कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

गुलिस्तां परवीन: लिंचिंग के शिकार एक परिवार के जख़्म भरने की दास्तां

गुलिस्तां परवीन और अमना ख़ातून शांति-दूत हैं. ये लोग प्रेम और आज़ादी के अगुआ हैं.

जैसे ही हमारी कार ने झारखंड के गिरिडीह जिले के बरवाड गांव में गुलिस्तां परवीन के घर की ओर रूख़ किया, मैंने अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलटने शुरू कर दिए. इस डायरी में मैंने सितंबर, 2018 में इस गांव की अपनी यात्रा के अनुभव लिखे थे. मैंने अपनी फ़ोन में फ़ोटोज़ ऐप्प खोला और पिछली यात्रा की तस्वीरें ढूंढने लगी. एक फ़ोटो में गुलिस्तां परवीन नज़र आई. उसने पीले रंग की सलवार-कमीज पहन रखे थे और गर्भावस्था को छिपाने के लिए एक गुलाबी दुपट्टे को शॉल की तरह लपेट रखा था. पहली फ़ोटो में वह कैमरे के सामने देखती हुई गंभीर नज़र आती है. इसके बाद की कुछ तस्वीरों में उसका मुसकाता हुआ चेहरा दिखता है. जाहिर है मैंने तस्वीर खींचते हुए उनसे कहा होगा कि इतनी सीरियस क्यों हो?

जून 2017 में गुलिस्तां परवीन के ससुर उस्मान अंसारी पर भीड़ ने हमला बोल दिया था. भीड़ का आरोप था कि उस्मान अंसारी ने अपनी ही गाय की हत्या की है, जबकि गाय की मौत प्राकृतिक वजहों से हुई थी. अंसारी और उनकी पत्नी अमना ख़ातून डेयरी चलाने वाले किसान हैं. हमले से पहले उनके पास आठ गायें-बैल और खेती के लिए एक छोटी सी ज़मीन थी. सालों की अपनी बचत से उन्होंने अपने घर में ही एक किराने की दुकान खोल रखी थी. उनके बेटे पास ही के शहर में राजमिस्त्री का काम करते हैं.

जब गुलिस्तां के ससुर उस्मान अंसारी पर भीड़ ने हमला किया, उस समय वह नई-नवेली दुल्हन थी. अमना ख़ातून अपने पति उस्मान के लिए रहम की गुहार लगाने भीड़ के पास गई थी, जहां धक्का-मुक्की में उनका हाथ टूट गया. इसके बाद भीड़ उनके घर की तरफ़ मुड़ी और दीवारों पर केरोसिन तेल डालकर जलाने लगे. कई लाख रुपयों के साथ घरेलू सामानों को भी नष्ट कर दिया गया. तब गुलिस्तां और उसके पति सलीम अंसारी घर के पीछे वाले कमरे में बंद हो गए. उन्हें दो तरह का भय था. एक तो यह कि भागने पर भीड़ उन्हें जान से मार देगी और दूसरा यह कि अगर इसी तरह छिपे रहें जो जिंदा जल कर मर जाएंगे.

गुलिस्तां ने पिछले साल हमसे बताया था, “हमारा कमरा जहरीले धुएं से भर गया था. इससे बचने के लिए मैं और मेरे पति घर के पिछले दरवाजे में बने एक पतले छेद से साफ हवा लेने की कोशिश कर रहे थे. जिस समय पुलिस आई, उस समय हम बेहोश होने की अवस्था में आ गए थे तभी किसी ने पिछला दरवाजा तोड़कर हमें बाहर निकाला.”

उस्मान अंसारी का मामला उन चंद मामलों में से एक है, जिसमें गौरक्षकों द्वारा किए गए हमले से पीड़ित को बचाने के लिए प्रशासन ने हस्तक्षेप किया. जब मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर और कारवां-ए-मोहब्बत के कुछ सदस्यों ने 2017 में पहली बार उनसे मुलाकात की थी, उस्मान अंसारी जिस्मानी और रूहानी दोनों तरह से टूट गए थे. उस्मान का टूटा हुआ बांह और जांघ अभी ठीक नहीं हुआ था और उनके सिर और पीठ के घाव अभी भी ताजे थे. तब उनका परिवार छिप-छिपकर अपना गुजारा कर रहा था. उन्हें पता नहीं था कि अपने घर वे कब वापस लौट सकेंगे.

