कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

“पांच साल पहले सरकार ने कर्ज़ माफ़ कर दिया था, अब मोदी सरकार ब्याज सहित वापस मांग रही है लोन के पैसे”- तमिलनाडु के किसानों का छलका दर्द

तमिलनाडु के हिदायतुल्ला का कहना है कि 2013 में बैंक वालों ने कहा था कि आपका लोन माफ़ हो गया है लेकिन दो साल पहले सरकार ने ब्याज सहित लोन वापसी की नोटिस भेज दी.

दिल्ली का रामलीला मैदान, वही मैदान जिसके चारों तरफ औद्योगिक इमारतें खड़ी हैं और जो कई ऐतिहासिक आंदोलनों का गवाह रहा है. जहां आज से साढ़े सात साल पहले अन्ना आंदोलन में विशाल जनसमूह उमड़ा था. एक बार फिर से वही मैदान “भीख नहीं रोजगार चाहिए, जीने का अधिकार चाहिए”, “किसान एकता ज़िंदाबाद” और “मोदी सरकार होश में आओ” जैसे नारों से गूंज रहा है. इस बार मसला है देश के अन्नदाता का, उनका जो अपने श्रम से देश की विशाल जनसंख्या का सृजन करते आए हैं. दो दिन के इस आंदोलन में 29 नवंबर की सुबह से ही रामलीला मैदान में लाल, पीले, हरे और सफेद रंग के झंडे आसमान में लहराने लगे थे. मिट्टी की ज़मीन पर बिछी मैली दरी पर बैठे कुछ लोग थकान मिटा रहे हैं तो कुछ आगे की रणनीति बनाने में जुटे हैं.

29 नवंबर. दोपहर के करीब बारह बज रहे होंगे जब नारों की आवाज़ सुनकर हम रैली की ओर बढ़े. किसानों के साथ मैदान में दाखिल होते ही हमने मैदान को सरसरी निगाह से देखा तभी हमें हरे रंग की लूंगी पहने और हाथों में नरमुंड लिए किसानों का एक झुंड दिखाई पड़ा. पूछने पर पता चला कि वो दक्षिण भारतीय हैं. इस समूह के साथ हम बातों का सिलसिला शुरू करने ही वाले थे कि हमारे सामने भाषा की दिक्कत खड़ी हो गई. हालांकि अपनी बात हमतक पहुंचाने की उत्सुकता में उन्होंने अपने बीच से एक टूटी फूटी हिन्दी बोलने वाले शख्स की तलाश कर ली.

सफेद दाढ़ी और माथे पर पठानी पगड़ी बांधे तमिलनाडु से आए हिदायतुल्ला ने बताया कि यह उनका पहला किसान आंदोलन नहीं है, इससे पहले भी वो कई आंदोलनों में शामिल हो चुके हैं. हिदायतुल्ला बताते हैं, “साल 2013 में हमने बैंक से 34,000 रुपए का कर्ज़ लिया था, जिसके बाद तब की सरकार ने कर्ज़माफ़ी का एलान किया और बैंक वालों ने कहा कि आपका कर्ज़ माफ़ कर दिया गया है. लेकिन, दो साल पहले मोदी सरकार ने ब्याज के साथ लोन चुकाने के लिए नोटिस भेज दिया है. जिस कारण अब मुझे 85,000 रुपए देने होंगे.” हिदायतुल्ला के कहना है कि 2013 में हमारे यहां गन्ने की फ़सल अच्छी हुई थी, हम बैंक में पैसे लौटाने गए लेकिन बैंक वालों ने कर्ज़माफ़ी के कारण पैसे लेने से मना कर दिया, लेकिन अब मेरे पास पैसे नहीं हैं तब सरकार ने नोटिस भेज दिया है. हिदायतुल्ला के साथ आए एम. महेंद्र कहते हैं कि हमारे राज्य में पानी की बहुत दिक्कत है. महेंद्र बताते हैं कि पिछले दिनों आए तूफान ने नारियल, आम, केला जैसे कई फलों के पेड़ बर्बाद कर दिए हैं. वह पिछले सालों को याद कर बताते हैं कि साल 1970 में चावल की 3 बोरियों को बेचने पर एक तोला सोना खरीदने जितनी कीमत मिल जाती थी, लेकिन आज चावल की 25 बोरियों को बेचने पर मुश्किल से एक तोला सोने की कीमत मिल पाती है.

क्य़ा थी किसानों की मांग

देश के विभिन्न राज्यों से आए लगभग 40,000 हज़ार किसान मुख्यत: अपनी दो मांगों को लेकर दिल्ली की सड़कों पर उतरे थे. पहला संपूर्ण कर्ज़माफ़ी और दूसरा फसलों के संपूर्ण लागत का डेढ गुना मूल्य किसानों को दिया जाए. इसके साथ ही किसानों की मांग थी कि उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए संसद का एक विशेष सत्र बुलाया जाए.

