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मोदी सरकार का एमएसपी का सच: इस साल भी रबी फ़सल का रकबा घटा

किसानों ने 89 लाख हेक्टेयर जमीन पर चना बोया. जो 2017-2018 के मुकाबले 9.2 फीसदी कम है.

मोदी सरकार ने सत्ता में आने से पहले भले ही किसानों से तमाम वादे क्यों न किए हो लेकिन मौजूदा खेती के आंकड़ों से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि फ़सलों के उचित दाम न मिलने से निराशा किसान रबी फ़सलों की खेती कम से कम कर रहे हैं. जिससे उन्हें नुकसान न उठाना पड़े.

हिंद किसान की ख़बर के अनुसार प्रमुख फसलों के एमएसपी बढ़ने के बावजूद रबी की फ़सल का रकबा घट गया है. जिसका मतलब यह है कि किसानों ने इस साल फ़सलों की कम बुआई की है.

21 दिसंबर 2018 के आंकड़ों के मुताबिक़ किसानों ने 5 करोड़ 13 लाख हेक्टेयर की ज़मीन पर रबी की फ़सल पैदावार की है, जो साल 2017 के मुकाबले 4.6 फीसदी कम है. रबी की फ़सल के रकबे के घटने का सबसे ज्यादा असर गेंहू और चने की फसल पर पड़ा है. आमतौर पर रबी की फसलों में गेंहू और चने का हिस्सा 60 फीसदी होता है, लेकिन 21 दिसंबर 2018 तक गेंहू की बुआई का कुल रकबा 2 करोड़ 45 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 1.5 फीसदी कम है.

वहीं किसानों ने 89 लाख हेक्टेयर जमीन पर चना बोया. जो 2017-2018 के मुकाबले 9.2 फीसदी कम है. हालांकि सरसो की बुआई में 2.6 फीसदी इज़ाफ़ा हुआ है.

किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट का कहना है कि अगर चने की फ़सल का सही मूल्य किसानों को मिलता तो रबका बढ़ जाता, लेकिन सरकार ने जो न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया था उसके आधे दामों पर किसानों को चना बेचना पड़ा था. इसलिए रबी की फ़सलों के रकबे में गिरावट दर्ज की जा रही है.

ग़ौरतलब है कि एमएसपी में बढ़ोत्तरी के बावजूद रकबे में गिरावट फ़सलों की उचित कीमत न मिलना बताया जा रहा है. ज्यादातर किसानों को अपनी फसलों को खुले बाजार में एमएसपी से कम कीमत में बेचना पड़ रहा है. मौजूदा सरकार के शासन काल में किसानों को फ़सलों के उचित दामों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है.

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