एक साल बाद सितंबर, 2018 में कारवां-ए-मोहब्बत की एक बड़ी टीम का हिस्सा बनकर मैं इस परिवार से मिली थी. तब वे हाल ही में अपने घर वापस लौटे थे. उस समय तक इस परिवार के पास एक भी गाय नहीं बचा था. अपने घर लौटकर उस्मान अंसारी और उनकी पत्नी ने दो गाय और बकरियां खरीदीं. उनका खेत बंजर पड़ा हुआ था. उस्मान की पत्नी अमना हर शुक्रवार को मस्ज़िद के बाहर लोगों से उस्मान के इलाज में मदद करने की गुहार लगाती थी.

शोक और सदमे में होने के बावजूद उस्मान अंसारी की बहू से मिलना हमारी यात्रा का एक विशेष और उत्तम क्षण था. 20 साल की गुलिस्तां परवीन के भीतर एक सरलता थी और मुश्किलों से निपटने का दृढ़ संकल्प उसकी आंखों में झलकता था. हममें से कई औरतें गुलिस्तां के साथ शौच के लिए गए. तीन तरफ़ से दीवारों से घिरे इस शौचालय के दरवाजे पर एक पुरानी साड़ी का पर्दा टंगा हुआ था. इस दौरान गुलिस्तां ने हमसे कई सवाल पूछे. अंत में हम सबने दोस्तों की तरह व्यवहार किया और एक- दूसरे का फ़ोन नंबर लिया और साथ में तस्वीरें खिंचवाई.

सच कहूं तो गुलिस्तां की कहानी लिखने की शुरुआत मैंने तभी कर ली थी, जब हम साथ घूमते हुए चारदीवारी, छत और टूटे हुए दरवाजों का फ़ोटो ले रहे थे. तब मुझे नहीं पता था कि ठीक एक साल बाद इस परिवार की कहानी को फिल्माने के लिए मैं वापस लौटूंगी. मेरे साथ मेरे साथी अफ़ज़ल अनीस और अब्दुल्ला जकारिया भी थे. यह कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस सफ़र के दौरान हमने लिंचिंग से पीड़ित एक परिवार के जख़्म भरने की प्रक्रिया को देखा.

गुलिस्तां ने अपने दस महीने के बच्चे को हाथों में रखा हुआ था. इसके बाद बच्चे को जल्दी ही उसके दादा जी के हाथों में सौंप दिया गया. ठीक एक साल पहले जिन हाथों में शक्ति नहीं थी, वे आज अपने मुस्कुराते हुए पोते को संभाले हुए थे. जिस दिन हम उनके घर गए थे, अमना और उनके पति उस्मान के बीच बातचीत नहीं हो रही थी. इस जोड़े के बीच झगड़े में भी एक प्यार दिखता था.

अपनी पोती के साथ उस्मान अंसारी. (चित्र साभार- नताशा बधवार)

मैंने गुलिस्तां परवीन से बहुत सारी बातें की, लेकिन गुलिस्तां अपनी सास  के सामने होने पर कुछ बोल नहीं पा रही थी. आपस में बातचीत ना होने के बावजूद इस परिवार के तीनों सदस्य एक-दूसरे के आसपास ही भटक रहे थे. मैंने और अनीस ने इन लोगों के बीच सुलह कराने की कोशिश की.

हमारे दौरे तक उस्मान अंसारी के नए गौशाले में तीन गायें आ चुकी थीं. एक जोड़ी बकरियां भी पास ही में चर रही थीं. उस्मान अंसारी और उनकी पत्नी के लिए गाय उनके परिवार का ही हिस्सा है. अमना हर रोज सूर्योदय के पहले ही जग जाती हैं और गायों को दूहकर पास के घरों में दूध बेच आती हैं. अपनी उंगलियों के इशारे से अमना मुझे अपने ग्राहकों के घर दिखाती हैं.

