कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

पठानकोट एयरबेस में ISI को घुमाया, पत्थरबाज़ों से मुकदमा वापस लिया, बताया मोदी सरकार ने?: रवीश कुमार

राष्ट्रवाद पर दूसरों को चुनौती देने वाले प्रधानमंत्री मोदी में साहस नहीं है कि वे भरी सभा में कह दें कि वो मैं हूं जिसने सेना पर पत्थरचलाने वाले 10,000 कश्मीर के नौजवानों से केस वापस ले लिए थे.

“जहां तक यहां के बच्चों का प्रश्न है, मैं कहना चाहूंगा, बच्चे बच्चे होते हैं, बच्चों को कोई भी गुमराह कर सकता है, लेकिन हम हक़ीकत को समझते हैं और इस हकीकत को समझते हुए स्टोन पेल्टिंग को लेकर जो बच्चे गुमराह हुए थे, जिन बच्चों ने जाने अनजाने में कोई ग़लती कर दी, तो यह फैसला हमलोगों ने किया कि जैसे सारे स्टोन पेल्टर्स हैं, सारे आफेन्डर्स हैं उनके केसेज वापस ले लिए जाएं. यह फैसला हम लोगों ने किया था.“

इंटरनेट सर्च कर रहा था. आप लोगों को भी सर्च करना चाहिए. हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी 7 जुलाई 2017 की एक ख़बर हाथ लगी जो कई जगहों पर छपी है. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह शेरे कश्मीर इंडोर स्टेडियम में छह हज़ार नौजवानों को संबोधित कर रहे थे. उनके भाषण का विडियो भी मिल गया. उसी भाषण का हिस्सा आपके लिए शब्दश टाइप किया हूं. आज तक न्यूज़ चैनल के पंचायत कार्यक्रम का विडियो मिला जिसमें राहुल कंवल के सवाल के जवाब में राजनाथ सिंह कहते हैं कि “मैं यह विश्वास करने के लिए तैयार नही हूं कि पत्थरबाज आतंकवादी होते हैं.“

फिर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में गुमराह नौजवान और आई टी सेल के गुंडे मुझसे क्यों पूछते हैं कि बताओ पत्थरबाज़ों पर मेरा स्टैंड क्या है. पिछले रविवार को मुझे ट्रोल किया गया. फोन करने वाले मूर्ख किस्म के नौजवान पूछ रहे थे कि तुम पत्थरबाज़ों को क्यों सपोर्ट करते हो. उन नौजवानों को यह नहीं पता था कि मैं नहीं, राजनाथ सिंह करते हैं. मोदी सरकार उन्हें अपना बच्चा मानती है और उन्हें आतंकवादी नहीं मानती है.

महबूबा मुफ़्ती ने भी मुख्यमंत्री रहते विधानसभा में बताया था कि 9,730 पत्थरबाज़ों के ख़िलाफ़ मुकदमे वापस लिए गए हैं. 1,745 के खिलाफ कुछ शर्तों के साथ केस वापस लिए गए हैं. तब महबूबा और बीजेपी की सरकार मज़े से चल रही थी. मेरी राय में यह ठीक फैसला था. सरकार ने मुकदमे वापस लेकर बड़प्पन दिखाया था. कश्मीर के नौजवानों को मुख्यधारा में लाने का जिम्मा सरकार का है. यह अहसास सरकार को होता रहता है मगर वह इस मुद्दे से उत्तर भारत की राजनीति को गरमाए रखना चाहती है. शिकायत यही है कि सरकार को अपने इस फैसले का प्रचार करना चाहिए था ताकि लोग मुझे बेवजह पत्थरबाज़ों का सपोर्टर नहीं कहते.

2016 के साल में गोदी मीडिया के चैनलों के स्क्रीन पर कश्मीर के पत्थरबाज़ों की कहानी छाई हुई थी. दिन भर स्क्रीन पर पत्थर चलते थे और यहां दिल्ली से पूरब की तरफ के लोगों को बहकाने के लिए उसे सेना के स्वाभिमान और मनोबल से जोड़ा जाता था. हम जैसों को गाली दी जाती थी कि हम पत्थरबाज़ों को सपोर्ट करते हैं. पता भी नहीं कि कौन पत्थरबाज़ हैं, क्यों पत्थर लिए हुए हैं, मगर हमें उनका सपोर्टर बना दिया गया. नरेंद्र मोदी कभी यूपी बिहार की रैलियों में नहीं बताते कि उनकी सरकार ने 10,000 से अधिक पत्थरबाज़ों से मुकदमे वापस क्यों लिए? जिन पत्थरबाज़ों ने सेना पर हमला किया, उनके ख़िलाफ़ मुकदमे वापस लेने के कदम का प्रचार यह नेता क्यों नहीं करते हैं?

