीय नागरिक और अल्पसंख्यक समुदाय के पत्रकार मौजूद हैं. दंगे के बारे में पूछने पर पहले तो सभी कुछ भी बोलने से हिचकते हैं फिर नाम नहीं बताने के शर्त पर किसी तरह बात रखने के लिए तैयार होते हैं.

दारुल-उलूम- कादरिया, गौशाला मुर्गी चक.

तक़रीबन 60-65 वर्ष के एक स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं, “19 अक्टूबर, जुम्मा का दिन था. हम सभी लोग खाना खाने के बाद बिस्तर पर लेटे हुए थे. तभी दुर्गा जी की मूर्ति के साथ करीब 1500 लोग मूर्ति विसर्जन को इधर से गुजरे. चूंकि, लाउड स्पीकर की आवाज़ बहुत तेज़ थी, इसलिए हम अपने घर से बाहर आकर देखने लगे. इस भीड़ में शामिल अधिकतर बच्चे नशे में धुत्त थे. जब यह भीड़ हमारे मुहल्ले से गुजरी तो कुछ मुस्लिम बच्चे भी इसमें शामिल हो गए. रात के करीब 10 बजे से लेकर 1:30 बजे तक यह जलसा हमारे मुहल्ले में घूमता रहा. हमें इससे कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि मधुबन दुर्गा पूजा पंडाल की मूर्ति इसी रास्ते होकर हर साल विसर्जन को जाती है. रात के करीब पौने दो बजे यह जलसा मुस्लिम बस्ती को पार करने लगा. हिन्दू बस्ती शुरू होने ही वाली थी कि किसी ने माइक से अनाउंस कर दिया कि किसी मुसलमान ने मूर्ति पर पत्थर मार दी है, जिससे मूर्ति का हाथ टूट गया है. इतना सुनते ही भीड़ ने पास के अल्पसंख्यकों के घरों पर लाठियां बरसानी शुरू कर दी. हालांकि सभी लोग घर बंद कर सो रहे थे, इसलिए भीड़ ने करीब 30 लोगों के घर के दरवाजे पर भारी तोड़फोड़ की.”

अपनी बात जारी रखते हुए वे कहते हैं, ‘हमारे मुहल्ले में हिन्दू मुसलमान मिलकर रहते हैं. इस मुहल्ले में अभी भी कई हिन्दुओं की किराना दुकान चल रही है. पर्व त्यौहारों को भी हम साथ मिलकर मनाते हैं, लेकिन उस रात एक अफ़वाह ने हिन्दू- मुसलमान को अलग कर दिया.’

इसी मदरसे में मौजूद एक स्थानीय पत्रकार बताते हैं, ‘उस रात जलसे के साथ करीब 150 पुलिस जवान तैनात थे, फिर भी मुसलमानों के घरों पर लाठियां बरसाई जा रही थीं. जब यह मामला काफ़ी बढ़ गया तब एसपी को ख़बर की गई, उन्होंने मौक़े पर पहुंचकर मामले को शांत कराया और मूर्ति विसर्जित कर दी गई. सुबह तक मामला शांत हो गया. गौशाला चौक पर पुलिस के जवान तैनात कर दिए गए.’

मदरसे में मौजूद एक स्थानीय शिक्षक बताते हैं, “हमारे मुहल्ले के अधिकतर लोग गौशाला चौक पर फल और सब्जी की दुकान लगाते हैं. रविवार 20 अक्टूबर की सुबह में अचानक गौशाला के दुकानदारों के पास मधुबन के कुछ परिचितों ने फ़ोन किया कि मधुबन में बहुसंख्यक समुदाय के लोगों द्वारा अल्पसंख्यकों को मारा जा रहा है. इसके बाद गौशाला चौक के अधिकतर मुस्लिम दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद कर दीं और घर लौट गए.”

गौशाला गेट पर मुस्लिम दुकानदार(मो. असग़र) के दुकान पर तोड़फोड़ (साभार- वायरल फ़ोटो).

मदरसे में मौजूद एक अन्य बुजुर्ग व्यक्ति नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि, ‘अगली सुबह (20अक्टूबर) दस बजे के करीब काली पूजा समिति के लोगों ने प्रशासन के आदेश की अवहेलना करते हुए गौशाला चौक की तरफ़ मूर्ति लेकर आए. उन्हें काली जी की मूर्ति को भसान करने हाजीपुर जाना था.