बता दें कि फसलों की लागत तय करने वाली सरकारी संस्था कृषि लागत एवं मूल्य आयोग तीन तरह की लागत तय करती है. पहला ए2 यानी खाद, बीज, कीटनाशक, ईंधन, जुताई, सिंचाई, मज़दूरी पर होने वाले मूल खर्च. दूसरा ए2 और एफएल जिसमें ए2 लागत में किसानों द्वारा खेती में किए गए पारिवारिक श्रम को भी जोड़ा जाता है और तीसरा है सी2 लागत, जिसके अन्तर्गत ए2 और एचएल के ऊपर लगे खेतों के किराए, किसानों की पूंजी और ट्रैक्टर आदि के मूल्य पर लगे ब्याज को भी रखा जाता है. किसानों का कहना है कि वादा सी2 को पूरी तरह लागू करने का था, जिसके तहत फसल के संपूर्ण लागत का डेढ गुणा मूल्य देने की बात कही गई थी. जिसे अभी तक पूरा नहीं किया गया है. किसानों का कहना है कि सरकार स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को मानने का ढोंग करती है.

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें: किसानों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम

साल 1991 में आर्थिक उदरीकरण के बाद देश के अलग अलग क्षेत्रों में बदलाव आया. लेकिन, कृषि क्षेत्र की हालत स्थिर रही. वर्ष 2004 में सरकार ने राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया. मशहूर कृषि वैज्ञानिक और भारत में हरित क्रांति का जनक कहे जाने वाले एमएस स्वामीनाथन को इस आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था. जिसके दो वर्ष बाद एमएस स्वामीनाथन ने तत्कालीन सरकार को रिपोर्ट सौंपी लेकिन, उसे आज तक पूरी तरह से अमल में नहीं लाया गया है. स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में किसानों के फसल में लगने वाले वास्तविक खर्च के मूल्य से 50 फीसदी अधिक कीमत देने की सिफारिश की है. इसके अलावा किसानों को कम दाम पर अच्छे पैदावार वाले बीज मुहैया कराने, प्राकृतिक आपदा से होने वाले आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए कृषि जोखिम फंड की व्यवस्था करने और ब्याज दरों को सस्ता कर किसानों की मदद के लिए लोन का प्रावधान भी रखा गया है. मोदी सरकार ने किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर डेढ़ गुना दाम देने की बात कहकर स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने का दावा किया, लेकिन किसानों का कहना है कि सरकार सिर्फ़ दिखावा कर रही है, वास्तविक तस्वीर काफ़ी अलग है.

थोथे आश्वासन से नहीं चलेगा काम, अबकी आर-पार की लड़ाई

इस आंदोलन को विपक्ष के लगभग सभी शीर्ष नेताओं का साथ मिला. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, दिल्ली, केरल, आंध्रप्रदेश औऱ पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री भी इसमें शामिल हुए. इनमें कुछ नेताओं ने किसानों की समस्या के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग को अपना समर्थन दिया. किसान मुक्ति मार्च के संयोजक और लोकप्रिय किसान नेता वीएम सिंह से जब पूछा गया कि यह आंदोलन केवल दो दिनों का है तो क्या सरकार द्वारा आश्वासन देने पर वे मान जाएंगे. और अगर नहीं मानेंगे तो उनकी अगली रणनीति क्या होगी इसपर उनहोंने कहा कि इसबार आश्वासन से काम नहीं चलेगा, यह आरपार की लड़ाई है. सरकार को संसद का विशेंष सत्र बुलाना ही पड़ेगा और आगे की रणनीति हम आपको बाद में बताएंगे.

पिछले दो सालों में कैसा रहा किसानों का आंदोलन

देश ने पिछले दो सालों में कई बड़े किसान आंदोलन देखे हैं, जिसे मौजूदा सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया. जून 2017 में महाराष्ट्र के अन्नदाताओं ने उग्र प्रदर्शन किए. इसी साल मध्यप्रदेश के मंदसौर में अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत किसानों पर गोलियां चलाई गईं, जिसमें 6 लोग मारे गए. इसके अलावे इस साल मार्च में नासिक से मुंबई तक किसानों की पदयात्रा हुई. जून में ने गांव बंद आंदोलन किया गया. इसके बाद मजदूर किसान संघर्ष रैली (सितंबर 2018) और हरिद्वार से दिल्ली तक किसान क्रांति यात्रा (अक्टूबर 2018) भी आयोजित की गई, लेकिन सरकार ने इन सभी आंदोलनों का गला घोंट दिया.

You can also read NewsCentral24x7 in English.Click here
+