कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

‘बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ’ योजना का आधा पैसा प्रचार में उड़ा

साल 2014 से लेकर 2018 के बीच करीब 56 फीसदी पैसा मीडिया से जुड़े गतिविधियों में खर्च हुआ, तो 25 प्रतिशत से भी कम पैसा जिला और राज्यों में आवंटित किए गए.

साल 2015 में शुरू हुई ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ की योजना का आधे से ज्यादा पैसा प्रचार करने में खर्च हुआ है. योजना की शुरुआत के चार साल बाद सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़े दर्शाते हैं कि इसका लक्ष्य ‘बेटी बचाने और बेटी बचाने’ से ज्यादा पब्लिसिटी था.

साल 2014 से लेकर 2018 के बीच करीब 56 फीसदी पैसा मीडिया से जुड़े गतिविधियों में खर्च हुआ, तो 25 प्रतिशत से भी कम पैसा जिला और राज्यों में आवंटित किए गए. वहीं करीब 19 प्रतिशत पैसा सरकार की ओर से जारी ही नहीं किया गया.

आंकड़ों के मुताबिक, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ योजना का पैसा प्रचार में खर्च किया गया. वर्ष 2014-15 में कुल 50 करोड़ रुपया फंड आवंटित हुआ, जिसमें से मात्र 13.37 करोड़ रुपया जिला और राज्यों को भेजा गया. वहीं, 18.91 करोड़ प्रचार पर खर्च कर दिए गए. बाकी बचा पैसा आवंटित ही नहीं किया गया.

इसी तरह वर्ष 2015-16 में 75 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया, जिसमें से 39.08 करोड़ रुपये जिला व राज्यों को और 24.54 रुपये प्रचार में खर्च किए गए.

इसी तरह 31 दिसंबर 2018 तक कुल 648 करोड़ रुपये फंड का आवंटन किया गया. इसमें से 159.18 करोड़ रुपये जिला व राज्यों को जारी किए गए, जबकि 364.66 करोड़ रुपये प्रचार पर खर्च कर दिए गए. वहीं करीब 124.16 करोड़ रुपये जारी ही नहीं किए गए.

विदित है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2015 में 22 जनवरी को ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरूआत की थी, जिसके दो लक्ष्य थे. पहला गिरते हुए लिंगानुपात को कम करना और दूसरा समाज में लड़कियों के प्रति नजरिए को बदलना.

बता दें कि इसके लिए तीन मंत्रालय महिला और बाल विकास, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय को जिम्मा दिया गया।

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