चुनाव जब भी आता है जम्मू कश्मीर का मसला उत्तर प्रदेश की सांप्रदायिक राजनीति के लिए यूरिया बन जाता है. बीजेपी के नेता यूरिया की तरह कश्मीर को उत्तर भारत की रैलियों में झोंकने लगते हैं. कश्मीर को लेकर इन नेताओं की भाषा की बुनावट ट्रक पर लिखे उस स्लोगन है जो फिल्मों तक में जगह पा चुका है. दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे. आज मोदी और योगी ऐसे अनेक स्लोगन के लिए ट्रक बन गए हैं और पूरे उत्तर भारत में कश्मीर मुद्दे को लहरा रहे हैं. जहां समस्या है, वहां समाधान करते नज़र नहीं आते, जहां की समस्या नहीं है वहां इससे अपनी नाकामी का समाधान करते नज़र आते हैं.

मैं कश्मीर नहीं गया. मगर यह समझने लगा हूं कि यूपी बिहार के नौजवानों को गुमराह करने के लिए हिन्दी भाषी दलों को कश्मीर चाहिए. जहां मुसलमान दिखता है वहां कश्मीर दिखाया जाता है. वहां पाकिस्तान का ज़िक्र लाया जाता है ताकि राष्ट्रवाद की आड़ में उन सामान्य नागरिकों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर भरा जा सके. सांप्रदायिक बनाया जा सके. यूपी की रैली में यूपी का बांदा नहीं होता, बुंदेलखंड नहीं होता, बागपत नहीं होता है, बलिया नहीं होता है मगर कश्मीर होता है.

राष्ट्रवाद पर दूसरों को चुनौती देने वाले प्रधानमंत्री मोदी में साहस नहीं है कि वे भरी सभा में कह दें कि वो मैं हूं जिसने सेना पर पत्थरचलाने वाले 10,000 कश्मीर के नौजवानों से केस वापस ले लिए थे. वो मैं हूं जो मानता हूं कि पत्थरबाज़ आतंकवादी नहीं हैं. दूसरा वो यह कह दें कि भाइयों, बहनों 70 साल में पहली बार पाकिस्तान की आई एस आई को मैंने भारतीय वायुसेना के बेस में आकर जांच करने के लिए कहा. सोचिए यही काम अगर मनमोहन सिंह की सरकार ने किया होता तो बीजेपी अगले 100 साल तक यही प्रेस कांफ्रेंस करती है कि मनमोहन सिंह ने आई एस आई के अधिकारी को पठानकोट एयरबेस में घुसाया. उनसे कहा कि आपने ही हमला किया है, आइये आप भी जांच कर लीजिए.

क्या आपको याद है, क्या कोई एंकर याद दिलाता है? क्या आपने किसी चैनल पर इस घटना को लेकर मोदी सरकार को ललकारने वाला एंकर देखा है? 27 मई 2016 के टाइम्स आफ इंडिया में छपी है. कई जगहों पर यह ख़बर छपी है. मोदी सरकार की राष्ट्रवादी नीति की सबसे बड़ी असफलता यह है कि वह कश्मीर में फेल रही. महबूबा की पार्टी पी डी पी से दो दो बार मिलकर सरकार बनाई. चलाई. बीजेपी के विधायक मंत्री बने. अब अचानक महबूबा मुफ्ती राष्ट्रविरोधी हो गईं.