सभी स्थानीय लोग बताते हैं और मीडिया में भी यह ख़बर चल रही है कि प्रशासन ने 19 अक्टूबर रात की घटना को देखते हुए काली पूजा समिति को मुस्लिम बहुल गौशाला चौक और मुरलिया चक के रास्ते होकर मूर्ति ले जाने से मना किया था. यहां पुलिस वालों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने और मुरलिया चक मुहल्ले के भीतर घुसने लगे. मुहल्ले में घुसते हुए भीड़ ने उकसाऊ गाने बजाने और नारे लगाने शुरू कर दिए (यह बात घटनास्थल पर मौजूद अधिकारियों ने अपने रिपोर्ट में भी लिखी है). जैसे-जैसे यह जलसा मुस्लिम बहुल इलाके में घुस रहा था, वैसे वैसे तेज़ स्वर में भड़काऊ नारे लगाए जा रहे थे. इस दौरान पास के कुछ मुस्लिम युवकों ने इस नारेबाज़ी का विरोध किया. इसके बाद विवाद बढ़ा और दोनों पक्षों में पत्थरबाजी होने लगी. कहा जाता है कि प्रशासन रोकने की कोशिश करती रही, लेकिन स्थिति उसकी नियंत्रण से बाहर थी. जब काफी संख्या में लोग घायल हो गए तब ज़िले के एसपी विकास बर्मन आए. तब तक मामला और बिगड़ चुका था और गौशाला चौक से मुरलिया चौक के बीच करीब 10 हजार उपद्रवियों की भीड़ जुट गई थी. जब स्थानीय पुलिस इसे नियंत्रित नहीं कर सकी तब बाहर के जिलों से पुलिस जवान मंगाए गए. इसके बाद हुड़दंगियों को पीछे की ओर ले जाया गया.

स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि, ‘जब मुरलिया चक से भीड़ छंटकर गौशाला के पास पहुंची तब तक वहां पन्द्रह हज़ार से ज़्यादा लोग मौजूद थे. (न्यूजसेंट्रल से बातचीत के दौरान सीतामढ़ी के थानाध्यक्ष ने भी भीड़ का यही आंकड़ा बताया है). मुसलमानों की दुकानें जलाई जा रही थीं. गाड़ियों को फूंका जा रहा था.. इस समय घटनास्थल के पास ज़िले के तमाम पुलिस अधिकारी मौजूद थे.

मुरलिया चक

गौशाला चौक पर भाजे की दुकान चलाने वाले एक व्यक्ति का कहना है, “जब भीड़ अपने चरम पर थी और प्रशासन उन्हें रोकने में नाकाम था, तभी राजोपट्टी की तरफ़ से एक बूढ़ा आदमी आ रहा था. भीड़ ने पीट पीट कर उसकी जान ले ली. इसके बाद कुछ लोग उस बुजुर्ग के शव को लेकर गौशाला के गेट के पास गए और सड़क किनारे सरेआम जला दिए.”

गौशाला चौक पर पुलिस बलों के साथ डुमरा प्रखंड के कार्यक्रम पदाधिकारी रमेन्द्र कुमार को तैनात किया गया था. कुमार ने अपनी शिकायत में लिखा है कि “मैं अपनी ड्यूटी पर था, तभी दिन के करीब 12:30 बजे 1500 की संख्या में लोग लाठी, डंडा, भाला, फरसा एवं तलवार लेकर गौशाला चौक से मुरलिया चक की तरफ निकले मूर्ति लेकर आए और पाकिस्तान मुर्दाबाद और हिन्दुत्व के नारे लगाने लगे. मैंने उनलोगों को रोकने की कोशिश की और लाइसेंस दिखाने का अनुरोध किया, लेकिन वे नहीं माने और आगे बढ़ गए.” रमेन्द्र कुमार ने पुलिस निरीक्षक, सह थानाध्यक्ष, सीतामढ़ी को घटना का विवरण देते हुए लिखा है कि भीड़ नारे लगा रही थी कि एक घंटे का समय दीजिए सभी मुसलमानों को ख़त्म कर देंगे. उन्होंने लिखा है- “इसी दौरान गौशाला के गेट के पास किसी के जलने का एहसास हुआ, हम वहां पहुंचे तो एक व्यक्ति का अधजला शव पड़ा हुआ था.”

रमेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई रिपोर्ट, (पेज़-2, इस पन्ने पर उन्होंने लिखा है कि कुछ लोग मुस्लिमों को ख़त्म करने के लिए 1 घण्टे का वक्त मांग रहे थे।)

सीतामढ़ी के थानाध्यक्ष शशिभूषण सिंह उस समय घटनास्थल से कुछ ही दूरी पर मौजूद थे. वहां से उन्होंने ज़िले के एसपी को हालात की जानकारी देते हुए रिपोर्ट लिखा है. जिसमें लिखा गया है, ‘हम गश्ती पर निकले थे कि ख़बर मिली कि काली पूजा समिति के लोग लाठी, फरसा, भाला, तलवार आदि लेकर मुस्लिम बहुल इलाके की ओर बढ़े हैं. इसके बाद हम वहां पहुंचे और भीड़ को रोकने की कोशिश की, लेकिन वो नहीं रूके . जूलुस में शामिल लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक नारे लगा रहे थे.’

सीतामढ़ी थानाध्यक्ष शशिभूषण सिंह द्वारा लिखी गई रिपोर्ट. (पेज 1, इसमें उन्होंने लिखा है कि मूर्ति के साथ करीब 1500 लोग थे और उनलोगों के हाथों में धारदार हथियार थे).

इसके बाद पुलिस ने कई राउंड हवाई फ़ायरिंग की. सीतामढ़ी थानाध्यक्ष शशिभूषण सिंह के मुताबिक़ अश्रु गैस के गोले भी छोड़े गए. शाम में तीन बजे के करीब पुलिस ने इस इलाके में धारा 144 लगाकर भीड़ को तितर बितर कर दिया.

कौन थे ज़ैनुल अंसारी

दोपहर के करीब तीन बजे. दंगे में हत्या कर जलाए गए 80 वर्षीय जै़नुल अंसारी का गांव भोरहां बाजार. बाजार में शांति है. एक मिठाई की दुकान पर मौजूद मुस्लिम संप्रदाय के कई लोग इस दंगे की बात कर रहे हैं. ज़ैनुल के घर का पता पूछने पर लोगों ने बताया कि बाजार से 200 मीटर की दूरी पर बायें साइड में उनका घर है. घर के पास ही एक दवा की दुकान है. दुकान पर पहुंचने पर वहां 14 बरस का एक लड़का गुलाबी शर्ट पहने काउंटर पर बैठे नज़र आता है. पूछने पर पता चला कि वह ज़ैनुल अंसारी का पोता है. लड़के के पिता सीतामढ़ी शहर गए हुए थे. बात हो ही रही थी कि किसी सामाजिक संगठन के लोग कार में सवार होकर वहां पहुंचे. जै़नुल के दरवाजे पर पहुंचे पर कुर्सियां लगाई गईं. इसके बाद जै़नुल अंसारी के चचेरे भाई अल्लाह रक्खा ख़ान विस्तार से घटना के बारे में बताते हैं. इस बातचीत के मूल में उनका एक ही दर्द झलक रहा था कि प्रशासन ने हमारे भाई का अंतिम संस्कार अपनी मिट्टी पर नहीं होने दिया.

ज़ैनुल एक गरीब खेतीहर मज़दूर थे. इख़्लाक अहमद और मो. अशरफ़ उनके दो बेटे हैं. अशरफ़ गुजरात में तो इख़्लाक मुम्बई में मज़दूरी करते हैं. दरवाजे पर दवा की एक दुकान को उनका पोता संभाल रहा है.

जैनूल अंसारी का घर.