मैंने अमना से पूछा, “आप दूध बेचने कैसे जाती हैं?” मैं समझ नहीं पा रही थी कि अमना कैसे दूध की होम डिलिवरी करती होंगी. मुझे ऐसा लग रहा था कि कुछ ना कुछ मेरी समझ से बाहर है.

अमना चुपचाप मुझे एक बंद कमरे में लेकर गईं. यह कमरा घर के गैरेज़ के तौर पर इस्तेमाल होता था. घर का दरवाजा खोलने पर एक स्कूटर पड़ा हुआ दिखा. स्कूटर के पिछले हिस्से में दो अतिरिक्त चक्के लगे हुए थे. इसके साथ ही उस पर लिखा था, “विकलांगों के लिए”.

सादे लिबास की साड़ी पहनी इस बुजुर्ग महिला ने अपने रोजगार के लिए किस्तों पर यह गाड़ी खरीदी थी. जब उस्मान पर हमला हुआ, तब अमना शेरनी की भांति मोर्चा संभाले हुई थीं. अपने पति के इलाज़ के पैसे जुटाने के लिए अमना ने दर-दर की ठोकर खाई थी. अब उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बना ली है. वे मेहनत से कमाकर रिवार का भरण-पोषण करती हैं.

वहीं, दूसरी ओर गुलिस्तां अपने बच्ची की देखभाल कर रही है. उसे इस बात की चिंता है कि कहीं उनकी बेटी कुपोषित होकर फिर से एनीमिया का शिकार ना हो जाए. इसके साथ-साथ गुलिस्तां अपने सास-ससुर का भी ध्यान रखती है. उसका कहना था, “यह मेरा परिवार है और मुझे ही इसकी देखभाल करनी है.”

इस परिवार के खेत में अभी भी जंगली घास उगे हुए हैं, क्योंकि परिवार का कोई भी सदस्य खेती करने की हालत में नहीं है. उन्होंने अपने घर के दो कमरों को दो हिन्दू परिवारों को किराए पर दे रखा है. किराएदारों के बच्चे गुलिस्तां के बच्चे के साथ खेला करते हैं, उसे लाड़-प्यार की भाषा में बात करते हैं और हंसाते हैं.

गुलिस्तां कहती है, “हम इस घर में अकेले रहने में डरते हैं. किराएदारों के होने के कारण हम रात में चैन की नींद सो पाते हैं.” गुलिस्तां के साथ-साथ किराएदारों के पति भी पास के शहर में ही कोई काम करते हैं.

अपने ही पड़ोसियों द्वारा किए गए हमले का जख़्म रातोंरात नहीं भरता. बुरे सपने बिना किसी चेतावनी के ही आते हैं, लेकिन गुलिस्तां और उसके परिवार के सपने मरे नहीं हैं, वे लगातार इस हादसे से उबरने की कोशिश में लगे हैं.

गुलिस्तां परवीन और अमना ख़ातून के बीच भले ही रोज़ आपसी बातचीत ना होती हो, लेकिन इन दोनों का लक्ष्य एक है. ये लोग शांति-दूत हैं. ये लोग प्रेम और आज़ादी के अगुआ हैं. और हम सब जानते हैं कि प्रेम और आज़ादी एक गरिमामय जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है.

अपने जीवन में सुधार के साथ-साथ ये दोनों औरतें हमारे समाज को भी दिशा दिखा रही हैं. अपने दादा की गोद में खिलखिलता गुलिस्तां का बच्चा हमारा भविष्य है और उसकी रक्षा करने का जिम्मा हम सब का है. उस्मान अंसारी के चेहरे से झलकती मुस्कान में एक जीवन शक्ति है, जिसे पूरे भारत को संजोए रखने की आवश्यकता है.

(यह लेख  लाइवमिंट डॉट कॉम के लिए अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है, जिसका हिन्दी अनुवाद अभिनव प्रकाश ने किया है.)

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