कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

पास आई मोदी जी की विदाई, पर नहीं लागू हुई नई शिक्षा नीति, 2014 के चुनाव में छोड़ा था शिक्षा में बदलाव का जुमला

शिक्षा रिपोर्ट का सालाना आंकड़ा बताता है कि स्कूलों में पढ़ने वाले 50 फीसदी बच्चे बेसिक चीज़ें भी पढ़ना नहीं जानते.

मोदी सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में 2 कमेटियों के गठन, 1 लाख 15 हजार विचार-विमर्श के बावजूद भी प्रस्तावित नई शिक्षा नीति लागू नहीं की है. 2014 के अपने चुनावी मेनिफेस्टो में भाजपा ने नई देश की नई जरूरतों को देखते हुए नई शिक्षा नीति लागू करने का वादा किया था.

नई शिक्षा नीति का खासा महत्व है, क्योंकि 30 साल बाद देश की शिक्षा नीति में बदलाव किया जाना है. इसका असर देश की एक चौथाई आबादी यानि 29 करोड़ छात्रों पर पड़ेगी. उदारीकरण के बाद बदलाव से गुजरे देश में नई शिक्षा नीति लागू होने से बेरोज़गारी के कारणों पर नए सिरे से बात हो सकेगी.

मौज़ूदा दौर में शिक्षा की गुणवत्ता में हो रही गिरावट के बीच नई शिक्षा नीति के आने से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो सकेगा और इसे उद्योग या बाजार की जरूरत के हिसाब से बनाया जा सकेगा. लेकिन, टालमटोल की वज़ह से पांच साल पहले ही फाइनल हो चुकी शिक्षा नीति को लागू नहीं किया जा सका. इसके लिए गांव की पंचायत स्तर पर भी विचार-विमर्श किया जा चुका है. दुख की बात है कि आम चुनाव में कुछ महीने बाकी होने के बावजूद भी इसे संसद की स्वीकृति नहीं मिली है. अब मोदी सरकार में नई शिक्षा नीति लागू होने की उम्मीद ना के बराबर है.

लाइवमिंट की ख़बर के अनुसार शिक्षा अर्थशास्त्री पार्थ जे. शाह का कहना है कि शिक्षा सेक्टर में गुणवत्ता के सुधार के लिए एक व्यापक शिक्षा नीति की जरूरत है. इसे लागू करने में हो रही देरी दुखद है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व सदस्य एम. एम. अंसारी का कहना है, “नई शिक्षा नीति का वादा ठंडा पड़ गया क्योंकि सरकार इसके लिए अपनी डेडलाइन को समय-समय पर आगे बढ़ाती रही है. देशभर में शिक्षा नीति को लागू करने के लिए परामर्श पर संसाधनों को भारी मात्रा में खर्च किया.”

मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस साल जनवरी में कहा था कि शिक्षा नीति का दूसरा मसौदा बनकर तैयार हो गया है और इसे जल्दी ही अगली सुझावों के लिए पब्लिक कर दिया जाएगा. हालांकि इसी मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि फिलहाल ऐसा करना बिल्कुल असंभव है.

नाम न बताने की शर्त पर लाइव मिंट को एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया है कि यह नीति काफ़ी अच्छी है और इसे 20 सालों का विजन लेकर तैयार किया गया है. लेकिन, सरकार के ख़त्म हो रहे कार्यकाल को ध्यान में रखकर इसे जल्दबाज़ी में लागू करना ठीक नहीं है. बता दें कि भारत की पहली शिक्षा नीति 1968 में लागू की गई थी. इसे कोठारी आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर तैयार किया गया था. दूसरी शिक्षा नीति को 1986 तथा तीसरी को 1992 में लागू किया गया.

एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि पिछली शिक्षा नीतियों को भी जल्दबाजी में लागू नहीं किया गया था. आठ साल की अनिवार्य शिक्षा को 1968 की शिक्षा नीति में ही लिखा गया था, लेकिन इसे सरकार ने 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून बनाकर लागू किया.

एम. एम अंसारी के मुताबिक युवा शक्ति का सही लाभ लेने के लिए देश की स्कूली शिक्षा नीति में बदलाव की आवश्यकता है. शिक्षा नीति में सुधार कर एक रचनात्मक और कुशल कार्यबल तैयार किया जा सकता है. बीते साल विश्व बैंक ने कहा था कि भारत में जितने बच्चे जन्म लेते हैं उसका 44 फ़ीसदी ही किसी उद्योग के कुशल कर्मचारी बन पाते हैं. एशिया के दूसरे देशों के मुकाबले भारत का यह प्रदर्शन निराशाजनक है.

शिक्षा रिपोर्ट का सालाना आंकड़ा बताता है कि स्कूलों में पढ़ने वाले 50 फीसदी बच्चे बेसिक चीज़ें भी पढ़ना नहीं जानते. गणित को लेकर भी भारतीय छात्रों का ट्रैक रिकॉर्ड काफ़ी बुरा है. 8वीं क्लास में पढ़ने वाले छात्रों का 44.1 फ़ीसदी हिस्सा ही साधारण भाग (डिविजन) कर पाता है.

एम. एम अंसारी का कहना है कि शिक्षा की आधारभूत संरचना की जरूरतों को पूरा करने और सक्षम शिक्षकों की बहाली के लिए शिक्षा सेक्टर में निवेश को बढ़ाना जरूरी है. उनके मुताबिक शिक्षकों की गुणवत्ता शिक्षा व्यवस्था को काफ़ी हद तक प्रभावित करती है.

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