मैंने कभी नहीं सुना कि पठानकोट एयरबेस में पाकिस्तान और भारत की संयुक्त जांच दल में आई एस आई के अधिकारी के आने और एयरबेस में घुसने से सेना को मनोबल गिर गया. मैंने कभी नहीं सुना कि सेना पर पत्थर चलाने वाले 10,000 से अधिक पत्थरबाज़ों से मुकदमा वापस लेने से सेना का मनोबल गिर गया. सेना के मनोबल को बढ़ाने और बरक़रार रखने का ठेका बीजेपी ने नहीं लिया है. सैनिकों को पता है कि उनके गांवों की क्या हालत है. कस्बों में उनके बच्चों को पढ़ने के लिए अच्छे कालेज तक नहीं हैं. अस्पताल तक नहीं हैं. इसके बाद भी उनका मनोबल कभी नहीं गिरता है. सेना का मनोबल अगर बीजेपी से संचालित होने लगा तब तो सैनिक बात बात में मायूस होता रहेगा कि मेरे बच्चों के लिए कालेज नहीं खुला और बीजेपी ने सैंकड़ों ज़िले में नई ज़मीन ख़रीद कर नए आलीशान भवन बना लिए.

इसलिए मुझसे न कहें कि पत्थरबाज़ों का समर्थन करता हूं. मोदी सरकार से पूछिए कि उनकी सरकार कश्मीर को लेकर फेल क्यों रही. क्यों उनकी सरकार सेना पर पत्थर मारने वालों को अपना बच्चा कहती है? क्यों हमारे जवान शहीद हो रहे हैं? इन पांच सालों में शहीदों की संख्या 93 प्रतिशत बढ़ी है. मारे गए आतंकियों की संख्या 130 प्रतिशत से अधिक रही है. दुनिया के किसी भी देश में हंगामा मच जाता कि हमारा एक जवान शहीद कैसे हुआ. शहादत सर्वोच्च बलिदान है. हर जवान की जान की कीमत अनमोल है. अमरीका और ब्रिटेन में शहादत में इतनी वृद्धि हुई होती तो नीतियों की समीक्षा के लिए जांच आयोग बैठ गया होता. सवाल पूछे जाते कि हमारी नीति और रणनीति में क्या कमी है कि हमारा सिपाही शहीद हो जाता है. रणनीति ऐसी हो कि आतंकवादी मरे, जवान नहीं.

2003 में इराक़ युद्ध हुआ. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने उस युद्ध में शामिल होने का फैसला किया जबकि लाखों की संख्या में ब्रिटेन की जनता युद्ध का विरोध कर रही थी. इस युद्ध में ब्रिटेन के कोई 200 सैनिक भी शहीद नहीं हुए फिर भी आठ नौ साल की इराक की नीतियों की समीक्षा के लिए चिल्कॉट कमेटी बनी. इसने 12 वाल्युम और छह हज़ार पन्नों की रिपोर्ट तैयार की और बताया कि टोनी ब्लेयर ने ब्रिटेन से झूठ बोला था. युद्ध में शामिल होने के जो कारण बताए थे वो झूठे थे.

जब यह रिपोर्ट जारी हो रही थी तब शहीद सैनिकों के परिवार के सदस्य भी मौजूद थे. उन्होंने अपने पूर्व प्रधानमंत्री को झूठा, हत्यारा और आतंकवादी कहा. जो मीडिया टोनी ब्लेयर को अपने कवर पर हीरो की तरह छापता था उसने अगले दिन के कवर पर ब्लेयर को झूठा और आतंकवादी लिखा.

दुनिया का इतिहास इसी से भरा है. राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर देश के प्रधानमंत्री अपनी जनता को गुमराह करते रहे हैं. ब्रिटेन का यह उदाहरण काफी है. इसलिए इन सवालों पर गंभीरता से सोचें न कि कांव कांव करने लगें. मोदी सरकार राष्ट्रवाद के सवाल पर तेवरों पर आ जाती है. दरअसल यही वो ढाल है जिसके सहारे अन्य सवालों से बचा जा सकता है. स्किल इंडिया, स्मार्ट सिटी से लेकर मेक इन इंडिया सब ध्वस्त हो चुके हैं. सरकार इन सवालों से भाग रही है.

व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से सावधान रहें. कोई भी न्यूज़ चैनल न देखें और हिन्दी अख़बारों से अपने बच्चों को दूर रखें. वो उनके दिमाग़ में झूठ और प्रोपेगैंडा भर कर दंगाई बना रहे हैं ताकि जोश में बच्चे कुछ ग़लत कर दें. यह नौजवानों को सांप्रदायिकता से बचाने का सही रास्ता है. याद रखिएगा सांप्रदायिकता इंसान को मानव बम में बदल देती है. जय हिन्द.

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के फ़ेसबुक पोस्ट से शब्दश: लिया गया है.)

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