कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

मोदी सरकार ने की तेल और गैस क्षेत्रों को निजी और विदेशियों कंपनियों को सौपनें की कोशिश

ओएनजीसी के इन सभी तेल और गैस क्षेत्रों की ख़ोज में करोड़ों की लागत और वर्षों की मेहनत लगी है.

देश के नौ सबसे बड़े तेल और गैस क्षेत्र यानी की ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड को कथित तौर पर क्रेंद सरकार इसका स्वामित्व निजी और विदेशियों कंपनियों को देना चाहती थी. हालांकि, ओएनजीसी और सरकार के भीतरी खेमे द्वारा विरोध के बाद सरकार की यह योजना सफल नहीं हो पायी.

पीटीआई  के रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर 2018 में नीति आयोग के चेयरपर्सन राजीव कुमार की अध्यक्षता में प्रधानमंत्री मोदी ने एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया था. इस समिती का काम पश्चिम में स्थित तेल और गैस क्षेत्रों को उसकी मूल ज़गह से स्थानांतरित कर मुंबई हाई, हीरा, D-1, वसई पूर्व और पन्ना में शिफ्ट करना था.

गठन की गयी समिति की सूची में पश्चिम में स्थित तेल और गैस क्षेत्र के अलांवा असम में ग्रेटर जोराजन और गेल्की फिल्ड, गुजरात में कलोल ऑयल क्षेत्र और राज्स्थान में बाघेवाला भी शामिल था.

सरकार और नीति आयोग में पीटीआई के सूत्रों  ने इस बात की पुष्टी की है कि देश की तेल व गैस क्षेत्रों का मालिकाना हक निजी और विदेशी कंपनियों के हाथ में देने की सरकार की इस योजना पर पानी फिर गया. जब ओएनजीसी के साथ-साथ सरकार के भीतरी खेमे ने भी इसका कड़ा विरोध किया.

जानकारी के अनुसार सत्ताधारी सरकार के इस प्रस्ताव में कथित रूप से कुछ गड़बड़ी पायी गयी.दरअसल, 95 प्रतिशत तेल व गैस उत्पादन क्षेत्र जिससे तेल और गैस उत्पादन में करीब 5 प्रतिशत के करीब योगदान मिलता है. सरकार के इस प्रस्ताव इन सभी क्षेत्रों को शामिल किया गया था.

बता दें कि ओएनजीसी के इन सभी तेल और गैस क्षेत्रों की ख़ोज में करोड़ों की लागत और वर्षों की मेहनत लगी है. जो कि देश के अलग-अगल प्रदेशों में स्थित है. ऐसे में इसका स्वामित्व निजी और विदेशियों कंपनीयों को सौंपने के इस प्रस्ताव का विरोध किया गया. मोदी सरकार के इस प्रस्ताव से सरकार में ही कुछ लोग संतुष्ठ नहीं थे.

पीटीआई सूत्रों के अनुसार, मोदी सरकार जिन निजी और विदेशियों कंपनियों से सौदा करने वाले थे वह कंपनियां अनुसंधान के क्षेत्र में निवेश करने से ख़ुद को दूर रखा है. इसके बावजूद भी उन्होंने ओएनजीसी और ऑयल इंडिया लिमिटेड के तेल और गैस क्षेत्रों में पूंजी और तकनीक की मदद से इस क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने का दावा कर रहे थे.

रिपोर्ट के अनुसार, यदि उन्हें तेल और गैस क्षेत्रों में मूल्य निर्धारण और ब्रिकी की आज़ादी दी जाती है तो वह नयी तकनीक की मदद से इसका उत्पादन को और बढ़ा सकते हैं.

हालांकि, साल 2019 की शुरूआत में समिति द्वारा दी गयी रिपोर्ट ने इस प्रस्ताव को कमज़ोर कर दिया. रिपोर्ट में समिति ने इस मामले में एनओसी की स्वतंत्रता की सिफ़ारिश की. समिति ने किसी भी नये क्षेत्रों में विकास की योजना के लिए मूल्य निर्धारण और खरीद-फ़रोख्त की आज़ादी का निर्णय भी एनओसी को दे देने की सिफ़ारिश की.

पीटीआई के सूत्रों के मुताबिक, ओनेजीसी के 64 छोटे और सीमांत क्षेत्रों के साथ ऑयल इंडिया लिमिटेड के दो छोटे क्षेत्रों को भी चार महीने के भीतर बोली लगाने की सिफ़ारिश की गयी थी. वहीं, एनओसी ने ओएनजीसी के 49 और ओआईएल के 3 यानी कुल 54 क्षेत्रों को बनाए रखने की अनुमति दी थी.

रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने इन सिफ़ारिशों को मान लिया है. सरकार ने उस नीति को भी अधिसूचित किया है जिसके तहत भविष्य में बोली लगाने के क्रम में बोली लगाने वाले को तेल और गैस के उत्पादन में उन्हें मूल्य तय करने के साथ ही उन्हें ख़रीद-फ़रोख्त की आज़ादी देती है.

पीटीआई इनपुट्स पर आधारित

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