ज़ैनुल अंसारी के चचेरे भाई अल्लाह रक्खा का कहना है, “एक दिन पहले ही ज़ैनुल राजोपट्टी में अपनी बहन के यहां एक दावत में शरीक होने गए थे. वहां से 20 अक्टूबर को सुबह दस बजे के करीब वे घर की ओर चले थे. जब तीन बजे तक वे घर नहीं पहुंचे तो हमें चिंता हुई. हमने रीगा थाना में जाकर पूछा तो जिला प्रशासन के हवाले से थाना के पुलिस अधिकारी ने कहा कि हमें अभी इसकी कोई जानकारी नहीं है. इसके दो-तीन दिन बाद सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल होकर हमारे व्हाट्सैप पर पहुंची. ख़ून से लथपथ यह तस्वीर ज़ैनुल की थी. इसके बाद हम तस्वीर लेकर डीएम के यहां पहुंचे. हमने जब तस्वीर दिखाई तब डीएम मान गए और कहा कि इस शव को पोस्टमार्टम के लिए मुज़फ़्फ़रपुर भेजा गया है. इसके बाद हम मुज़फ़्फ़रपुर ज़िला अस्पताल पहुंचे. तब तक वहां पोस्टमार्टम हो चुका था. हमने कहा कि अंसारी की बचे-खुचे शरीर को हमारे हवाले कर दिया जाए, तो डीएम साहब ने इससे इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि यही मुज़फ़्फ़रपुर में ही उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. हमने काफ़ी विनती की लेकिन जब प्रशासन ने क़ानून व्यवस्था का हवाला दिया तो हम कुछ लोगों ने मुज़फ़्फ़रपुर जाकर उनका अंतिम संस्कार किया.”

ज़ैनुल के चचेरे भाई बताते हैं कि हादसे के बाद कई नेता उनके घर आए और मुआवज़ा देकर गए. ज़ैनुल के परिवारवालों ने प्रशासन से मांग की है कि इस घटना के दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए. उन्हें आशंका है कि स्थानीय नेताओं की मिलीभगत से आरोपियों को छोड़ा भी जा सकता है.

पोस्ट मोर्टेम रिपोर्ट बताती है कि ज़ैनुल अंसारी की मौत जलने से हुई

80 वर्षीय ज़ैनुल अंसारी की पोस्ट मोर्टेम रिपोर्ट में डॉक्टरों द्वारा दी गई जानकारी में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उनकी मृत्यु जलने की वजह से हुई है. रिपोर्ट के अनुसार उनका पूरा शरीर जल चुका था और खोपड़ी की हड्डियां ख़त्म हो चुकी थी. उनके दोनों पैर और हाथ पूरी तरह जल चुके थे और उनकी हड्डियां नज़र आ रही थीं. उनके फेफ़ड़ों में और शरीर के अन्य अंदरूनी भागों में कार्बन भर गया था. पोस्ट मोर्टेम किए जाने के समय तक अंसारी की मृत्यु को 3-5 दिनों का समय बीत चुका था.

पोस्ट मोर्टेम रिपोर्ट

किसकी हुई गिरफ़्तारी

इस मामले में दोनों पक्षों के सौ से ज़्यादा लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई है. गिरफ़्तारी को लेकर ज़िला पुलिस के दो बड़े अधिकारी अलग-अलग आंकड़े बताते हैं. एसपी विकास बर्मन का कहना है कि हमने 38 लोगों को गिरफ़्तार किया है. वही, सीतामढ़ी थानाध्यक्ष शशिभूषण सिंह का कहना है कि हमने 31 लोगों को हिरासत में लिया है.

मुरलिया चक के निवासियों का कहना है कि पुलिस ने इस मुक़दमे में अल्पसंख्यक समुदाय के ऐसे लोगों का नाम भी दिया गया है जो महीनों से बाहर रह रहे हैं.

नाम न छापने की शर्त पर एक व्यक्ति ने बताया कि मो. शमीम (पिता- मो. सफी साह) घटना के वक्त दिल्ली में थे. ऐसे ही मो. जाकिर (पिता- मो. इसराफिल) तीन महीने से मुंबई में रह रहे हैं, लेकिन पुलिस ने वोटर लिस्ट देखकर इन लोगों का नाम बिना साक्ष्य के एफ़आईआर में दे दिया है. वहीं पुलिस अधिकारियों ने दावा किया है कि उन्होंने दंगे में शामिल लोगों के ऊपर ही मुक़दमा दर्ज किया है.

सीतामढ़ी थाना

कई दिनों तक बंद रहा बाज़ार, काफ़ी हुआ नुक़सान

इन दंगों से हुए नुक़सान का सही-सही आंकड़ा मालूम नहीं चल सका है. गौशाला चौक की कई दुकानें जला दी गई हैं. गौशाला चौक और बकरी बाज़ार के बीच कई दुकानों में भारी तोड़फोड़ की गई. फूस के एक- दो घर फूंक दिए गए.

इन सबके साथ-साथ पूरे सीतामढ़ी शहर के व्यापार पर इसका भारी असर पड़ा है. मेहसौल चौक पर राजा गेस्ट हाउस के संचालक का कहना है कि दस दिनों तक बाजार का संचालन बंद रहा. हमारे व्यापार पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा है. वहीं मेहसौल चौक- बस स्टैंड के बीच जूस की दुकान चलाने वाले मो. हुसैन कहते हैं कि दंगों का असर अब भी हमारे व्यवसाय पर है. दूसरे राज्यों से फल लाने वाले व्यापारी अभी सीतामढ़ी आने से डर रहे हैं.

बस स्टैण्ड रोड में जीतू फल जूस भंडार के मालिक मो. हुसैन. (इनका कहना है कि दंगे के बाद से व्यापार अभी तक पटरी पर नहीं आ सकी है).

क्या एसपी विकास बर्मन ने पिछली घटनाओं से नहीं लिया सबक़?

ज़िले के एसपी विकास बर्मन 2008 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. जब बर्मन 2015 में गया ज़िले में पुलिस अधीक्षक का प्रभार संभाल रहे थे तब गया के बिशुनगंज गांव में भीड़ ने कथित रूप से चोरी का आरोप लगाते हुए तीन लोगों की मॉब लिंचिंग कर दी थी. 18 अगस्त 2015 को टाइम्स ऑफ इंडिया की एक ख़बर के मुताबिक तब गया के सांसद हरि मांझी ने कहा था कि पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में तीन लोगों की मॉब लिंचिंग की गई. हालांकि एसपी विकास बर्मन ने सांसद के इन आरोपों का खंडन किया था. सूत्रों के हवाले से टाइम्स ऑफ इंडिया लिखता है कि मॉब लिंचिंग के शिकार लोग उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के बताए जा रहे हैं.

इसके बाद विकास बर्मन नवादा ज़िले के एसपी के पद पर तैनात हुए. साल 2017 में नवादा जिले में रामनवमी के मौके पर दो संप्रदाय के लोगों के बीच झड़प हो गई. 4 अप्रैल 2017 को न्यू इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक दो गुटों में भारी झड़प हुई थी. तब विकास बर्मन के हवाले से न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि सदभावना चौक पर दो भिन्न संप्रदाय के लोगों के बीच झड़प हो गई, पुलिस की त्वरित कार्रवाई से स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सका.

मीडिया में कैसी हुई रिपोर्टिंग

इस भयानक त्रासदी की रिपोर्टिंग स्थानीय मीडिया ने बड़े हल्के मिज़ाज की है. 21 अक्टूबर को दैनिक जागरण ने अपनी ख़बर में दंगों की जानकारी के साथ-साथ ज़िले के एसपी विकास बर्मन का खूब गुणगाण किया. दैनिक जागरण लिखता है कि एसपी बर्मन ने पत्थर खाते हुए भी मोर्चा संभाले रखा.

तटस्थता को ताक पर रखते हुए दैनिक जागरण (21 अक्टूबर के अंक में) एसपी विकास बर्मन को दोषमुक्त साबित करने में जुट गया।

दंगे के बाद से 3 नवम्बर तक के प्रभात ख़बर का अध्ययन करने पर पता चलता है कि इस अख़बार में भी जैनुल अंसारी को लेकर कम ख़बरें छपी हैं. इस अख़बार की एक ख़बर कहती है कि जो अधजला शव गौशाला गेट के पास मिला था, उसकी शिनाख़्त की जा चुकी है.

दूसरी ख़बर में अख़बार ने लिखा है कि ज़िला प्रशासन ने काफी मशक्कत के बाद मृतकों के परिजनों की पहचान कर ली है. अख़बार ने यह भी लिखा है कि 5 लाख मुआवज़ा मिलने के बाद परिजनों ने जिला प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त किया है. जबकि ज़ैनुल अंसारी के भाई का कहना है कि उन्हें काफ़ी मशक्कत के बाद शव के बारे में जानकारी दी गई.

इस घटना पर स्थानीय मीडिया का रूख काफ़ी निराशाजनक रहा है. मृतक के परिजनों का कहना है कि दबाव में आकर यहां के पत्रकार कुछ भी नहीं लिख रहे हैं. वहीं राज्य सरकार ने मिल्लत टाइम्स नामक एक वेबसाइट को इस घटना की रिपोर्टिंग के सिलसिले में नोटिस भेजा है. राज्य सरकार के साइबर क्राइम विभाग ने वेबसाइट से कहा है कि कानून व्यवस्था को देखते हुए मिल्लत टाइम्स को घटना का विडियो अपने वेबसाइट से हटाना होगा.

जदयू प्रवक्ता ने कहा– “परिवार के साथ छुट्टी मना रहा हूं, दिवाली बाद बात करूंगा”

हमने सीतामढ़ी की घटना पर स्थानीय नेताओं की प्रतिक्रिया ली. पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रवक्ता दानिश रिज़वान ने कहा कि हमें सीतामढ़ी में दंगा के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) के प्रवक्ता नवल किशोर शर्मा का कहना है कि अभी बाज़ार में हैं, छुट्टी का सीजन है. परिवार वालों के साथ समय बिता रहे हैं, दीवाली बाद ही इस मुद्दे पर कुछ बयान दे पाएंगे.

वहीं कांग्रेस प्रवक्ता राजेश राठौर का कहना है कि नीतीश कुमार बीजेपी और आरएसएस की गोद में हैं. सीतामढ़ी तो बस एक उदाहरण है, चुनाव नजदीक आ रहा है इसलिए भाजपा के इशारे पर देशभर में साम्प्रदायिक घटनाएं घट रही हैं. उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन से पहले कांग्रेस पार्टी के जिलाध्यक्ष विमल शुक्ला ने मौके पर पहुंच कर शांति स्थापित करने की कोशिश की.

सीतामढ़ी के सांसद रामकुमार शर्मा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के प्रवक्ता का कहना है कि घटना की जानकारी मिलते ही पार्टी की तरफ़ से सामाजिक सौहार्द कायम करने की कोशिश की गई. पार्टी के कार्यकर्ताओं ने घटनास्थल पर जाकर अमन चैन कायम करने की पहल की. सांसद महोदय ने जिला प्रशासन को स्थिति पर नियंत्रण करने के निर्देश दिए.

मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव का कहना है कि उन्होंने मुखर होकर इस घटना की निंदा की है. मृतक के परिजनों से मिलकर 25000 का मुआवज़ा भी दिया है.

कुछ सवाल, क्या प्रशासन इसका जवाब देगी?

1. जब 19 अक्टूबर की रात को सीतामढ़ी के मुस्लिम बहुल इलाके में तोड़फोड़ हुई, फिर अगले दिन उसी जगह पर बवाल कैसे हो गया? यहां प्रशासन ने सुरक्षा की मुक़म्मल व्यवस्था बहाल क्यों नहीं की?

2. 20 अक्टूबर को दिन के 12 बजे ही करीब दस हजार लोगों की भीड़ मुस्लिम बहुल इलाके में जमा हो गई थी, फिर प्रशासन ने निषेधाज्ञा यानि धारा 144 लागू करने के लिए शाम तीन बजे तक का इंतज़ार क्यों किया?

3. सीतामढ़ी में सांप्रदायिक दंगों का इतिहास रहा है. लोग बताते हैं कि 1950 के दशक में यहां दंगे हुए थे. स्थानीय लोगों का कहना है कि 1992 में भी बाबरी विध्वंस के बाद यहां दंगे हुए थे, जिससे भारी नुकसान हुआ था. फिर सरकार ने इस ज़िले में विकास बर्मन को एसपी के पद पर क्यों तैनात किया, जिनके रहते हुए नवादा में पिछले साल रामनवमी के मौक़े पर दंगे हुए थे?

न्यूज़सेंट्रल24X7 ने काली पूजा समिति के सदस्यों से भी मिलने की कोशिश की, लेकिन मौक़े पर किसी से बात नहीं हो सकी. भविष्य में अगर उनका बयान आता है तो इस रिपोर्ट  को अपडेट किया जाएगा.

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न्यूज़सेंट्रल24X7 ने ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान लोगों से बातचीत, पुलिस अधिकारियों के बयानों, मीडिया रिपोर्ट और एफ़आईआर के आधार पर इस भयावह हादसे की तस्वीर आपके सामने पेश की है.

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